दो पाटन के बीच

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यह निर्विवाद है कि अस्पतालों और बीमा कंपनियों के बीच की खींचतान ने उन मध्यवर्गीय लोगों की इलाज संबंधी आश्वस्ति छीन ली है, जिनके लिए निरंतर निजीकरण का शिकार हुए हेल्थ सेक्टर में बीमा पॉलिसी की एकमात्र सहारा है।

कई बड़े अस्पतालों और कुछ बीमा कंपनियों के बीच छिड़े हालिया विवाद ने मेडिकल बीमा के पॉलिसीधारकों की मुसीबत बढ़ा दी है। कहा जा सकता है कि इन दो बड़े मुनाफा प्रेरित क्षेत्रों के टकराव में आम पॉलिसीधारक पिस रहे हैं। कुछ समय पहले मैक्स अस्पताल शृंखला ने नीवा बुपा कंपनी के पॉलिसीधारकों को कैशलेस सेवा देनी बंद कर दी। उसके कुछ ही रोज बाद एसोसिएशन ऑफ हेल्थ केयर प्रोवाइडर्स इंडिया (एएचपीआई) ने अस्पतालों को सलाह दी कि वे बजाज एलायंस के पॉलिसीधारकों की कैशलेस सेवा रोक दें। हालांकि आठ दिन के बाद बजाज एलायंस का विवाद सुलझ गया, मगर इस घटनाक्रम ने बीमा आधारित स्वास्थ्य देखभाल की सारी व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैँ।

अस्पतालों की शिकायत है कि कई बीमा कंपनियां इलाज पर आए खर्च का भुगतान करने में ना-नुकुर करती हैं। उधर बीमा कंपनियों की शिकायत है कि अस्पताल पॉलिसीधारकों के बिल बढ़ा-चढ़ा कर बनाते हैं- इस कारण उन्हें इलाज पर आए असली खर्च से अधिक का भुगतान करना पड़ता है। बीमा कंपनियों के मुताबिक कोरोना काल के बाद की अवधि में मेडिकल मुद्रास्फीति 14-15 प्रतिशत रही है। अस्पतालों के मुताबिक ये दर एक अंक में है, जिसे बीमा कंपनियां बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रही हैं। इनके बीच सच चाहे जो हो, मगर यह निर्विवाद है कि इस खींचतान ने उन मध्यवर्गीय लोगों की इलाज संबंधी आश्वस्ति छीन ली है, जिनके लिए निरंतर निजीकरण का शिकार हुए हेल्थ सेक्टर में पॉलिसी की एकमात्र सहारा है।

अस्पतालों का आरोप है कि बीमा कंपनियां पॉलिसी की जो फीस वसूलती हैं, उनमें से 60 फीसदी का ही इलाज के बदले भुगतान करती हैं। बाकी 40 प्रतिशत वे अन्य मदों में ट्रांसफर कर देती हैँ। हैरतअंगेज है कि जिस समय यह विवाद तीखा होता जा रहा है और पॉलिसीधारक उसकी कीमत चुका रहे हैं, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट ऑथरिटी ऑफ इंडिया की भूमिका अन्य क्षेत्रों की विनियामक संस्थाओं की तरह ही अदृश्य बनी हुई है। गौरतलब है कि ऐसे तजुर्बे से सिर्फ भारत ही नहीं गुजर रहा है। जहां भी हेल्थ केयर सेक्टर का अनियंत्रित निजीकरण हुआ, वहां यही कहानी रही है।


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