रूसी इतिहास में युद्ध सदियों से बार-बार की परिघटना है। अमेरिकी इतिहासकार प्रो. ग्रेगोरी कार्लटन ने अपनी पुस्तक ‘रसिया: द स्टोरी ऑफ वार‘ (2017) में रूसी इतिहास का एक रोचक आकलन किया है। … ऐतिहासिक रूप से रूसियों के लिए युद्ध उन के अस्तित्व का सामान्य अंग रहा है। रूसी सैन्य अकादमी के प्रमुख रहे निकोलाई सुखोतिन ने उन्नीसवीं सदी के अंत में हिसाब लगाकर बताया था कि उस से पिछली पाँच सदियों में रूस का लगभग दो तिहाई समय युद्ध लड़ते बीता है। उस के बाद, आगे बीसवीं सदी का हिसाब तो ऊपर देख ही चुके हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने रूस-उक्रेन युद्ध के जल्द ही खत्म होने का दावा किया है। पर रूसी राष्ट्रपति पूतिन जल्दी में नहीं लगते। न ही उक्रेनी राष्ट्रपति जेलेन्स्की बहुत अधीर लगते हैं। इसीलिए कूटनीतिक बात-चीत में प्रगति जरूर हो रही है, पर ट्रंप का दावा अधिक विश्वसनीय नहीं लगता।
इसलिए भी, कि कुछ ही पहले ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति पूतिन को ‘पागल’ कहा था। क्योंकि उन्होंने फटाफट ट्रंप की बात मान उक्रेन से युद्ध खत्म नहीं किया। पर ट्रंप रूसियों का चरित्र नहीं जानते। वे रूस के इतिहास से भी अनजान लगते हैं। यह कुछ स्वाभाविक भी है। अमेरिकियों द्वारा युद्ध को अपवाद, असहज घटना सा लिया जाता है। संभवतः कारण यह भी हो कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने कभी विदेशी कब्जा नहीं झेला है। द्वितीय विश्व युद्ध और वियतनाम, दोनों में मिलाकर भी कुल पाँच लाख अमेरिकी सैनिक मारे गये। लेकिन उसी से अमेरिकी काफी खिन्न हुए थे। आज तक उस की मनोवैज्ञानिक स्मृति वहाँ की रचनाओं में आती रहती है।
परन्तु रूसी इतिहास में युद्ध सदियों से बार-बार की परिघटना है। अमेरिकी इतिहासकार प्रो. ग्रेगोरी कार्लटन ने अपनी पुस्तक ‘रसिया: द स्टोरी ऑफ वार’ (2017) में रूसी इतिहास का एक रोचक आकलन किया है। उस से पता चलता है अब तक रुसियों ने अनेक ऐसे युद्ध झेले जो मानो रूसियों को समूल खत्म कर देने लिए हुए थे। केवल द्वितीय विश्व युद्ध में ही 2 करोड़ से अधिक रूसी मारे गये थे, जबकि पूरे देश की आबादी 17 करोड़ थी।
हिटलर ने सचमुच रूसियों के खात्मे के लिए ही लेनिनग्राद पर घेरा डाला था। वह लेनिनग्राद पर कब्जा कर सकता था, परन्तु उस ने सितंबर 1941 से जनवरी 1944, ढाई साल तक, उस शानदार नगर की घेरेबंदी कर तमाम रूसियों को भूख से मार डालना तय किया था! उसे झेल कर तमाम रूसी लड़ते रहे। अंत में बर्लिन तक जाकर हिटलर को हराया। उस युद्ध के चार साल में रूस की संपूर्ण युवा पुरूष आबादी के तीन चौथाई से अधिक मारे गये!
वह रूस के लिए वैसा अपवाद युद्ध भी न था। उस से पहले प्रथम विश्व युद्ध, कम्युनिस्ट क्रांति, और गृह-युद्ध — यानी 1914 से 1921 के बीच — मात्र छः-सात वर्ष में 1 करोड़ रूसी मारे गये थे। जबकि रूस की कुल आबादी मात्र 18 करोड़ थी। और पीछे जाएं, तो 1812 में नेपोलियन की महान सेना ने मास्को को जलाकर राख कर दिया था। वह फ्रांसीसी सेना तब तक यूरोपीय इतिहास में सब से बड़ी थी! लेव टॉलस्टाय का कालजयी उपन्यास ‘वार एंड पीस’ उसी पृष्ठभूमि पर लिखा हुआ है, जो विश्व का महानतम उपन्यास माना जाता है।
उस से पहले 13-15 वीं सदी में मंगोल और तातार हमलावरों ने रयाजान, सुजदल, मॉस्को, त्वेर, कीव, रोस्तोव, आदि कितने ही रूसी नगरों का पूर्ण विनाश कर दिया था! मंगोलों ने रूस पर दो सदियों तक, 15वीं सदी के अंतिम चरण तक शासन किया। अंततः हारने के बाद भी मंगोल हमलावर क्रीमिया पर छापे मारते रहते थे। उन्होंने भी दो बार मास्को को जला डाला था और 16वीं सदी तक रूसियों को गुलाम बनाकर सीरिया, फारस और तुर्की बाजारों में बेचा।
इसलिए, रूसी मानस में दोनेत्स्क, क्रीमिया, आदि केवल भौगौलिक क्षेत्र नहीं है। वह विदेशी हमलों, भयावह उत्पीड़न झेलने और लड़ने का ऐतिहासिक प्रतीक भी है। न केवल क्रीमिया रूस का ऐतिहासिक अंग है, बल्कि स्वयं उक्रेनी लोग भी ‘छोटे रूसी’ कहे जाते रहे हैं। पहले सदियों तक रूस का नाम ही ‘कीव-रूस’ था। पूरा उक्रेन ही रूस का अंग था। उसे सोवियत संघ का एक अलग प्रांत भी रूसी नेता लेनिन ने 1919 में बनाया। उस से पहले उक्रेन कभी रूस से अलग देश तो क्या, अलग प्रांत भी नहीं रहा था। अतः रूस-उक्रेन युद्ध भाइयों की लड़ाई है। चाहे दोनों के चरित्र में अब काफी अंतर क्यों न आ गया हो।
अतः, ऐतिहासिक रूप से रूसियों के लिए युद्ध उन के अस्तित्व का सामान्य अंग रहा है। रूसी सैन्य अकादमी के प्रमुख रहे निकोलाई सुखोतिन ने उन्नीसवीं सदी के अंत में हिसाब लगाकर बताया था कि उस से पिछली पाँच सदियों में रूस का लगभग दो तिहाई समय युद्ध लड़ते बीता है। उस के बाद, आगे बीसवीं सदी का हिसाब तो ऊपर देख ही चुके हैं।
इसीलिए, रूसी समाज अपने सैनिकों और स्मारकों के प्रति जो विशेष और नियमित आदर स्थान रखता है, वह विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं है। मॉस्को में विवाह के बाद नवविवाहित जोड़ा सब से पहले ‘अनाम सैनिक के स्मारक’ पर जाकर फूल चढ़ाता है। हिटलर पर जीत का दिन, 9 मई रूस में सब से बड़े राष्ट्रीय पर्व जैसा है, जिस में सभी रूसी समान श्रद्धा रखते हैं। ऐसा संभवतः दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं है।
रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने अनेक रूसी योद्धाओं को संत की उपाधि दी है। इसलिए नहीं कि उन्होंने ऑर्थोडॉक्स चर्च को फैलाया या उस के मिशनरी थे, जैसा कैथोलिक चर्च परंपरा में है। बल्कि इसलिए कि उन रूसी योद्धाओं ने समाज की रक्षा की। दमित्री दोन्सकी, अलेक्जेंडर नेवस्की, और एडमिरल उसाकोव ऐसे कुछ ऐतिहासिक रूसी योद्धा रहे हैं, जिन्होंने मंगोलों, ट्यूटनों, या तुर्कों से लड़ कर मातृभूमि को मुक्त कराया, या उस की रक्षा की थी। उन्हें रूसी चर्च ने संत की उपाधियाँ दी। यह भी दुनिया में अपवाद है, कि सैनिक योद्धाओं को ‘संत’ की उपाधि मिली।
इसीलिए, रूसियों की भावना, संस्कृति और प्रतिक्रिया को अन्य देशों के सांस्कृतिक पैमाने से देखना भूल है। वैसे भी, भिन्न-भिन्न संस्कृतियाँ अपने कुछ विशिष्ट मानदंड रखती हैं। रूसियों पर तो यह और भी अधिक लागू है।
जर्मन-अमेरिकी राजनीति शास्त्री हान्स मार्गेन्थाऊ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘पॉलिटिक्स एमंग नेशंस’ (1948) में ‘राष्ट्रीय चरित्र’ पर एक विस्तृत और बड़ा रोचक अध्याय लिखा है। उस में, सौ सालों के अंतराल में रूसी चरित्र के दो अनोखे विवरण हैं। एक में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद बर्लिन में एक रूसी सैनिक की दयालुता और दृढ़ता एक ही घटना में इकट्ठे दिखाई गयी है। तब बर्लिन रूसी फौज के अधिकार में आ चुका था। वह वास्तविक घटना इस प्रकार है:–
कोई रूसी सैनिक बारह जर्मन बंदियों को लाइन में लगाकर लिए जा रहे हैं। एकाएक नागरिकों में एक युवती चीख कर बंदियों में अपने पति/प्रेमी को पहचान लेती है। वह दौड़ कर आकर उस से लिपट जाती है। रूसी सैनिक उसे रोकता है। आस-पास के जर्मन लोग सकते में आ जाते हैं, क्योंकि फौजी कामों में बाधा डालने वाले को गोली मार देना सामान्य था। पर रूसी सैनिक युवती को सांत्वना देता है। फिर उस बंदी को अपने टॉमीगन से धक्का देकर आजाद कर देता है। पर कुछ देर में अपना सिगार जलाते हुए ठिठकता है, कि बंदियों की संख्या तो निश्चित थी। अपने गंतव्य पर उसे उतने ही बंदी सौंपने हैं, जितने चले थे। वह रूसी सैनिक आसपास चल रहे जर्मन नागरिकों पर नजर दौड़ाता है। उस में एक युवक को पकड़ कर बंदियों की पंक्ति में लगा देता है। संख्या पूरी हो गई। फिर मजे से सिगार जला कर बंदियों को निगरानी में लिए चलता है। मानो कुछ न हुआ हो! यह घटना ‘टाइम’ मैगजीन के 21 अप्रैल 1947 अंक में छपी थी।
ऐसे अनेक प्रकरण रूसियों का बिलकुल अलग चरित्र दिखाता है। दूसरों को उक्रेन पर रूसी प्रहार अत्यधिक निर्मम, अनुचित या बेबूझ लग सकता है। किंतु रूसी नजर से वह अस्तित्व की लड़ाई है। उन्होंने इतिहास में बार-बार वही देखा, झेला है। फिर यह तो है ही कि जर्मनी के एकीकरण के बाद, 1990-91 में अमेरिका ने वादा किया था कि नाटो जर्मनी से पूरब की ओर नहीं बढ़ेगा। परन्तु आने वाले दशकों में पोलेंड, हंगरी, और बाल्टिक देश नाटो में शामिल कर लिए गये। अब यूक्रेन की बारी थी, क्यों कि उक्रेनी नेता ही उस दिशा में बढ़ रहे थे। वह रूस के घर में घुस जाने के समान होता। तब पूतिन ने, सही या गलत, मान लिया कि अब रूस पर फिर अस्तित्व की लड़ाई वाला हमला निकट है। इसे अधिकांश रूसियों ने पुनः वैसे ही मर्मांतक प्रहार का आरंभ समझा जो मंगोलों, तातारों, फिर नेपोलियन, और हिटलर ने उन के साथ पहले किया था।
सो, रूसी चरित्र उस के अनुभवों से बना है। यही कारण है कि आम रूसी इस मामले में पूतिन को मोटे तौर पर सही मानते हैं। क्यों कि उन की मानसिकता में युद्ध कोई बीते युग की चीज नहीं है। वह मानो चक्रीय गति से आता रहता है, जिस में समय-समय पर लगना रूसी लोग कर्तव्य मानते हैं। इसीलिए कितना भी कष्ट उठाकर, कोई भी कीमत देकर युद्ध लड़ना और जीतने का यत्न करना उन्हें सामान्य लगता है।
यहाँ रुसी कवि फ्योदोर त्युतचेव की कविता स्मरणीय हैं: ”रूस को कोई माथा लगा कर नहीं समझ सकता। न सामान्य पैमाने से माप सकता है। वह देश अकेला खड़ा रहा है। रूस पर कोई केवल विश्वास ही कर सकता है।” यह 1866 में लिखी पंक्तियाँ आज भी लागू लगती है। रूस सचमुच अकेला है, और उसे सामान्य पैमाने से समझना कठिन है।
अमेरिकी राष्ट्रपति कम से कम एक भूल जरूर कर रहे हैं। नाटो के विस्तार की नीति पर अमेरिका ने रूस को दिए वचन का उल्लंघन किया है। अब उस पर रूस की प्रतिक्रिया ऐसी नहीं, वैसी होनी चाहिए — यह विवाद, और राष्ट्रीय हितों की अपनी-अपनी समझ का प्रश्न है।
जहाँ तक सपाट रूप से युद्ध के विरोधी, हर हाल में शांति-अहिंसा के गीत गाने वाले लोग हैं, तो कहना होगा कि उन्हें राजनीति की समझ नहीं। वे सुरक्षित, आरामदायक जीवन जीते हुए कल्पना से बातें करते हैं जो केवल सदिच्छाएं हैं। इस में रूस ही नहीं भारतीय इतिहास भी देखना चाहिए। भीरुता की हद तक शान्ति-प्रिय भारत सदियों से बर्बर आक्रमणकारियों द्वारा रौंदा जाता रहा। गत सौ साल में अंदरुनी जिहादियों द्वारा भी। क्या वह कभी सद्भावना से निपटने वाली बात थी, या है?
हर मामले में शान्ति की दुहाई देने वाले ध्यान दें कि हथियार कभी भी बीते युग की चीज नहीं है। प्राचीन भारतीय ऋषियों, ग्रीक दार्शनिकों से लेकर आज तक के मनीषियों ने अस्त्र-शस्त्र कौशल को शिक्षा व चरित्र का अनिवार्य अंग माना है। आधुनिक महर्षि श्रीअरविन्द ने इस बिन्दु पर गाँधीजी की कड़ी आलोचना की थी, जो अपने जड़ अहिंसा-सिद्धांत को राजनीति में लागू करने की जिद रखते थे। जिस से उलटे बेहिसाब लोग जिहादियों द्वारा मारे गये। अहिंसा का सही अर्थ गीता में है। अकारण या द्वेष भरी चोट करना हिंसा है। पर कर्तव्य भाव से, द्वेषरहित होकर, आत्मरक्षा, या अतिक्रमित की रक्षा के लिए किया गया संहार कदापि हिंसा नहीं। इस में हिन्दू नेताओं ने भारी भूल की, जिस का दुष्परिणाम भारत गत सौ सालों से भुगत रहा है। अतः ट्रंप, जेलेन्स्की, और पूतिन के बीच इतिहास और शास्त्र, दोनों की सीख याद रखनी चाहिए।
