निष्पक्ष निर्णय की अपेक्षा

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कुछ राजनीतिक दलों और 700 से अधिक सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा प्रमुख नागरिकों का निर्वाचन आयोग के पास अर्जी देने का प्रचार संबंधी महत्त्व चाहे जो हो, उससे आदर्श चुनाव संहिता की गरिमा बहाल करने में शायद ही मदद मिलेगी।

दो राज्यों में जारी चुनाव प्रक्रिया के बीच प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम ‘राजनीतिक’ प्रसारण करना सामान्यतः आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन समझा जाता। लेकिन ‘सामान्य’ की ये पुरानी समझ है, जब निर्वाचन आयोग समान भाव से सब पर संहिता लागू करता था। कमोबेश राजनीतिक दल भी इसमें आयोग का सहयोग करते नजर आते थे। मगर, आज सूरत बदली हुई है। इसलिए कुछ राजनीतिक दलों और 700 से अधिक सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा प्रमुख नागरिकों का आयोग के पास अर्जी देने का प्रचार संबंधी महत्त्व चाहे जो हो, उससे आदर्श चुनाव संहिता की गरिमा बहाल करने में शायद ही मदद मिलेगी।

आयोग ने कहा है कि वह इन अर्जियों में लगाए गए आरोप की जांच करेगा। लेकिन अतीत के अनुभवों पर गौर करें, तो बात इससे आगे बढ़ेगी, इसकी संभावना कम ही है। चार राज्यों एवं एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव का एलान करते हुए निर्वाचन आयोग ने कहा था कि 15 मार्च से 4 मई तक आदर्श आचार संहिता लागू रहेगी। इसी बीच केंद्र ने अचानक संसद में महिला आरक्षण विधेयक के मुलम्मे तले परिसीमन संबंधी संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने की नाकाम कोशिश की। केंद्र में 12 साल के शासनकाल में अपनी सरकार की पहली संसदीय नाकामी को राजनीतिक अवसर में तब्दील करने के प्रयास में नरेंद्र मोदी ने सरकारी माध्यमों से 18 अप्रैल को राष्ट्र संबोधित किया।

किसी भी नजरिए से यह उनका यह फैसला दलगत था। उसके पीछे किसी “राष्ट्रीय” तत्व की तलाश कर पाना मुश्किल ही है। संबोधन के दौरान विपक्ष- खास कर कांग्रेस उनके निशाने पर रही। उस भाषण के जरिए स्पष्टतः उन्होंने चुनाव वाले राज्यों के मतदाताओं को अपनी पार्टी का संदेश दिया। अतः इस आरोप में दम है कि मोदी का भाषण असल में राष्ट्रीय संबोधन की गरिमा के विपरीत था। बहरहाल, लोकतंत्र में ऐसे आरोपों और धारणाओं के बारे में अंतिम निर्णय निष्पक्ष संवैधानिक संस्थाएं लेती हैं। निर्वाचन आयोग ऐसी ही प्रतिष्ठित संस्था रही है। इसलिए राजनीतिक दल एवं नागरिक उससे निष्पक्ष निर्णय की अपेक्षा रखते हैं, तो यह वाजिब ही है। असल सवाल यह है कि क्या आयोग इस अपेक्षा पर खरा उतरेगा?


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