टूटते राजमार्ग और पुल-पुलिया, टपकता हवाई अड्डा और सेंट्रल विस्टा…!

भोपाल। कहते हैं की नीव मजबूत हो तब इमारत भी मजबूत बनती है, लगता है कि सांप्रदायिक और धार्मिक विभाजन पर चुनाव जीतने से बनी सरकार की इमारत धसकने लगी है। मोदी जी के कुछ फैसले बानगी के तौर पर देखे जा सकते हैं। मौजूदा संसद भवन को संग्रहालय बनाने के लिए अरबों रुपये की लागत से बना विवादित सेंट्रल विस्टा में संसद का वर्षा ऋतु का अधिवेशन की ज़ोर –शोर की घोषणा, आखिरकार उस नव निर्मित इमारत (स्मारक कहना ज्यादा उचित होगा) में नहीं हो सकी ! उसी भांति जैसे कालाधन खत्म करने की घोषणा के साथ दो हजार रुपये के नोट बंद किए गये थे अथवा मंहगाई पर रोक लगाने की तरकीब भी बताई गयी थी। पर हुआ क्या टमाटर और अदरख तथा हरी मिर्च जैसी सब्जियां ही सैकड़ा पार करके एक किलो में मिल रही हैं। वैसे अंडमान के पोर्ट ब्लेयर में नव निर्मित हवाई अड्डे का नामकरण संघ और बीजेपी के युग पुरुष सावरकर के नाम पर हुआ परंतु द्वीप की पहली ही बरसात में ना केवल वहां पानी भर गया वरन उसमे छत पर सजावट के लिए लगे फाल्स सीलिंग भी फाल्स ही साबित हुई और लटक गयी

उफ! आत्मघाती 21वीं सदी

हर दौर वक्त की छाप लिए होता है। वह राहु-केतु-शनि की प्रवृत्तियों के अपने साये में जीव-जंतुओं का खेला बनाए होता है। तभी तो मौजूदा दौर विनाश के विषाणुओं, वायरस का है। मानो समय थक गया है। पृथ्वी छीज गई है। पिछली सदी के आखिर में व इक्कीसवीं सदी के आरंभ में उम्मीदों का उत्साह था। नई सहस्त्राब्दी, ग्लोबलाइज्‍ड जीवन, तकनीक-संचार-डिजिटल क्रांति की भविष्यगामी उमंगें थीं। मिलेनियम पीढ़ी, भावी पीढ़ियों का सुनहरा वक्त आता लगता था। इतिहास खत्म होने मतलब लड़ाई-झगड़े, युद्ध की समाप्ति की भविष्यवाणी थी। टाइम कैप्सूल के गड्ढों में अतीत दफन होता हुआ था। तभी अचानक 9/11 हुआ।

logo