गहराती हुई चुनौतियां

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एससीओ की आतंकवाद विरोधी एजेंसी की सदारत अब पाकिस्तान करेगा, जिसे भारत पहलगाम हमले के लिए दोषी मानता है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तालिबान प्रतिबंध समिति का अध्यक्ष और परिषद की आतंकवाद विरोधी समिति का उपाध्यक्ष वह पहले से ही है।

पाकिस्तान अब शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की आतंकवाद-विरोधी एजेंसी का अध्यक्ष बन गया है। किर्गिजिस्तान में एससीओ के रिजनल एंटी-टेररिस्ट स्ट्रक्चर (रैट्स) की बैठक में उसे यह पद मिला। वहां भारतीय प्रतिनिधि ने पहलगाम में आतंकवादी हमले का मुद्दा उठाया और उसके प्रायोजकों को बेनकाब करने का आह्वान किया। रैट्स ने एससीओ के तियानजिन शिखर सम्मेलन में जारी साझा घोषणापत्र की भाषा को दोहराते हुए पहलगाम हमले की निंदा की। मगर इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि इस एजेंसी की सदारत अब पाकिस्तान करेगा, जिसे भारत पहलगाम हमले के लिए दोषी मानता है। इसके पहले पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तालिबान प्रतिबंध समिति का अध्यक्ष और सुरक्षा परिषद की आतंकवाद विरोधी समिति का उपाध्यक्ष चुना गया था।

पाकिस्तान को ये अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियां उस समय मिलीं, जब पहलगाम हमले का जख्म हरा था और भारत ने विश्व मंचों पर पाकिस्तान को अलग-थलग कराने की मुहिम छेड़ रखी थी। सुरक्षा परिषद में बेशक चीन भी स्थायी सदस्य है, लेकिन वहां अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, और फ्रांस की भी ऐसी ही हैसियत है। इन पांचों में सहमति के बिना कोई निर्णय वहां नहीं होता। एससीओ में भी रूस मौजूद है, जिससे भारत के परंपरागत संबंधों का अक्सर खूब बखान होता है। फिर भी इन दोनों जगहों पर पाकिस्तान को आतंकवाद विरोधी जिम्मेदारी मिल गई है।

इसका क्या संकेत है? संभवतः यही कि भारत अपनी राय तार्किक रूप से विश्व मंचों पर रखने में नाकाम हो रहा है। या फिर दुनिया के समीकरण इतने बदल गए हैं, जिसमें पाकिस्तान की हैसियत अचानक बढ़ गई है। अमेरिका से पाकिस्तान के व्यापार संबंध लगातार गहरे हो रहे हैं। इसी हफ्ते अमेरिकी कंपनी यूएस स्ट्रेटेजिक मेटल्स ने पाकिस्तान में आधुनिक उद्योगों के लिए महत्त्वपूर्ण खनिजों के खनन और रिफाइनरी प्लांट लगाने के लिए 50 करोड़ डॉलर का करार पाकिस्तान से किया है। ये तमाम खबरें भारत के लिए बढ़ रही कूटनीतिक चुनौतियों का संकेत हैं। दशकों से पाकिस्तान के भारत विरोधी मंसूबों को बेनकाब करना और आतंकवाद के मुद्दे पर उसे अलग-थलग करवाना भारतीय विदेश नीति का खास लक्ष्य रहा है। मगर इसमें अब लगातार झटके लग रहे हैँ।


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