‘ऑब्सेशन’: थिएटर के अंधेरे में लौटी रोशनी

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ऑब्सेशनकहती है कि यदि कहानी में दम हो, तो करोड़ों डॉलर के सेट, विशाल वीएफएक्स और सुपरस्टार हमेशा जरूरी नहीं होते। सिनेमा का मूल तत्व आज भी वही है, एक अच्छी कहानी, कुछ विश्वसनीय पात्र और दर्शक के मन को छू लेने वाली भावनाएं।

सिने सोहबत

आज के सिने-सोहबत में हाल ही में थिएटर में रिलीज़ हुई हॉलीवुड फ़िल्म ‘ऑब्सेशन’ पर चर्चा करते हैं। सिनेमा के इतिहास में समय-समय पर कुछ ऐसी फ़िल्में आती हैं जो केवल सफल नहीं होतीं, बल्कि पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री को आईना दिखाती हैं। वे यह याद दिलाती हैं कि आखिर दर्शक सिनेमाघर तक क्यों आते हैं। इस वर्ष हॉलीवुड की चर्चित हॉरर-थ्रिलर ‘ऑब्सेशन’ ऐसी ही एक फ़िल्म बनकर उभरी है।

इस फ़िल्म को लेकर जितनी चर्चा इसके डरावने दृश्यों की हुई है, उससे कहीं अधिक चर्चा इसके निर्माण और व्यवसायिक सफलता की हो रही है। एक ऐसे दौर में जब सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च करके बनाई गई फ्रेंचाइज़ी फ़िल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने के लिए संघर्ष कर रही हैं, वहीं बेहद कम लागत में बनी ‘ऑब्सेशन’ ने दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ कमाई करके सबको चौंका दिया है।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या है इस फ़िल्म में?

इसका उत्तर केवल इसके डर में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी मानवीय भावनाओं में है।

‘ऑब्सेशन’ की कहानी सतह पर एक हॉरर फ़िल्म लगती है, लेकिन भीतर से यह प्रेम, स्वामित्व, अकेलेपन और जुनून की कहानी है। फिल्म का नायक अपनी चाहत को पाने के लिए एक रहस्यमयी शक्ति का सहारा लेता है। उसकी इच्छा पूरी भी हो जाती है, लेकिन जल्द ही उसे समझ आने लगता है कि हर इच्छा की एक कीमत होती है। जिस प्रेम को वह पाना चाहता था, वही प्रेम धीरे-धीरे भयावह रूप लेने लगता है।

फ़िल्म का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह डर को केवल भूत-प्रेत या जंप-स्केयर तक सीमित नहीं रखती। यहां डर किसी अंधेरे कमरे में नहीं, बल्कि एक इंसान के मन में जन्म लेता है। प्रेम और पागलपन के बीच की महीन रेखा कैसे मिटती है, फ़िल्म उसी मनोवैज्ञानिक भय को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।

निर्देशक करेी बार्कर की यह उपलब्धि इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वे पारंपरिक हॉलीवुड सिस्टम से नहीं आए। वे डिजिटल और यूट्यूब की दुनिया से उभरकर आए फ़िल्मकार हैं। उनकी युवा दृष्टि और कहानी कहने का अंदाज इस फ़िल्म को अलग पहचान देता है।

बार्कर का निर्देशन उल्लेखनीय है क्योंकि वे दर्शक को लगातार असहज बनाए रखते हैं। कई दृश्य ऐसे हैं जहां स्क्रीन पर कुछ विशेष नहीं हो रहा होता, लेकिन वातावरण इतना बेचैन कर देने वाला होता है कि दर्शक अपनी सीट पर सिमट जाता है। यही अच्छे हॉरर की पहचान है। डर तब सबसे प्रभावी होता है जब वह दिखाई देने से पहले महसूस होने लगे।

फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफी भी विशेष उल्लेख की पात्र है। कैमरे की फ्रेमिंग, खाली जगहों का इस्तेमाल और पात्रों को अकेलेपन में दिखाने का तरीका कहानी के मनोवैज्ञानिक स्वर को और गहरा करता है। कई दृश्यों में कैमरा पात्रों से थोड़ा दूर रहता है, मानो कोई अदृश्य शक्ति उन्हें देख रही हो। यह तकनीक दर्शक के भीतर लगातार बेचैनी पैदा करती है।

अभिनय की बात करें तो माइकल जॉन्स्टन और इंडे नवारेटे फिल्म की आत्मा हैं। माइकल जॉन्स्टन ने एक ऐसे युवक का किरदार निभाया है जो प्रेम और आसक्ति के बीच का फर्क समझ नहीं पाता। उनके चेहरे पर दिखाई देने वाली मासूमियत और धीरे-धीरे बढ़ती घबराहट दर्शकों को कहानी से जोड़ती है।

लेकिन फ़िल्म का सबसे यादगार प्रदर्शन इंडे नवारेटे का है। उनका किरदार एक सामान्य रोमांटिक पात्र से शुरू होकर धीरे-धीरे भय का पर्याय बन जाता है। उनके अभिनय में जो बदलाव दिखाई देता है, वह फ़िल्म को साधारण हॉरर से ऊपर उठाकर मनोवैज्ञानिक त्रासदी का रूप देता है। यही कारण है कि अनेक समीक्षकों ने उनके प्रदर्शन को फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत बताया है।

अब बात उस तत्व की, जिसे अक्सर दर्शक महसूस तो करते हैं लेकिन अलग से नोटिस नहीं करते, बैकग्राउंड म्यूजिक और साउंड डिज़ाइन। ‘ऑब्सेशन’ का संगीत कोई शोर नहीं मचाता। वह धीरे-धीरे आपके अवचेतन में प्रवेश करता है। कई दृश्यों में संगीत लगभग अनुपस्थित है, लेकिन हल्की-सी ध्वनियां, वातावरण की आवाजें और सूक्ष्म साउंड लेयरिंग दर्शक के भीतर बेचैनी पैदा करती रहती हैं।

फ़िल्म का साउंड डिज़ाइन इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि हॉरर केवल दृश्य माध्यम नहीं, बल्कि ध्वनि का भी खेल है। दरवाज़े की हल्की चरमराहट, किसी के सांस लेने की आवाज, कमरे में फैली खामोशी, ये सब मिलकर ऐसा अनुभव रचते हैं जो सिनेमाघर में कहीं अधिक प्रभावी बन जाता है।

यही कारण है कि ‘ऑब्सेशन’ उन फिल्मों में शामिल हो जाती है, जिन्हें मोबाइल स्क्रीन पर नहीं, बल्कि थिएटर में देखना चाहिए।

और शायद यही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी जीत भी है।

आज जब अधिकांश स्टूडियो रिलीज़ से पहले ही ओटीटी रणनीति तय कर लेते हैं, तब ‘ऑब्सेशन’ के निर्माताओं ने सिनेमाघरों पर भरोसा किया। उन्होंने पहले थिएटर रिलीज़ का रास्ता चुना और यह निर्णय उनके लिए अत्यंत लाभदायक साबित हुआ। यह निर्णय केवल व्यावसायिक नहीं था; यह सिनेमा के अनुभव पर विश्वास का प्रतीक था।

कोविड के बाद बार-बार यह प्रश्न पूछा गया कि क्या थिएटर का जादू खत्म हो रहा है? क्या दर्शक घर बैठकर सब कुछ देखना पसंद करेंगे? ‘ऑब्सेशन’ का उत्तर है ‘नहीं’। अगर कहानी नई हो, प्रस्तुति ईमानदार हो और फ़िल्म दर्शक को एक सामूहिक अनुभव दे सके, तो लोग आज भी टिकट खरीदकर सिनेमाघर जाते हैं।

दरअसल ‘ऑब्सेशन’ की सफलता हमें हॉलीवुड के एक बड़े बदलाव की ओर भी संकेत देती है। दर्शक अब केवल बड़े सितारों और स्थापित फ्रेंचाइज़ियों पर निर्भर नहीं हैं। वे नए विचार चाहते हैं। वे जोखिम लेने वाले फ़िल्मकारों को अवसर देना चाहते हैं। यही कारण है कि इस फ़िल्म ने कई विशाल बजट वाली फिल्मों के बीच अपनी जगह बनाई और बॉक्स ऑफिस पर अप्रत्याशित सफलता हासिल की।

यह सफलता उन स्वतंत्र फ़िल्मकारों के लिए भी प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को छोटा समझ लेते हैं। ‘ऑब्सेशन’ कहती है कि यदि कहानी में दम हो, तो करोड़ों डॉलर के सेट, विशाल वीएफएक्स और सुपरस्टार हमेशा जरूरी नहीं होते।

सिनेमा का मूल तत्व आज भी वही है, एक अच्छी कहानी, कुछ विश्वसनीय पात्र और दर्शक के मन को छू लेने वाली भावनाएं।

यही वजह है कि ‘ऑब्सेशन’ केवल एक सफल हॉरर फ़िल्म नहीं है। यह एक सांस्कृतिक घटना है। यह उस विश्वास का पुनर्जन्म है कि मौलिकता अभी मरी नहीं है। यह उस साहस का उत्सव है जो युवा फिल्मकारों को परंपरागत ढांचों को चुनौती देने के लिए प्रेरित करता है।

अंततः ‘ऑब्सेशन’हमें यह याद दिलाती है कि सिनेमा का जादू किसी बजट का मोहताज नहीं होता।

कभी-कभी एक छोटी-सी फिल्म पूरी दुनिया को यह याद दिला देती है कि सपने अब भी बड़े पर्दे पर ही सबसे खूबसूरत दिखाई देते हैं।

देख लीजिएगा।

(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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