राज्यसभा के वोटिंग नियम बदलने चाहिए

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

हर दो साल पर होने वाले राज्यसभा चुनाव में आम लोगों की तो कम लेकिन राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों की बड़ी रूचि होती है। कौन उम्मीदवार होगा से लेकर कौन जीतेगा तक सारी चीजें बहुत दिलचस्प होती हैं। सबसे ज्यादा रोचक मामला विधायकों के वोट डालने का होता है। माननीय विधायक इसमें मतदाता होते हैं। यानी जिन लोगों को कई लाख लोग वोट देकर चुनते हैं वे राज्यसभा का सांसद चुनते हैं और सोचें, उनके भी वोट गलत तरीके से डाले जाने की वजह से अवैध हो जाते हैं! क्या यह बात किसी के गले उतरती है कि कोई विधायक ठीक ढंग से वोट नहीं डाल पाएगा? जाहिर है वह जान बूझकर अपना वोट अवैध कराता है। फिर सवाल है कि ऐसे नाटक की क्या जरुरत है? इसमें एक पहलू यह भी है कि राज्यसभा चुनाव में वोट अवैध होने या क्रॉस वोटिंग करने की घटनाएं प्रत्यक्ष रूप से भाजपा के शक्तिशाली होते जाने के समानुपातिक हैं। यानी जैसे जैसे भाजपा मजबूत हो रही है वैसे वैसे राज्यसभा चुनाव में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है। राज्यसभा का चुनाव सांस्थायिक भ्रष्टाचार की व्यवस्था बनता जा रहा है।

बहरहाल, 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों पर हुए चुनाव के बाद जो सबसे अपरिहार्य आवश्यकता दिख रही है वह ये है कि राज्यसभा चुनाव में वोटिंग के तरीके में बदलाव किया जाए। हर चुनाव में भाजपा जो करती है वह अलग है। उसे तो नहीं रोका जा सकता है। वह तो साम, दाम, दंड और भेद चारों तरीकों का इस्तेमाल करती रहेगी। भाजपा के शक्तिशाली होने के पहले जब कांग्रेस का दौर था, तब भी थोड़ी बहुत गड़बड़ होती थी। लेकिन अब वह गड़बड़ी कई गुना बढ़ गई है।

अगर एक रूपक के हिसाब से कहें तो कांग्रेस के पास ओवरकोट होता था, वह कहीं से एकाध बटन लगाने का बंदोबस्त करती थी। अब भाजपा के पास एक बटन भी होता है तो वह ओवरकोट का इंतजाम कर लेती है। यानी जीतने के लिए 30 वोट की जरुरत है और भाजपा के पास तीन वोट हैं तो वह चुनाव लड़ सकती है और जीत भी सकती है। सो, इसका तो कोई उपाय नही हो सकता है।  इसी सचाई के बीच पार्टियों को सर्वाइवल के उपाय करने होंगे।

हां, अगर चुनाव आयोग वोटिंग के नियम भी बदल दे तो कई तरह की नौटकियों से मुक्ति मिल जाएगी। ऐसी नौटकियों से जिसकी किसी सभ्य लोकतांत्रिक समाज में जगह नहीं होनी चाहिए। इसके लिए कुछ नहीं करना है। वोटिंग के तरीके को सरल बना दिया जाए। इसमें सबसे पहला बदलाव तो यह करने की जरुरत है कि अगर राज्यसभा का चुनाव ओपन बैलेट से होता है और चुनाव में दलबदल का कानून लागू नहीं होता है तो इसे पूरी तरह से ओपन कर देना चाहिए। इस नौटंकी का कोई मतलब नहीं है कि ओपन बैलेट से वोट करेंगे लेकिन वोट सिर्फ अपनी पार्टी के पोलिंग एजेंट को दिखाएंगे। अगर किसी दूसरे व्यक्ति ने देख लिया तो वोट अवैध हो जाएगा। क्यों भाई, दूसरे ने देख लिया तो क्यों अवैध हो जाएगा? जब वह विधायक किसी को भी वोट दे, उसके खिलाफ दलबदल कानून नहीं लागू होना है तो उसका वोट कोई भी देख ले, उससे क्या फर्क पड़ता है? सोचें, पार्टी के पोलिंग एजेंट को पता है कि उसकी पार्टी का विधायक है तो वह पार्टी के उम्मीदवार को वोट करेगा। अगर वह पार्टी उम्मीदवार को वोट नहीं करेगा यानी क्रॉस वोटिंग करेगा तब भी पोलिंग एजेंट को उसे अपना वोट दिखाना ही है। वह जिसके पक्ष में क्रॉस वोटिंग करेगा उसको पहले से पता होगा कि क्या होने वाला है।

और क्रॉस वोटिंग के बावजूद उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकती है। फिर भी यह नौटंकी चलती है कि अगर दूसरा व्यक्ति वोट देख लेगा तो वोट अवैध हो जाएगा। इसका सीधा समाधान तो यह है कि राज्यसभा चुनाव में ओपन बैलेट हो, विधायक बता कर वोट करें कि वे किसको वोट दे रहे हैं और वोट अवैध करने की व्यवस्था ही समाप्त हो। या तो वोट अवैध करने की व्यवस्था समाप्त हो या फिर क्रॉस वोटिंग करने पर दलबदल कानून लागू करने का प्रावधान किया जाए। इससे राज्यसभा चुनाव में होने वाले बेहिसाब भ्रष्टाचार कुछ कम होगा।

इसी तरह की एक नौटंकी यह है कि एक खास तरह के पेन से ही वोट देना होगा। अगर पेन बदल गया या स्याही बदल गई तो वोट अवैध हो जाएगा। हरियाणा में कुछ साल पहले ऐसा ही हुआ था। जब पेन बदलने से कांग्रेस के 14 में से 13 विधायकों का वोट अवैध हो गया था। इस वजह से इनेलो व कांग्रेस के साझा उम्मीदवार आरके आनंद चुनाव हार गए थे। सवाल है कि इतनी सुरक्षा व्यवस्था में मतदान होता है और बैलेट पर अपनी प्राथमिकता लिख कर विधायक अपना वोट बक्से में डालते हैं, जो सबके सामने होता है और सबके सामने खुलता है तो फिर उसमें क्या गड़बड़ी हो सकती है, जिसे रोकने के लिए पेन और स्याही की ऐसी व्यवस्था बनाई गई है? पहले ठप्पा लगाने की व्यवस्था थी। उसे बहाल किया जाए और वोटिंग के समय ठप्पा थोड़ा इधर उधर या ऊपर नीचे हो जाने के आधार पर वोट अवैध न किया जाए।

सोचें, कैसे कैसे कारण से वोट अवैध हो जाते हैं।

इस बार हरियाणा के राज्यसभा चुनाव में एक विधायक का वोट इसलिए अवैध हो गया क्योंकि उसने पहली प्राथमिकता का वोट देने के लिए अंक में 1 लिखने के बाद उसके आगे डॉट लगा दिया था। ऐसी ही छोटी छोटी बातों पर पहले भी वोट अवैध होते रहे हैं। जैसे किसी ने प्राथमिकता स्पष्ट रूप से नहीं लिखी या किसी ने लिखी तो नंबर ऊपर या नीचे हो गया या किसी ने अपने पोलिंग एजेंट को वोट दिखाया तो दूसरे ने भी देख लिया आदि आदि। इसलिए ऐसी बातों की बजाय चुनाव की बिल्कुल सरल व्यवस्था बनानी चाहिए। राज्यसभा में मतदाता गिनती के होते हैं। सामने टेबल लगा कर सभी पार्टियों के पोलिंग एजेंट बैठें और वोट देने आए विधायक से पूछ लिया जाए कि वह किसको वोट कर रहा है और उस उम्मीदवार के आगे उसका नाम दर्ज कर दिया जाए। न कोई झंझट है और न वोट अवैध होने की चिंता है।

कहा जाता है कि दलबदल कानून इसलिए नहीं लगाया जाता है ताकि विधायक अंतरात्मा की आवाज पर वोट कर सकें। सबको पता है कि अंतरात्मा हमेशा पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ वोट करने के लिए प्रेरित करती है क्योंकि अंतरात्मा पार्टी के प्रति निष्ठा से ज्यादा दूसरी चीजों से प्रभावित होती है। फिर भी सवाल है कि जब अंतरात्मा की आवाज पर वोट करना है तो छिपाना क्या है? अंतरात्मा की आवाज तो सबसे ऊंची और स्पष्ट होनी चाहिए, जिसे हर व्यक्ति सुने। अंतरात्मा की आवाज कोई पाप तो है नहीं कि उसे छिपाना है। जो विधायक जान बूझकर वोट अवैध कराते हैं उनको भी इससे मुक्ति मिलनी चाहिए। जब वोट अवैध कराने का नियम खत्म हो जाएगा तो उनकी आत्मा पर से भी बोझ उतर जाएगा। वे या तो ईमानदारी से अपनी पार्टी के उम्मीदवार को वोट देंगे या अंतरात्मा की आवाज पर दूसरी पार्टी के उम्मीदवार को वोट करेंगे। सो, अगर वोटिंग के नियमों की जटिलता को खत्म कर दिया जाए तो बहुत सारी नौटंकियां बंद हो जाएंगी।

राज्यसभा चुनावों में यह भी देखने को मिलता है कि विधायकों को दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है, रिसॉर्ट में रखा जाता है और वोटिंग के दिन लाया जाता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि इसके बावजूद जिसको अंतरात्मा की आवाज पर वोट डालना है वह डालता ही है। पुरानी कहावत है कि लाख पतझड़ आएं लेकिन जो फूल खिलने हैं वो खिल कर रहेंगे उसी तरह कोई पार्टी अपने विधायकों को कितना भी छिपा ले अगर उसकी अंतरात्मा भाजपा की ओर जाने के लिए प्रेरित करेगी तो वह जाएगा ही। इसलिए पार्टियों को यह नौटंकी भी बंद करनी चाहिए और स्वीकार कर लेना चाहिए कि भाजपा के हाथ भी कानून की तरह लंबे हैं, कहीं भी पहुंच सकते हैं।


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