ईरान की शर्तें मानना अमेरिका के लिए अपनी हार स्वीकार करने जैसा होगा। ट्रंप ने इससे इनकार करते हुए प्रोजेक्ट फ्रीडम शुरू किया। मगर उसके दबाव में आने के बजाय ईरान ने जवाबी हमले शुरू कर दिए हैं।
अमेरिका/ इजराइल और ईरान के बीच युद्धविराम लगभग भंग हो चुका है। इसके टूटने की शुरुआत कब हुई और इसे किसने तोड़ा, इन प्रश्नों पर दोनों पक्षों की राय परस्पर विरोधी है। ईरान की दलील है कि आठ अप्रैल को लड़ाई ठहरने के बाद अमेरिका ने होरमुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी कर युद्धविराम को पहली बार भंग किया। फिर तीन मई डॉनल्ड ट्रंप ने होरमुज जलमार्ग को जबरन खुलवाने के लिए प्रोजेक्ट फ्रीडम का एलान कर जंग का नया दौर शुरू कर दिया। ट्रंप का दावा है कि इस कार्रवाई के तहत सात ईरानी नौकाओं को नष्ट किया गया।
उधर ईरान ने जलमार्ग पार करने की कोशिश मे लगे यूएई और दक्षिण कोरिया के टैंकरों को निशाना बनाया। लगे हाथ उसने संयुक्त अरब अमीरात के तेल ठिकाने फुजैरा और दुबई में कुछ स्थलों पर भी मिसाइलें दागीं। इस तरह जंग एक नए स्तर पर पहुंच गई है। पहले से ही ऊर्जा संकट, महंगाई और कई जरूरी पदार्थों के अभाव से ग्रस्त विश्व अर्थव्यवस्था पर यह नया प्रहार है। यह तो साफ है कि ट्रंप प्रशासन बिना स्पष्ट सैन्य उद्देश्य तय किए इस लड़ाई में उतर गया। उसकी धारणा शायद यह थी कि वेनेजुएला की तरह चौंकाने वाली कार्रवाई से वह ईरान में सत्ता बदल देगा। इससे वहां के तेल भंडार अमेरिकी नियंत्रण में आ जाएंगे। मगर ये दांव गलत पड़ा।
तब से वह जंग से बाहर निकलने की राह नहीं ढूंढ पा रहा है। ट्रंप अमेरिका के विजयी होने के कथानक के साथ युद्ध खत्म करना चाहते हैं, लेकिन ईरान ने इसके अवसर से उन्हें वंचित कर रखा है। पिछले हफ्ते ईरान ने युद्ध समाप्त करने का तीन-स्तरीय फॉर्मूला अमेरिका को भेजा। इसके जरिए ईरान ने फिर अपनी बुनियादी शर्तें पेश कीं, जिन्हें मानना अमेरिका के लिए अपनी हार स्वीकार करने जैसा होगा। ट्रंप ने इससे इनकार करते हुए ईरान पर दबाव बढ़ाने की कोशिश में प्रोजेक्ट फ्रीडम शुरू किया। मगर इसके दबाव में आने के बजाय ईरान ने जवाबी हमले शुरू कर दिए हैं। उनकी चोट फिलहाल यूएई और होरमुज स्थित टैंकरों पर पड़ी है, लेकिन इसका असर सारी दुनिया तक जाएगा।
