ओह! इक्कीसवीं सदी। इस सदी के प्रारंभ की एक तारीख 9/11 की थी। ताज़ा तारीख 2/28 है। और 26 वर्षों की इस पूरी अवधि के प्रतीक कौन हैं? तब जॉर्ज डब्ल्यू बुश थे। अब डोनाल्ड ट्रंप हैं। और तीसरे प्रतीक इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू हैं। 9/11 के समय नेतन्याहू प्रधानमंत्री नहीं थे। वे 1996 में प्रधानमंत्री थे। उन्होंने ओस्लो समझौते को हाशिए में रख फिलिस्तीनियों के प्रति नया रवैया अपनाया था। उनकी वापसी 9/11 की घटना के वैश्विक प्रभावों का एक परिणाम थी।
हां, नेतन्याहू सर्वाधिक लंबे समय से प्रधानमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड लिए हुए हैं। वे पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री बने। उन्होंने इज़राइल के संस्थापक प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन (14 मई 1948 को उन्हीं ने इज़राइल की स्वतंत्रता की घोषणा की थी।) के कार्यकाल का रिकॉर्ड तोड़ा है। नेतन्याहू का अब तक का कार्यकाल 18 वर्षों का है। तय मानें ईरान पर इजराइल-अमेरिकी हमले तथा 24 घंटे के भीतर ईरानी सुप्रीमो अली ख़ामेनेई की मौत से इसी साल होने वाले चुनावों में भी नेतन्याहू की जीत पक्की है।
नेतन्याहू पहले दिन से फिलिस्तीनियों, अरब इस्लामी राजनीति को हैसियत बताने के मकसद में काम करते रहे हैं। और इसमें वे अपनी सफलता की गाथा 28 फरवरी 2026 की तारीख पर बुनेंगे जिस पर इजराइली मतदाताओं का अनिवार्यतः ठप्पा लगेगा।
मैं नेतन्याहू को पहले रख रहा हूं और डोनाल्ड ट्रंप को बाद में। क्योंकि जो हुआ है उसके उत्प्रेरक केवल और केवल नेतन्याहू हैं। कहने वाले कहेंगे कि ट्रंप मवाली हैं और उनकी वजह से वेनेजुएला के बाद ईरान ऑपरेशन हुआ। पर असल खेला नेतन्याहू का रचा हुआ है। उन्होंने पश्चिम एशिया की शक्ल बदली है तो दुनिया के कोई दो अरब (1.9 अरब) मुसलमानों के दिल-दिमाग को भी झिंझोड़ा है। निश्चित ही चिंगारी हमास के (सात अक्टूबर 2023) आतंकी हमले से थी। लेकिन उसके बाद जो हुआ है वह केवल नेतन्याहू की बदौलत है। उन्होंने किसी की कोई चिंता नहीं की। और दुनिया के आगे गाजा का वह लाइव नजारा बनाया जिसे देख हर कोई दहला।
और दुनिया भर के मुसलमान पर सर्वाधिक असर। यही इस सदी के 26 वर्षों की हकीकत है। मानों सभ्यताओं में संघर्ष बिना घोषणा के होता हुआ। सोचें, आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रपति बुश के वैश्विक जंग के ऐलान और अफगानिस्तान-इराक पर हमलों के बाद क्या माना गया? खत्म हुए इस्लामी आतंकी और दुनिया सामान्य! लेकिन इज़राइल में नेतन्याहू, यूरोप में आतंकियों, इराक-सीरिया में इस्लामी स्टेट और फिर अचानक ट्रंप का उभार क्या था? यों कहने को नेतन्याहू-ट्रंप ने अब्राहम समझौते का झुनझुना बना कर यहूदी इजराइल और इस्लामी देशों में कूटनीतिक रिश्तों की झांकी बनाई लेकिन अंत अनुभव क्या है? कुल परिणाम क्या है?
कह सकते हैं समय के साथ भूल जाने वाली घटनाओं का सिलसिला है। यह सही नहीं है। क्योंकि हम 21वीं सदी में हैं। वह बीसवीं सदी अलग थी, जिसमें महायुद्ध हुए। विश्व व्यवस्था बदली। मगर वह सब वैश्विक जनमानस की आंखों के आगे प्रत्यक्ष नहीं था। अमेरिका ऐसा है, यहूदी ऐसे हैं, मुसलमान ऐसे हैं, हिंदू ऐसे हैं, ईसाई ऐसे हैं, ये बाते बीसवीं सदी में जानकार लोग ही सुनते थे। सब सुनी-सुनाई बातें होती थीं। पश्चिम एशिया में कभी क्रूसेड हुआ। मुस्लिम हमलावर निर्मम हैं या यूरोपीय देश लुटेरे हैं, औपनिवेशिक ताकतें और पूंजीपति शोषक हैं ये तमाम बातें आम जन मानस से दूर थी, जबकि इक्कीसवीं सदी में दुनिया एक गांव है। सब कुछ लाइव है। आज पृथ्वी के आठ अरब लोगों के आगे सब लाइव घटता हुआ है। सो, दुनिया के आगे नेतन्याहू के भी पल-पल दर्शन हैं तो अली खामेनेई, लादेन, बगदादी, ट्रंप, मोदी, पुतिन, शी जिनपिंग आदि भी कैमरे के जरिए आंखों के आगे साक्षात हैं।
इसलिए नेतन्याहू ने 2023 से अब तक जो किया है वह वैश्विक स्मृतियों में, मुस्लिम आबादी में आंखों देखी दर्ज है। नेतन्याहू और ट्रंप को गलतफहमी है कि अली खामेनेई और ईरान को शैतान करार देकर मारा है तो मुसलमान उनका जयकारा करेगा। मेरा मानना है कि ट्रंप प्रशासन का यह सोचना ही बेवकूफी भरा है कि ईरान के लोग उसके लोकतंत्र बनवाने के मिशन की वाह करेंगे। इसलिए हर खाड़ी देश ने ट्रंप प्रशासन को समझाना चाहा कि ईरान पर हमला न करें। इसके पीछे कतर, ओमान, कुवैत, बहरीन को जहां अपनी सुरक्षा की चिंता थी वही मुस्लिम जनमानस की भी चिंता थी। पृथ्वी के दो अरब लोगों ने पिछले तीन वर्षों में गाजा को जैसा लाइव देखा है, वे भला कैसे ईरान पर हमले को ईरानी लोगों की भलाई का का काम मानेंगे।
बहरहाल, नेतन्याहू ने जो चाहा वह कर दिखाया। ट्रंप के कंधे से ईरान पर वार का मुकाम ऐतिहासिक है। और ऐतिहासिक मायने इस्लाम, इस्लामी राजनीति, इस्लामी धर्मसत्ता के सभी पहलूओं में गंभीर है। मुझे नहीं लगता कि ईरान के नौ करोड़ शिया मुसलमान अपने धर्म की धर्मसत्ता छोड़ धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को अपनाएंगे? ईरान वेनेजुएला नहीं है। न ही मिस्र, तुर्की या इंडोनेशिया है। वजह ईरान का दुनिया के कोई 20-25 करोड़ शियाओं का धर्मतीर्थ होना भी है। दुनिया भर से लाखों की संख्या में शिया हर साल ईरान के तीर्थ कर्बला, नजफ़, मशहद, क़ोम पहुंचते हैं। और ये ही “विलायत-ए फ़क़ीह” यानी आयतुल्लाह/मरजाअ की विरासती धर्मशिक्षा के केंद्र हैं। इसलिए इज़राइल-अमेरिका एक आयतुल्लाह को मारेंगे तो धर्मव्यवस्था-संविधान अनुसार नया आयतुल्लाह आ जाएगा। माना जाता है कि ईरानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (डेढ़ से दो लाख सक्रिय सैनिक, नब्बे हजार बसिज़ मिलिशिया) धर्म विधान मामले में कट्टर हैं। ईरानी सेना के नौ लाख सैनिकों से अतिरिक्त ये ईरान के ये रिवोल्यूशनरी गार्ड हैं। ये ट्रंप-नेतन्याहू के आगे समर्पण कर दें या 47 पहले के शाह पहलवी के बेटे को तेहरान में सरकार बनाने दे यह संभव नहीं है।
सो, ईरान अरब-खाड़ी क्षेत्र का सबसे बड़ा (आबादी) देश ही नहीं है उसकी सेना भी सर्वाधिक बड़ी और संस्थागत ढांचा लिए हुए है। इस वास्तविकता को नेतन्याहू भलीभांति जानते हैं। तभी नेतन्याहू ने ट्रंप के जरिए अपना मकसद साधा। सो, अमेरिका फंसा है और फंसा रहेगा। फिर ट्रंप को निज लाभ भी है। ईरान पर हमले, खुमैनी की मौत से वे अंदरूनी राजनीति में नैरेटिव बनाएंगे वही वैश्विक दादागिरी भी बढेगी।
इस सबका भारत पर क्या असर होगा? ध्यान रहे ईरान पर हमले से ठीक पहले नेतन्याहू ने प्रधानमंत्री मोदी को न्योता दे कर उनका इजराइली संसद में भाषण करवाया। अपने मिशन में राजदार बनाया। याद करें कि किस अंदाज में दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंक के समूल नाश में साझेदारी दिखाई! मोदी ने कैसे इज़राइल व भारत को फादरलैंड-मदरलैंड के रूपक में बांधा। सवाल है नेतन्याहू के जरिए जोश-अहंकार का वैश्विक गुब्बारा बने डोनाल्ड ट्रंप नई स्थिति में क्या भारत पर रहम करेंगे? व्यापार संधि में भारत से बराबरी का व्यवहार करेंगे या और दबाव डालेंगे? कल तक भारत की ऊर्जा यानी कच्चे तेल (रियायतों के साथ) का ईरान भरोसेमंद सप्लायर था। उस सोर्स को अब बंद मानना चाहिए। क्योंकि वहां ट्रंप की वेनेजुएला जैसी कठपुतली सरकार कतई नहीं बनेगी। लड़ाई होती रहेगी। अंदरूनी अराजकता में ईरानी तेल ठिकाने बर्बाद भी हो सकते हैं। सो, जब ईरान से सप्लाई बाधित होगी तो चीन की खरीद रूस से होगी। वही भारत ट्रंप के दबाव में रूस से सप्लाई नहीं बढ़वा सकता। ऐसे में अमेरिका से खरीदो या उसके जरिए वेनेजुएला से भारत तेल मंगाएगा। और कीमत का निर्णयकर्ता अमेरिका।
ऐसा सिनेरियो न तो असंभव है और न इसका समाधान आसान है। ले देकर मोदी सरकार नेतन्याहू से ही रास्ता निकलवा सकती है। वह भी तब संभव है जब यह मालूम हो कि ईरान की धर्मसत्ता और उसके बारह-तेरह लाख अनुयायी सैनिक अडिग रहते हैं या नेतन्याहू-ट्रंप के आगे सरेंडर करते है? मेरा मानना है कि इन लाखों सैनिकों का सरेंडर तभी संभव है जब अमेरिका-इज़राइल दोनों तेहरान में अपने सैनिक उतारें? और यह नामुमकिन है।
