बदनीयती से हटता परदा

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हालिया न्यायिक निर्णयों ने इस धारणा की पुष्टि की है कि सरकारी एजेंसियों का राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल हुआ। जिन साक्ष्यों के आधार पर अभियोग दर्ज हुए, उनका सख्त न्यायिक परीक्षण हुआ, तो अधिकांश मामलों में वे टिक नहीं पाए।

कथित शराब घोटाले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और 23 अन्य अभियुक्तों के खिलाफ मामला खारिज करते हुए जज ने जो टिप्पणियां कीं, उन पर गौर करने के बाद शायद ही किसी के मन शक बचे कि ये पूरा मामला बदनीयती से गढ़ा गया था। उसके एक दिन पहले पंचकूला से जुड़े नेशनल हेराल्ड मामले में भी ऐसा ही बड़ा फैसला आया। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा को क्लीन चिट दे दी। मामला पंचकूला में संस्थागत प्लॉट के दोबारा आवंटन से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि हरियाणा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी ने 2006 में इस निर्णय को विधिवत मंज़ूरी दी थी, इसलिए मामले में अनियमितता के सारे इल्जाम बेबुनियाद हैं।

उसके पहले बीते दिसंबर में नेशनल हेराल्ड मामले में ही दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय की मनी लॉन्ड्रिंग चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था। इन घटनाओं ने इस आम धारणा की पुष्टि की है कि नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में सरकारी एजेंसियों का राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल हुआ है। एजेंसियों ने जिन कथित साक्ष्यों के आधार पर अभियोग दर्ज किए, उनका जब सख्त न्यायिक परीक्षण हुआ, तो अधिकांश मामलों में वे टिक नहीं पाए। इसलिए यह अनिवार्य हो गया है कि ऐसे सारे मामलों में मुकदमे की कार्यवाही प्राथमिकता के आधार पर चलाई जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

किसी भी व्यक्ति पर सालों साल मुकदमों का साया डाले रखना या अभियुक्तों को जेल में रखना (जैसाकि दिल्ली दंगों और भीमा कोरेगांव जैसे मामलों हुआ है) किसी रूप में उचित नहीं है। इससे भारत में प्रक्रिया ही दंड है- जैसी दुर्भाग्यपूर्ण धारणा लोगों के मन में गहराती चली गई है। सर्वोच्च न्यायपालिका ने जमानत जैसे बुनियादी तकाजे के बारे में भी तत्परता ना दिखाकर ऐसी धारणा को मजबूत किया है। नतीजतन, आपराधिक न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं। अतः सुप्रीम कोर्ट के लिए उचित होगा कि वह राजनीतिक प्रकृति के तमाम संदिग्ध मामलों में जल्द सुनवाई सुनिश्चित कराए।


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