कहानी पर भारी तमाशा: ‘वेलकम टू द जंगल’

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फ़िल्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह लगातार हंसाने की कोशिश करती है, लेकिन अपने पात्रों को जीने का अवसर ही नहीं देती।…जबकि अच्छी कॉमेडी ठहराव से पैदा होती है। चार्ली चैप्लिन की मुस्कान, ऋषिकेश मुखर्जी की सहजता, बासु चटर्जी का घरेलूपन या प्रियदर्शन की अफरा-तफरी, इन सबमें एक समानता थी। वहां हंसी इंसान से निकलती थी। परिस्थिति बाद में आती थी। ‘वेलकम टू द जंगल’ में परिस्थिति पहले आती है, इंसान बाद में।

सिने-सोहबत

हर दौर की कॉमेडी अपने समय का आईना होती है। एक समय था जब हमें हंसाने के लिए बड़े पर्दे पर मशहूर हास्य कलाकार महमूद की मौजूदगी काफ़ी थी। फिर जॉनी लीवर ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी को हास्य में बदला। उसके बाद प्रियदर्शन ने अफरा-तफरी को कला बना दिया, जहां हर गलतफहमी एक नई हंसी को जन्म देती थी लेकिन आज का समय कुछ और है। आज शोर को ऊर्जा और भीड़ को मनोरंजन समझ लिया गया है। शायद इसी बदलते सिनेमाई मानस का सबसे बड़ा उदाहरण है अहमद खान निर्देशित ‘वेलकम टू द जंगल’। आज के सिने-सोहबत में इसी फ़िल्म पर चर्चा करते हैं।

यह फ़िल्म केवल एक फ्रेंचाइज़ी की अगली कड़ी नहीं है; यह उस दौर का बयान भी है जहां निर्माता मान बैठे हैं कि यदि पर्दे पर पर्याप्त सितारे इकट्ठे कर दिए जाएं, तो दर्शक कहानी की कमी भूल जाएगा। लेकिन सिनेमा कभी भी केवल चेहरों का जोड़ नहीं रहा। वह हमेशा भावनाओं का गुणा रहा है।

सन 2007 में आई ‘वेलकम’ आज भी इसलिए याद की जाती है क्योंकि उसके पात्र अपने संवादों से नहीं, अपनी कमजोरियों से हमारे अपने लगने लगे थे। उदय शेट्टी का अपराधी होकर भी पारिवारिक होना, मजनू भाई का गुंडा होकर भी चित्रकार होना और डॉ. घुंघरू की घबराहट, ये सब मिल कर एक ऐसी दुनिया बनाते थे जो अविश्वसनीय होते हुए भी विश्वसनीय लगती थी। ‘वेलकम टू द जंगल’ उसी दुनिया में लौटना चाहती है, लेकिन रास्ते में शायद उसे यह भ्रम हो जाता है कि हंसी का जन्म संवादों से नहीं, डेसिबल से होता है।

फ़िल्म शुरू होते ही अपने इरादे साफ़ कर देती है। तर्क, यथार्थ और गंभीरता को प्रवेश द्वार पर ही छोड़ देना होगा। आगे केवल रोमांच है, भगदड़ है, एक्शन है, चुटकुले हैं और इतने सारे कलाकार हैं कि कभी-कभी लगता है जैसे किसी अवॉर्ड समारोह का समूह चित्र अचानक चलने लगा हो। इस विराटता में एक आकर्षण है। दर्शक बार-बार नए चेहरों को देखकर चौंकता है। लेकिन यही आकर्षण धीरे-धीरे थकान में बदल जाता है। क्योंकि सिनेमा का सबसे बड़ा नियम आज भी वही है, दर्शक पहले पात्र से जुड़ता है, फिर उसकी यात्रा से। यहां यात्रा कम है, यात्री ज़्यादा हैं।

फ़िल्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह लगातार हंसाने की कोशिश करती है, लेकिन अपने पात्रों को जीने का अवसर ही नहीं देती। हर दृश्य अगले दृश्य की ओर इतनी तेजी से भागता है कि भावनाएं साँस लेने से पहले ही कट जाती हैं। मानो निर्देशक को डर हो कि यदि कैमरा पांच सेकंड भी ठहर गया तो दर्शक हंसना भूल जाएगा। लेकिन अच्छी कॉमेडी ठहराव से पैदा होती है। चार्ली चैप्लिन की मुस्कान, ऋषिकेश मुखर्जी की सहजता, बासु चटर्जी का घरेलूपन या प्रियदर्शन की अफरा-तफरी, इन सबमें एक समानता थी। वहां हंसी इंसान से निकलती थी। परिस्थिति बाद में आती थी। ‘वेलकम टू द जंगल’ में परिस्थिति पहले आती है, इंसान बाद में।

फ़िल्म की सबसे बड़ी पूंजी हैं अक्षय कुमार। पिछले कुछ वर्षों में कई अलग-अलग शैलियों में दिखाई देने के बाद यहां वे फिर उसी सहज कॉमिक लय में लौटते हैं जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे भरोसेमंद हास्य अभिनेताओं में शामिल किया। उनके चेहरे का भाव, संवादों की गति और शारीरिक अभिनय कई बार उन दृश्यों को बचा लेते हैं जिन्हें पटकथा अकेले नहीं संभाल पाती। परेश रावल को देखना हमेशा सुखद होता है। उनकी उपस्थिति एक भरोसा देती है कि हास्य केवल संवाद

नहीं, अभिनय की लय भी होता है। दुर्भाग्य से इस बार पटकथा उनके अनुभव का पूरा लाभ नहीं उठा पाती। उनके हिस्से कुछ चमकते क्षण आते हैं, लेकिन वे क्षण पूरी फ़िल्म की आत्मा नहीं बन पाते।

फ़िल्म का सबसे दिलचस्प पक्ष उसका पैमाना है। इतने बड़े कलाकार समूह को एक साथ पर्दे पर व्यवस्थित करना किसी भी निर्देशक के लिए कठिन कार्य है और तकनीकी दृष्टि से अहमद खान इस चुनौती को निभाते भी हैं। कैमरा लगातार गतिशील है। दृश्य भव्य हैं। जंगल केवल लोकेशन नहीं, एक विशाल खेल का मैदान बन जाता है। एक्शन और कॉमेडी का सम्मिश्रण कई जगह प्रभावशाली भी लगता है। लेकिन यहीं एक प्रश्न जन्म लेता है। क्या बड़ा होना ही बेहतर होना है? आज का भारतीय सिनेमा अक्सर इस भ्रम में दिखाई देता है कि स्केल ही गुणवत्ता का पर्याय है। विशाल सेट, सैकड़ों जूनियर आर्टिस्ट, विदेशी लोकेशन, वीएफएक्स और सितारों की लंबी सूची के बीच कहानी कई बार सबसे अकेली चीज़ बन जाती है। ‘वेलकम टू द जंगल’ उसी प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती है। उसका हर फ्रेम कहता है, “देखो, हमारे पास कितना कुछ है”। लेकिन भीतर से एक आवाज़ पूछती है कि आख़िर “कहना क्या है”?

फ़िल्म संगीत और बैकग्राउंड स्कोर का इस्तेमाल भी उसी अतिशयता के साथ करती है। हर दृश्य में ऊर्जा है, लेकिन बहुत कम दृश्य ऐसे हैं जो समाप्त होने के बाद स्मृति में टिकते हैं। हंसी तत्काल मिलती है, याद बहुत कम बचती है। शायद इसलिए कि हास्य का सबसे बड़ा साथी शोर नहीं, मौन होता है। जब कोई कलाकार बिना संवाद बोले केवल आंखों से हंसा देता है, तभी कॉमेडी कालजयी बनती है। यह फ़िल्म उस मौन से डरती हुई लगती है।

फिर भी इसे पूरी तरह खारिज कर देना उचित नहीं होगा। लोकप्रिय सिनेमा का उद्देश्य हमेशा दार्शनिक होना नहीं होता। कई बार उसका काम केवल दर्शक को दो-ढाई घंटे जीवन की चिंताओं से दूर ले जाना होता है। उस कसौटी पर फ़िल्म कई जगह सफल भी होती है। थिएटर में बैठे परिवार, बच्चों की हंसी और दोस्तों की सामूहिक प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि इस तरह के मनोरंजन की मांग आज भी बनी हुई है। लेकिन एक आलोचक का काम केवल यह पूछना नहीं कि दर्शक हंसा या नहीं। उसे यह भी पूछना चाहिए कि वह किस बात पर हंसा। और क्या वह हंसी थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी उसके साथ चली?

यहीं आकर ‘वेलकम टू द जंगल’ थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती है। यह मनोरंजन तो देती है, लेकिन स्मृति नहीं रचती। यह तमाशा दिखाती है, लेकिन दुनिया नहीं बनाती। यह चुटकुले सुनाती है, लेकिन चरित्र नहीं गढ़ती। और महान कॉमेडी की पहचान यही होती है कि उसके पात्र हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। हम उन्हें फिल्मों में नहीं, अपने दोस्तों में खोजने लगते हैं। ‘जाने भी दो यारों’, ‘गोलमाल’, ‘चुपके चुपके’, ‘अंदाज़ अपना अपना’, ‘हेरा फेरी’ और पहली ‘वेलकम’ इसी कारण समय की कसौटी पर खड़ी रहती हैं।

अंततः ‘वेलकम टू द जंगल’ हमें एक बड़े प्रश्न के सामने छोड़ जाती है। क्या आज का लोकप्रिय हिंदी सिनेमा दर्शक को हंसाना चाहता है, या केवल उसका ध्यान भटकाना? दोनों में बहुत महीन अंतर है। हंसी भीतर से आती है। तमाशा बाहर से। फ़िल्म तमाशे में सफल है, हंसी में आंशिक। और शायद इसी कारण थिएटर से बाहर निकलते हुए सबसे ज़्यादा याद जंगल नहीं रहता, बल्कि वह पुरानी ‘वेलकम’ याद आती है जिसने हमें सिखाया था कि हास्य तब जन्म लेता है जब कहानी के भीतर धड़कता हुआ एक इंसान मौजूद हो। जंगल चाहे कितना भी घना क्यों न हो, रास्ता आखिरकार कहानी ही दिखाती है।

आपके नज़दीकी सिनेमाघर में है तो सही लेकिन अगर आप नहीं भी देख पाएंगे तो कुछ मिस नहीं करेंगे।

(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़’ के होस्ट हैं।)


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