“द कॉन्ज्यूरिंगः लास्ट राइट्स”

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द कॉन्ज्यूरिंग: लास्ट राइट्स’ एक साधारण हॉरर फिल्म नहीं है। यह डर और संवेदना का ऐसा मिश्रण है, जो दर्शक को केवल सिहरन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक अनुभव भी देकर जाता है। ये फ़िल्म ऐसे दर्शकों को अधूरी लग सकती है जिन्हें हॉरर फिल्मों में लगातार डरावने दृश्यों की उम्मीद रहती है।”द कॉन्ज्यूरिंगः लास्ट राइट्स” सिर्फ डराने के लिए नहीं, बल्कि छू जाने के लिए भी बनी है। अभी भी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा।

सिने -सोहबत

सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में फिल्में चाहे किसी भी जॉनर की हों वो दर्शकों के दिलों में घर तभी बना पाती हैं जब उन्हें देखकर दर्शकों के भीतर कुछ घटित हो। थोड़े ‘इमोशंस’ बाहर आएं। दिल और दिमाग़ कुछ और सक्रिय हो जाएं। उस पर विमर्श हो। सिनेमा के दूसरे प्रेमियों में भी देखने की जिज्ञासा बढ़े आदि इत्यादि। कुल मिलाकर फ़िल्म देखे जाने के बाद भी हमारे मन में रह सके।

आज के ‘सिने-सोहबत’ में चर्चा करते हैं ‘द कॉन्ज्यूरिंगः लास्ट राइट्स’ की, जिसने पूरी दुनिया के साथ साथ भारत के दर्शकों के बीच भी पूरे दम ख़म के साथ अपनी मज़बूत जगह बना ली है। पिछले एक दशक से ‘द कॉन्ज्यूरिंग यूनिवर्स’ हॉरर सिनेमा का सबसे भरोसेमंद नाम बन चुका है। 2013 की पहली फिल्म ने दर्शकों को एक ऐसे सिनेमाई डर का स्वाद चखाया था, जिसने हॉरर की परिभाषा ही बदल दी। ‘एनाबेल’ और ‘द नन’ जैसी स्पिन ऑफ फिल्मों ने इस फ्रेंचाइज़ी को और लोकप्रिय बनाया। ऐसे में ‘द कॉन्ज्यूरिंग: लास्ट राइट्स’ से उम्मीदें भी बहुत ऊंची थीं। लेकिन यह फिल्म दर्शकों को पूरी तरह से वो सभी अहसास नहीं देती, जिसकी उन्हें आदत पड़ चुकी है।

‘द कॉन्ज्यूरिंगः लास्ट राइट्स’ की कहानी हमें पैरानॉर्मल एक्सपर्ट्स वॉरेन दंपति के शुरुआती दौर में ले जाती है। गर्भवती लॉरेन (वीरा फार्मिगा) और एड (पैट्रिक विल्सन) एक शैतानी आईने से तो बच जाते हैं, लेकिन उसकी काली छाया उनकी अजन्मी संतान तक पहुंच जाती है। बेटी जूडी (मिया टॉमलिंसन) मौत को छूकर लौटती है और बड़ी होने पर उसे लगातार अलौकिक अनुभव और भयावह सपनों का सामना करना पड़ता है।

उधर वही आईना एक अन्य परिवार तक पहुंचता है और उनकी ज़िंदगी को तहस नहस कर देता है। जब हालात काबू से बाहर होते हैं, वॉरेन दंपति आगे आते हैं। मगर इस बार दुश्मन सिर्फ एक दानवी ताकत नहीं, बल्कि वह अंधकार है जो दोनों परिवारों को मिटाने पर आमादा है।

निर्देशक माइकल शोव्ज ने कहानी को ‘स्मर्ल हॉन्टिंग इन्वेस्टिगेशन’ से प्रेरित बताया है। यही कारण है कि फिल्म का पहला हिस्सा हॉरर से ज्यादा फैमिली ड्रामा और रिश्तों की जटिलताओं पर केंद्रित दिखता है। जूडी और उसके बॉयफ्रेंड के रिश्ते को जोड़कर कहानी को समकालीन स्पर्श देने की कोशिश की गई है।

हालांकि, फ़िल्म का शुरुआती हिस्सा धीमा है और हॉरर प्रेमियों को निराश कर सकता है। इंटरवल तक कोई बड़ा “हड्डियां कंपा देने वाला” डर नहीं मिलता। लेकिन दूसरे हिस्से में फिल्म रफ्तार पकड़ती है और क्लाइमैक्स तक आते-आते वह भयावहता सामने आती है, जिसके लिए यह फ्रेंचाइज़ी मशहूर है।

तकनीकी स्तर पर फिल्म मजबूती दिखाती है। एली बोर्न की सिनेमैटोग्राफी हर फ्रेम में बेचैनी और अनहोनी का आभास कराती है। साउंड डिजाइन लगातार तनाव का माहौल गढ़ता है और बेंजामिन वॉल्फिश का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों की डरावनी ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देता है।

इस फ़िल्म का क्लाइमैक्स इसकी सबसे मजबूत कड़ी है, यहां डर और इमोशन एक साथ टकराते हैं और नतीजा ये होता है कि फिल्म दर्शकों को संतुलित, परिपक्व और संतोषजनक अंत देती है।

अभिनय और परफॉर्मेंस की बात की जाए तो वीरा फार्मिगा (लॉरेन वॉरेन) एक बार फिर फिल्म का भावनात्मक स्तंभ बनकर उभरती हैं। उनके चेहरे की गंभीरता और संवादों की संवेदनशीलता किरदार को गहराई देती है। पैट्रिक विल्सन (एड वॉरेन) का दृढ़ निश्चय और दूसरों को महफ़ूज़ रखने की कोशिशों की प्रवृत्ति दर्शकों में भरोसा जगाता है। मिया टॉमलिंसन (जूडी) फिल्म की आत्मा कही जा सकती हैं। उन्होंने एक मासूम लड़की, प्रेमिका और प्रेतबाधित आत्मा, तीनों ही रूपों को बखूबी जिया है।

बेन हार्डी (जूडी के बॉयफ्रेंड) हल्के फुल्के हास्य और यंग एनर्जी से फिल्म में ताजगी भरते हैं। सपोर्टिंग कास्ट में इलियट कावन, रेबेका कैल्डर, कीला लॉर्ड कैसिडी, बो गैडसन और मौली कार्टराइट सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद अपने किरदारों में पूरी ईमानदारी से उतरते हैं।

फिल्म का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह हॉरर को सिर्फ डर तक सीमित नहीं रखती, बल्कि रिश्तों और मानवीय भावनाओं को भी उसके साथ जोड़ती है।

लेकिन यही इसकी कमजोरी भी बन जाती है। हॉरर के जुनूनी प्रशंसकों को शुरुआत की धीमी गति और “परिवार केंद्रित ड्रामा” बोझिल लग सकता है।फिल्म को देखकर लगता है कि निर्माता इस यूनिवर्स को अब एक नए मोड़ पर ले जाना चाहते हैं, जहां केवल डर ही नहीं, बल्कि भावनात्मक गहराई भी फ्रेंचाइज़ी का हिस्सा हो।

भारतीय फ़िल्मों में ‘हॉरर वाले जॉनर’ को अभी भी काफ़ी ज़्यादा इवॉल्व होने की ज़रुरत है। ये बात ज़रूर है कि हिंदी की पुरानी डरावनी फिल्मों में किसी जंगल के डाक बंगले की बाथ टब में नहाने वाली इच्छाधारी चुड़ैलें अब ‘हॉरर कॉमेडी’ में डराने के साथ साथ गुदगुदाने की कोशिशें भी कर रही हैं लेकिन अभी भी अपने यहां फ़िल्मकारों की लड़ाई स्पेशल इफेक्ट्स और तकनीक से जूझने की अधिक है। भारतीय फिल्में विश्व पटल में तभी जगह बना पाएंगीं जब हम बाहर से आयातित तकनीक का उपयोग तो करें लेकिन फ़िल्म का कथ्य, कहानी की आत्मा हमारी अपनी संस्कृति, जड़ों, कथाओं, परिकथाओं से जुड़ाव रखें। उसका स्वर और उसकी संवेदना हर मामले में मौलिक हो। अब तक का इतिहास भी यही रहा कि हमारी उन्हीं फिल्मों ने दुनिया भर में डंका बजाया है जो ओरिजिनल रही हैं।

दिलचस्प है कि बहुत से भारतीय फ़िल्मकार हॉलीवुड फ़िल्मों की तकनीक से प्रभावित होकर उनकी मेकिंग के तरीक़ों के अनुसरण में लगे हैं जबकि पश्चिमी फ़िल्ममेकर्स हमारे यहां के परिवारों में मानवीय सम्बन्ध, मूल्य और जीवन शैली की में खूबियां ढूंढ रहे हैं।

‘द कॉन्ज्यूरिंग: लास्ट राइट्स’ एक साधारण हॉरर फिल्म नहीं है। यह डर और संवेदना का ऐसा मिश्रण है, जो दर्शक को केवल सिहरन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक अनुभव भी देकर जाता है। ये फ़िल्म ऐसे दर्शकों को अधूरी लग सकती है जिन्हें हॉरर फिल्मों में लगातार डरावने दृश्यों की उम्मीद रहती है। साथ ही जिन दर्शकों को इस बात में दिलचस्पी है कि हॉरर फिल्मों को भी एक मानवीय और भावनात्मक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए, उनके लिए तो ये एक विशेष फ़िल्म है। ‘द कॉन्ज्यूरिंगः लास्ट राइट्स’ में डर की ठंडी सांसों की जगह, भावनाओं और रिश्तों की गर्माहट ज्यादा महसूस होती है।

“द कॉन्ज्यूरिंगः लास्ट राइट्स” सिर्फ डराने के लिए नहीं, बल्कि छू जाने के लिए भी बनी है। अभी भी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा।


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