The US@250: सबसे श्रेष्ठ होने की ढही कहानियां

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गहराते राजनीतिक ध्रुवीकरण और लगातार तीक्ष्ण होते सामाजिक अंतर्विरोधों के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी स्थापना- यानी ब्रिटिश राजशाही से आजादी की घोषणा- की 250वीं सालगिरह मनाई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये अवसर उस समय आया, जब दुनिया पर आठ दशकों से जारी अमेरिकी वर्चस्व की जड़ें डगमगाती मालूम पड़ी हैं। अमेरिकी सैन्य शक्ति की विनाशकारी क्षमता और उसके वित्तीय बाजारों की विशालता पर अभी भी कोई शक नहीं है, लेकिन जिन अन्य पहलुओं ने संयुक्त राज्य का वैश्विक रुतबा बनाया, उनका क्षय आज सबके सामने है।

अमेरिकी रुतबे का एक बड़ा पहलू अमेरिका को लेकर प्रचलित रहीं धारणाएं हैं। ये कहानियां आज बिखरी नज़र आती हैँ। वैसे, जब इन कहानियों की दमदार मौजूदगी थी, तब भी ये हकीकत से ज्यादा मिथक ही थीं। मिथक यानी ऐसी कथाएं जिनका कोई साक्ष्य या जिनकी सच्चाई की पुष्टि करने वाले तथ्य मौजूद ना हों। इनमें एक बड़ा मिथक ‘अमेरिकी विशिष्टता’ (American Exceptionalism) का रहा है। यानी यह सोच कि संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया के अन्य देशों से मौलिक रूप से अलग और श्रेष्ठ है।

बहरहाल, संयुक्त राज्य अमेरिका की स्थापना की 250वीं सालगिरह ऐसी धारणाओं के परीक्षण का एक उचित मौका है। ऐसा करने की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि भारत जैसे देशों में भी बहुत से लोग इन धारणाओं में सचमुच यकीन करते हैं। दरअसल, इस यकीन के प्रसार की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है। इस सिलसिले में यह अवश्य याद रखना चाहिए कि शक्तिशाली का महिमामंडन ऐतिहासिक परिपाटी है। अक्सर ऐसे महिमा-गान खुद साम्राज्य के दरबारी तैयार करते हैं, जिन पर बहुत से अन्य लोग इसलिए सहज भरोसा कर लेते हैं, क्यों कि साम्राज्य की शक्ति उन्हें सचमुच चकाचौंध करने वाली मालूम पड़ती है।

वैसे तो 20वीं सदी के आरंभ से संयुक्त राज्य की आर्थिक एवं सैन्य शक्ति का प्रताप फैलने लगा था, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह दुनिया का सबसे प्रबल कथानक बन गया। तब से जो पीढ़ियां बड़ी हुईं, उन्हें यह शक्ति चुनौती-विहीन अवस्था में खड़ी नजर आई। तो लाजिमी था कि बड़ी संख्या में लोग इस शक्ति और प्रताप को स्वीकार्य बनाने के लिए प्रचारित किए गए मिथकों में यकीन करने लगे। उनमें अमेरिकी विशिष्टता का कथानक सर्वोपरि रहा। इस अवधारणा को तीन प्रमुख तर्कों पर खड़ा किया गयाः

  • अद्वितीय इतिहास और स्थापना: अमेरिका की स्थापना किसी पुरानी परंपरा या राजशाही द्वारा नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लोकतंत्र, और मानवाधिकार जैसे विशिष्ट सिद्धांतों से हुई है।
  • वैश्विक मिशन: दुनिया भर में स्वतंत्रता और लोकतंत्र का प्रसार करना अमेरिका का मकसद रहा है।
  • ऐतिहासिक श्रेष्ठता: अपनी अनोखी व्यवस्था के कारण अमेरिका अन्य देशों की तरह पतन या सामान्य ऐतिहासिक संकटों से मुक्त है।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस एजेंट जेमिनी के मुताबिकः ‘अमेरिकी विशिष्टता’ का सरल भाषा में अर्थ अमेरिका को दुनिया के लिए एक आदर्श मार्गदर्शक या “चमकता हुआ शहर” (Shining City on a Hill) मानने की सोच है।

American Exceptionalism की अवधारणा गढ़ने का श्रेय फ्रेंच विचारक एलेक्सिस डी तॉकविले को दिया जाता है। सामंती पृष्ठभूमि से आए तॉकविले ने तत्कालीन फ्रेंच सरकार के आग्रह पर 1830 के दशक में अमेरिका की यात्रा की थी। यात्रा के अनुभवों को समाहित करते हुए उन्होंने ‘डेमोक्रेसी इन अमेरिका’ नामक किताब दो खंडों में लिखी। ये वो दौर था, जब यूरोप अभी राजतंत्र एवं सामंतवाद के साये में था। ऐसे में तॉकविले की ये बात यूरोपवासियों को बड़ी आकर्षक लगी कि अमेरिका में सामंतवाद नहीं है- और वहां चुनावी लोकतंत्र पर आधारित शासन व्यवस्था कायम हो चुकी है। इसी क्रम में तॉकविले ने अमेरिकियों को ‘विशिष्ट’ (Exceptional) कहा था, जिसे यूरोपियन्स ने सहजता से स्वीकार कर लिया। और वहां से ये बात सारी दुनिया में फैलने लगी।

इसके जरिए यह बताने का प्रयास किया गया कि कैसे अमेरिका की भौगोलिक स्थिति और लोकतांत्रिक मूल्य उसे बाकी दुनिया से अलग बनाते हैं। तॉकविले ने उस समय जो धारणा बनाई, वह अमेरिकियों को भी रास आई। तब से ये धारणा किसी ना किसी रूप में चर्चित रही है। 1945 के बाद जब पश्चिमी साम्राज्यवाद का नेतृत्व अमेरिका ने संभाला, तब से इस धारणा को सुनियोजित रूप से प्रचलित और प्रचारित किया जाता रहा है।

तॉकविले अमेरिका में धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक व्यवस्था (राज्य को धर्म से अलग रखने), स्थानीय नगरपालिकाओं की सक्रियता, संघीय व्यवस्था, जूरी प्रणाली और नागरिक भागीदारी को देखकर बहुत मोहित हुए थे। हालांकि उन्होंने अमेरिका में मौजूद नस्लवाद, गुलामी और मूलवासियों के संहार की भी चर्चा की, लेकिन ये बातें उन्हें उतनी महत्त्वपूर्ण महसूस नहीं हुईं, जितनी वो व्यवस्थाएं, जो वहां यूरोपियन्स के श्वेत वंशजों ने अपने लिए बनाई थीं।

तॉकविले ने लिखा कि गुलामी नैतिक रूप से गलत है और यह प्रथा लोकतंत्र के साथ-साथ नहीं चल सकती। उन्होंने यह भविष्यवाणी भी की थी कि गुलामी समाप्त होने के बाद भी नस्लीय भेदभाव खत्म नहीं होगा। मूलवासियों के सिलसिले में उन्होंने लिखा कि संधियों के बावजूद उनकी भूमि छीनी जा रही है, उन्हें पश्चिम की ओर धकेला जा रहा है, और यह सब कानून के नाम पर किया जा रहा है। इसके बावजूद यह हैरतअंगेज है कि उन्होंने अमेरिकी विशिष्टता की धारणा गढ़ी!

बहरहाल, इस सोच में कितना दम है? आइए, कुछ तथ्यों पर गौर करेः

  • अमेरिका खुद को स्वतंत्रता और लोकतंत्र का ध्वजवाहक बताता है, लेकिन उसका अपना इतिहास इसके विपरीत है। अमेरिकी गणराज्य की स्थापना के बाद लगभग एक सदी तक वहां गुलामी प्रथा चली। उससे जन्मे नस्लवाद से अमेरिका आज तक मुक्त नहीं हुआ है। खुद अमेरिकी विद्वानों ने अकादमिक सिद्धांत- क्रिटिकल रेस थ्योरी- विकसित किया। इसके मुताबिक नस्लवाद एक कानूनी और शैक्षणिक ढांचा है, जिसके तहत अमेरिकी कानून और संस्थाएं नस्लीय असमानता को बनाए रखती हैं। डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों में इस सिद्धांत को पढ़ाने पर अब रोक लगा दी है।
  • अमेरिकी संविधान निर्माताओं में बहुसंख्या ऐसे व्यक्तियों की थी, जो खुद गुलाम रखते थे। Bill of Rights (मनुष्य का अधिकार-पत्र) लिखने वाले जेम्स मेडिसन और अमेरिकी संविधान लिखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले थॉमस जेफरसन भी गुलाम-मालिकों में शामिल थे। ऐसे में यह विडंबना ही है कि सभी मनुष्यों को बराबर घोषित करने वाले दस्तावेजों के लेखकों को खुद गुलाम रखने में कोई अंतर्विरोध नजर नहीं आया।
  • इसी तरह मूलवासी अमेरिकियों (Native Americans) के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने की कोई प्रभावशाली कोशिश आज तक अमेरिका में नहीं की गई है। बल्कि मूलवासियों के संहार और उन्हें विस्थापित करने से जुड़ी शख्सियतों और प्रतीक चिह्नों को वहां आज भी नायक माना जाता है।
  • अमेरिका ने अक्सर लोकतंत्र और मानव अधिकारों का पहरुआ होने का दावा किया है, लेकिन अपने हितों के लिए वह दुनिया भर में बर्बर तानाशाहों का समर्थन करता रहा है। अनेक देशों में उसने साजिशन लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों को गिराया है। साथ ही उसने अक्सर दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल दिया है।
  • वियतनाम, इराक, लीबिया, अफगानिस्तान और अब ईरान जैसे युद्धों को लोकतंत्र और स्वतंत्रता के प्रसार के नाम पर अमेरिकी प्रचार तंत्र ने सही ठहराया, जबकि इन जंगों की वजह से उन देशों में भारी तबाही और अस्थिरता पैदा हुई।
  • अमेरिकी शासक वर्ग में खुद को ‘अंतरराष्ट्रीय कानूनों’ से ऊपर समझने की प्रवृत्ति रही है। इस कारण अमेरिका सरकार खुद को वैश्विक नियमों से ऊपर मानती रही है। वह अक्सर उन अंतरराष्ट्रीय संधियों या अदालतों (जैसे International Criminal Court) के निर्णय को मानने से इनकार कर देती है, जो उसे अपने हितों के माफिक नहीं लगते। जबकि बाकी देशों से वह उम्मीद रखती है कि वे इन नियमों या अदालती फैसलों का पालन करें।
  • अमेरिका अपने घरेलू कानूनों को अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के नियम समझता है। व्यापार या अन्य क्षेत्रों में अक्सर ऐसे कानूनों को वह अन्य देशों पर लागू करने की कोशिश करता है। स्पष्टतः विशिष्टता की सोच ने अमेरिकी समाज में यह धारणा पैदा की है कि उसकी संस्कृति, राजनीतिक व्यवस्था, और जीवन शैली दुनिया में सबसे बेहतर है। नतीजतन, अमेरिकी शासक वर्ग अन्य देशों की संस्कृतियों और उनकी संप्रभु प्रणालियों के प्रति अपमान का भाव रखता है।

इन उदाहरणों से जाहिर है कि अमेरिका कोई “अनोखा” देश नहीं है। पूर्व की अन्य महाशक्तियों (ब्रिटेन या रोमन साम्राज्य) की तरह वह भी अपनी राष्ट्रीय शक्ति, और भौगोलिक एवं आर्थिक हितों के आधार पर काम करता है, ना कि किसी नैतिक मिशन से प्रेरित होकर। एक सेटलर कॉलोनी (औपनिवेशिक बस्ती) से शुरुआत कर वह महाशक्ति बना, तो उसकी भौतिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमियां थीं। इनमें मूलवासियों से छीनी गई अपार प्राकृतिक संपदा, विस्तारवादी नीतियों के तहत दूसरे देशों से छीने गए इलाकों, गुमामों के श्रम के शोषण आदि का सर्वोपरि आरंभिक योगदान रहा।

बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में अमेरिका का उदय 1861-65 के गृह युद्ध के बाद शुरू हुआ। दोहराव के जोखिम के बावजूद ये तथ्य ध्यानार्थ हैः

* सेटलर कॉलोनी के रूप में बसने और युद्धों के जरिए क्षेत्रीय विस्तार ने अमेरिका को कच्चे माल की अभूतपूर्व प्रचुरता प्रदान की थी। अप्लेशियन पर्वत और अन्य क्षेत्रों में कोयला और लौह अयस्क ने इस्पात उत्पादन को गति दी। पेंसिल्वेनिया (1859) और बाद में टेक्सस में खोजे गए तेल ने ऊर्जा के नए स्रोत प्रदान किए। पश्चिमी इलाकों में मौजूद लकड़ी, तांबा, सोना और चांदी से औद्योगिक विकास और पूंजी संचय को बल मिला। मूल निवासियों से छीनी गई मध्य-पश्चिम की उपजाऊ भूमि सरप्लस कृषि उत्पादन का जरिया बनी, जिससे औद्योगिक मजदूरों का पेट भरा और कृषि पैदावार के निर्यात से आय की संभावनाएं बनीं।

* गुलामी से कानूनी तौर पर मुक्त, लेकिन वास्तव में अनेक भेदभाव एवं आर्थिक शोषण के शिकार अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय ने औद्योगिक विकास के लिए बेहद सस्ता श्रम उपलब्ध कराया। इस तरह औद्योगिक विकास की प्राथमिक दो शर्ते- भूमि और श्रम- अमेरिका को सहजता से उपलब्ध हुए थे।

* 1869 में पूरे देश को रेलमार्ग से जोड़ने का काम पूरा हुआ। इससे महाद्वीपीय आकार का ये देश एक विशाल बाजार में तब्दील हुआ। रेलमार्ग से कारखानों तक कच्चा माल और उपभोक्ताओं तक तैयार माल पहुंचाना संभव हुआ। मगर इससे मूल निवासियों का और अधिक विस्थापन हुआ। ।

* समृद्धि आने और औद्योगिक ढांचे के प्रसार से आविष्कारों को बल मिला, जिससे नई उत्पादन विधियां अस्तित्व में आईं। मसलन, बेसेमर प्रक्रिया (1856 में ब्रिटिश इंजीनियर सर हेनरी बेसेमर ने पहली ऐसी औद्योगिक तकनीक विकसित की, जिसने पिग आयरन से सस्ता और बड़े पैमाने पर स्टील उत्पादन संभव बनाया) और बाद में खुली भट्ठी विधि ने सस्ते और बड़े पैमाने पर इस्पात उत्पादन की राह खोली।

* वो दौर नए आविष्कारों का था। उन्हीं दिनों यूरोप में बिजली का औद्योगिक एवं उपभोक्ता मकसदों से इस्तेमाल शुरू हुआ। इससे असेम्बली लाइन प्रोडक्शन संभव हुआ। टेलीग्राफ और टेलीफोन के आविष्कार ने संचार को गति दी। वित्तीय पूंजी की भरपूर उपलब्धता के कारण अमेरिका में इन तकनीकों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया।

* इन वजहों से बड़े कॉरपोरेट घरानों का उदय होने लगा, जो 20वीं सदी में अमेरिका की खास आर्थिक ताकत बने।

साल 1900 तक अमेरिका ब्रिटेन को पछाड़कर दुनिया का अग्रणी औद्योगिक उत्पादक शक्ति बन चुका था। 1913 तक वैश्विक औद्योगिक उत्पादन में इसका योगदान एक तिहाई से अधिक हो चुका था। इस आर्थिक ताकत ने अमेरिकी समाज को नया आकार दिया और विदेशों में अमेरिकी शक्ति का रुतबा बनने लगा।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका की प्रतिद्वंद्वी यूरोपीय औद्योगिक शक्तियां तबाह हो गईं। जबकि भौगोलिक रूप से दूर होने के कारण अमेरिका अपनी बुनियादी संरचना को बरकरार रखने में सफल रहा। इससे उसकी हैसियत सर्वोपरि आर्थिक महाशक्ति की बनी। तब से विश्व पूंजीवादी ढांचे और सुरक्षा तंत्र को वह अपने माफिक ढंग से आकार देता रहा है।

शीत युद्ध के दिनों में सोवियत खेमे के देश इन ढांचों से अलग रहे। लेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया का “एक-ध्रुवीय” क्षण आ गया। मगर उसके साढ़े तीन दशक बाद के इतिहास को हम उस क्षण के प्रतिवाद (anti-thesis) के रूप में देख सकते हैं। इस दौर में अमेरिका केंद्रित एवं संचालित वैश्विक ढांचों को नवोदित शक्तियों से चुनौती मिली है। इस बीच अपनी अर्थव्यवस्था का अत्यधिक वित्तीयकरण कर अमेरिकी शासक वर्ग ने अपने देश की उस उत्पादन क्षमता को खुद कमजोर किया है, जिस वजह से अमेरिका को अपरिहार्य समझा जाने लगा था। इस क्षमता के जाने के बाद उसका हाई टेक वर्चस्व भी टूटने लगा है। और इस वर्ष ईरान ने अमेरिकी सैन्य क्षमता की सीमाओं को बेनकाब कर दिया है।

बहरहाल, इन सबसे भी बड़ा झटका “अमेरिकी विशिष्टता” की धारणा में लगी सेंध है। अमेरिकी राजनेता, थिंक टैंक, मीडिया, हॉलीवुड, प्रकाशन, एवं अन्य प्रचार तंत्र अपनी बेजोड़ ताकत से इस धारणा को लंबे समय तक बनाए रखने में कामयाब हुए। लेकिन सोशल मीडिया के उदय, विकेंद्रित विमर्श की बनी संभावनाओं, और चीन के उदय के साथ छिड़े नए वैचारिक विमर्श से उस धारणा की हकीकतें उजागर होनी लगी हैं। इजराइल के हाथों फिलस्तीनियों के मानव संहार को खुलेआम समर्थन देकर अमेरिकी शासक वर्ग ने खुद भी अपने को बेपर्द किया है। इस बीच अमेरिका में तेजी से बढ़ी आर्थिक गैर-बराबरी, सामाजिक तनाव, और राजसत्ता की उच्छृंखलता से अमेरिकन ड्रीम की धारणा तथा अमेरिका के अवसर की भूमि होने की मान्यता पर जोरदार प्रहार हुआ है।

नतीजतन, अमेरिका अपनी स्थापना की ढाई सौवीं सालगिरह पर अभूतपूर्व चुनौतियों से घिरा नजर आया है। अमेरिकी शासक उचित ही यह देखकर हतप्रभ हैं कि दुनिया अब उन्हें विशिष्ट नहीं मान रही है।


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