स्टेबलकॉइन की चुनौती

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वित्त मंत्री के बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि बदले हालात में तमाम देश अब स्टेबलकॉइन्स को नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसलिए कि स्टेबलकॉइन जैसे आविष्कार मुद्रा एवं पूंजी के प्रवाह का रूप बदल रहे हैं।

डॉनल्ड ट्रंप के दौर में क्रिप्टो करेंसी- खासकर स्टेबलकॉइन्स को मिली स्वीकृति तमाम देश के लिए एक चुनौती के रूप में आई है। ट्रंप काल से पहले क्रिप्टो बाजार पूरी तरह निजी क्षेत्र में था। अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल खुद ट्रंप क्रिप्टो करेंसी को लेकर अस्वीकार का भाव रखते थे। मगर दूसरे कार्यकाल में ना सिर्फ वे और उनके परिजन इस कारोबार में शामिल हुए हैं, बल्कि अमेरिकी मौद्रिक व्यवस्था में भी इसे जगह देने का प्रावधान उन्होंने किया है। स्टेबलकॉइन्स में, और उसके जरिए निवेश का रास्ता उनके प्रशासन ने तैयार किया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के इस बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि अन्य देशों को पसंद हो या नहीं, लेकिन अब वे स्टेबलकॉइन्स को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

सीतारमन ने कहा- ‘स्टेबलकॉइन जैसे आविष्कार मुद्रा एवं पूंजी के प्रवाह का रूप बदल रहे हैं।’ वित्त मंत्री की यह समझ भारतीय रिजर्व बैंक के रुख से बिल्कुल अलग है। रिजर्व बैंक ने अपनी डिजिटल करेंसी तो शुरू की है, लेकिन प्राइवेट क्रिप्टो मुद्राओं पर प्रतिबंध के पक्ष में रहा है। बहरहाल, अब बदले अमेरिकी रुख ने स्थिति बदल दी है। खबर है कि इस आशंका से ग्रस्त होकर कि स्टेबलकॉइन के जरिए अमेरिका वित्तीय पूंजी बड़े पैमाने पर अपनी तरफ खींच सकता है, चीन भी हांगकांग के रास्ते अपना युवान आधारित स्टेबलकॉइन लॉन्च करने की तैयारी में है।

स्टेबलकॉइन क्रिप्टो करेंसी ही होते हैं, लेकिन उनका मूल्य किसी देश की मुद्रा के मूल्य से जुड़ा होता है। अब तक यह मुद्रा अमेरिकी डॉलर ही है, लेकिन जल्द ही युवान से जुड़े स्टेबलकॉइन भी बाजार में आ सकते हैं। इस घटनाक्रम से चुनौती यही पेश आएगी कि निवेशकों को पैसा लगाने का अटकल आधारित एक और बाजार मिल जाएगा। इससे वास्तविक अर्थव्यवस्था के लिए पूंजी का अभाव और बढ़ सकता है। भारत जैसे देश के लिए, जहां पहले ही अर्थव्यवस्था का जरूरत से ज्यादा वित्तीयकरण हो चुका है, यह एक नई चुनौती है। वित्त मंत्री ने इसे समझा है- यह अच्छी बात है। लेकिन इसके बरक्स उनके पास क्या योजना है, असल सवाल यह है।


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