सोशल मीडिया बैन रामबाण नहीं है

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का सम्मेलन चल रहा है। एआई के आर्थिक, सामरिक इस्तेमाल और उसके असर की व्याख्या हो रही है। दुनिया भर के विशेषज्ञ दिल्ली में हैं। और इसके समानांतर इस बात की भी चर्चा हो रही है कि बच्चों और किशोरों को सोशल मीडिया के इस्तेमाल से कैसे बचाया जाए। जब से ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है और सभी सोशल मीडिया कंपनियों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि किसी भी बच्चे का अकाउंट उनके प्लेटफॉर्म पर नहीं होना चाहिए तब से भारत और दुनिया भर के देशों में इस तरह की चर्चा शुरू हो गई है। भारत में आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से इसकी पहल हो रही है कि 15 साल तक की उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से कैसे दूर रखा जाए। हो सकता है कि ऑस्ट्रेलिया के टेम्पलेट का इस्तेमाल करके यहां भी पाबंदी लगाई जाए।

इसके साथ ही इस प्रतिबंध के असर को लेकर भी बहस छिड़ गई है। यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या सोशल मीडिया पर पाबंदी बच्चों को इसके असर से बचाने का रामबाण उपाय है? इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क दिए जा रहे हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि पाबंदी का समर्थन और विरोध करने वाले दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि बच्चों को सोशल मीडिया के असर से बचाने की जरुरत है। बचाने के तरीके को लेकर जरूर मतभेद हैं। अमेरिका और यूरोप में कुछ दिन पहले हुए सर्वेक्षणों से पता चला कि इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि जेन जेड यानी 1997 से 2013 के बीच जन्मे बच्चे अपने से पहले वाली पीढ़ी यानी मिलेनियल्स के मुकाबले कम बुद्धिमान हैं। यह पहली बार है, जब कोई पीढ़ी अपने से पिछली पीढ़ी से कम बुद्धिमान हैं और इसका मुख्य कारण स्मार्ट फोन या दूसरे स्मार्ट गैजेट्स और सोशल मीडिया है। टेलीविजन को भी इडियट बॉक्स कहते थे लेकिन उसने बच्चों के सोचने, समझने की क्षमता को उतना प्रभावित नहीं किया, जितना इंटरनेट से कनेक्टेड गैजेट्स और सोशल मीडिया ने किया है।

सोचें, इस समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धि की वजह से दुनिया संज्ञानात्मक क्रांति (कॉग्निटिव रिवोल्यूशन) के मध्य में है और दूसरी ओर संचार क्रांति ने एक पूरी पीढ़ी की बुद्धिमता छीन ली है! क्या कृत्रिम बुद्धिमता के फलने फूलने के लिए जरूरी है कि प्राकृतिक बुद्धिमता का क्षरण हो? बहरहाल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सिर्फ बच्चों और किशोरों की संज्ञानात्मक क्षमता को प्रभावित नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनकी सामाजिकता और मानसिक व शारीरिक क्षमता को भी प्रभावित कर रहे हैं। बच्चे और किशोर निराशा और अवसाद का शिकार हो रहे हैं। उनके अंदर कुंठा बढ़ रही है और सामाजिकता कम होती जा रही है। वे अपनी एक दुनिया रचने लगे हैं और कई बार यह उनके लिए जानलेवा साबित हो रहा है। पिछले ही दिनों दिल्ली से सटे गाजियाबाद में तीन बहनों के आत्महत्या करने की खबर आई थी। उनको सोशल मीडिया की ऐसी लत लगी थी कि वे अपनी वास्तविक दुनिया से बेखबर हो गईं थीं और एक आभासी दुनिया में रहने लगी थीं, जिसकी परिणति तोनों की मृत्यु में हुई।

लेकिन क्या इस तरह की घटनाओं को रोकने और बच्चों व किशोरों को स्क्रीन एडिक्शन यानी फोन व सोशल मीडिया की लत से बचाने का एकमात्र तरीका यह है कि सोशल मीडिया पर पाबंदी लगा दी जाए? ध्यान रहे कोई भी पाबंदी बहुत खराब आर्थिक नीति मानी जाती है लेकिन यह सिर्फ आर्थिक नीति का मामला नहीं है, बल्कि इसके दूसरे पक्ष भी हैं। उन सबको ध्यान में रख कर ही कोई भी प्रयास किया जाना चाहिए। इसमें भेड़चाल के लिए कोई जगह नहीं है। ऑस्ट्रेलिया ने पाबंदी लगा दी और स्पेन के प्रधानमंत्री ने भी टिकटॉक से लेकर, यूट्यूब, स्नैपचैट, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के लिए पाबंदी लगाने की योजना का ऐलान किया है। इसकी देखादेखी कुछ और देश ऐसा करेंगे और भारत में भी इसकी मांग होगी और लोकप्रिय भावना को संतुष्ट करने के लिए हो सकता है कि कुछ कदम उठा भी लिए जाएं लेकिन उससे कोई समाधान नहीं होगा।

सबसे पहले तो यह समझने की जरुरत है कि बच्चों और किशोरों में स्क्रीन की जो लत लगी है वह टेक्नोलॉजी या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की समस्या नहीं है। यह एक सामाजिक व पारिवारिक समस्या है, जिसमें तकनीक को विलेन बनाया जा रहा है। इसके समाधान के लिए सबसे पहले यह सवाल पूछने की जरुरत है कि स्क्रीन का एडिक्शन पहले किसको हुआ? सोशल मीडिया की लत पहले किसको लगी? क्या ऐसा नहीं कि परिवार के बड़े, बुजुर्ग पहले इस लत का शिकार हुए और फिर बच्चों की बारी आई? क्या यह सही नहीं है कि कोरोना महामारी के बाद की स्थितियों ने भी इस परिघटना को जन्म दिया? क्या पढ़ाई, लिखाई में स्मार्ट फोन या स्मार्ट गैजेट्स के इस्तेमाल को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है? जाहिर है यह एक संश्लिष्ट समस्या है, जिसका समाधान पाबंदी के एक कामचलाऊ तरीके से निकालने की कोशिश हो रही है। अगर इसकी बहुआयामी जटिलता को समझते हुए समाधान निकालने का प्रयास नहीं हुआ तो पाबंदी लगाने से कुछ नहीं होगा।

वैसे भी किसी भी चीज पर पाबंदी कभी भी कामयाब नहीं होती है, बल्कि उससे समस्या उलझती जाती है और साथ ही नई समस्याएं भी पैदा होती हैं। वैसे भी बच्चों या किशोरों को सोशल मीडिया के इस्तेमाल से रोकना एक मुश्किल काम होगा। भारत जैसे देश में यह और भी मुश्किल होगा। पहले तो सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने वाले के उम्र और पहचान का वेरिफिकेशन बहुत मुश्किल होगा। अगर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकारी दस्तावेज जमा कराए जाते हैं तो प्राइवेसी कंप्रोमाइज्ड होने से लेकर पहचान के दुरुपयोग का खतरा अलग पैदा होगा।

इस तरह की पाबंदियों से बच्चों और किशोरों को, जो तकनीकी रूप से ज्यादा सक्षम और जानकार हैं, डार्क वेब या दूसरे गोपनीय तरीके आजमाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिसके एक नया खतरा पैदा हो सकता है। इसी तरह कई बार सोशल मीडिया बच्चों व किशोरों को तनाव से निकलने का रास्ता भी देता है। वे अपने हमउम्र बच्चों से इससे जुड़े होते हैं, जिनसे उनको भावनात्मक संबल मिलता है। कई जानकार यह भी मानते हैं कि महिलाओं के सशक्तिकरण में इस तकनीक और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की एक भूमिका रही है। इन पर पाबंदी महिलाओं को, खास कर युवा महिलाओं को निगेटिव तरीके से प्रभावित करेगी। ध्यान रहे भारत में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का इंटरनेट एक्सेस बहुत कम है।

तभी सवाल है कि अगर पाबंदी कोई समाधान नहीं है तो क्या किया जाए? सबसे पहले तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को न्यूनतम जांच सुनिश्चित करने का सख्त निर्देश दिया जाए। इसके बाद उनके कंटेंट को लेकर भी उनको जिम्मेदार ठहराया जाए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को सुनिश्चित करना होगा कि किस किस्म का कंटेंट कौन एक्सेस करेगा। इसके बाद अश्लील और हिंसक कंटेंट को पूरी तरह से रोकने का नियम बनाने की जरुरत है। भारत में गेमिंग को रेगुलेट करने के नियम आए हैं। एडिक्ट करने वाले गेम और अश्लील कंटेंट को रोकने के सख्त नियम बनाए जाएं और उनको लागू कराया जाए।

पैरेंटल कंट्रोल को आसान बनाया जाए ताकि कम पढ़े लिखे लोग भी अपने घर के स्मार्ट गैजेट्स में इसका इस्तेमाल करके यह तय कर सकें कि उनके बच्चे क्या कंटेंट देख सकते हैं। इसके बाद स्कूल, कॉलेज, कोचिंग आदि में स्मार्ट गैजेट्स के इस्तेमाल को न्यूनतम किया जाए। मिसाल के तौर पर एक छोटी पहल यह हो सकती है कि बच्चे स्कूल जाते हैं तो होमवर्क और दूसरा कोई भी निर्देश उनको स्कूल में ही दिया जाए, जैसा पहले होता था। होमवर्क और दूसरे निर्देश व्हाट्सऐप पर भेजना बंद कर दिया जाए। नियमित स्कूल जाने वाले बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई को भी कम से कम किया जाना चाहिए। इसके बाद समाज और परिवार की मूल्य पद्धति को रीसेट करने की जरुरत है। अगर परिवार के बड़े, बुजुर्ग स्मार्ट गैजेट्स का इस्तेमाल कम करते हैं तो वे बच्चों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इस किस्म के कई छोटे छोटे कदम हैं, जिनसे सोशल मीडिया के निगेटिव असर को कम किया जा सकता है।


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