बढ़ता अविश्वास बेहद खतरनाक

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

चौतरफा अविश्वास बढ़ रहा है। नियम आधारित पुरानी विश्व व्यवस्था बिखर गई है। दुनिया के किसी भी देश को दूसरे देश पर या देशों के किसी भी समूह को दूसरे समूह पर भरोसा नहीं रह गया है। जब अमेरिका और यूरोप के बीच अविश्वास बढ़ गया तो बाकी देशों के बारे में क्या कहा जाए! इसी तरह वैश्विक अर्थव्यवस्था में अविश्वास बढ़ रहा है। दुनिया की अर्थव्यवस्था आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में निवेश और उसके बाजार में आए उछाल से चलती दिख रही है। इसने सॉफ्टवेयर और आईटी आधारित सेवाओं के उद्योग को लगभग ध्वस्त कर दिया है।

जब से एआई कंपनी एंथ्रोपिक की ओर से कहा गया कि उसके ऑटोमेटेड ऑफिस सूट से सॉफ्टवेयर और दूसरे ऑपरेटिंग सिस्टम्स की जरुरत ही खत्म हो जाएगी तब से आईटी कंपनियों की हालत खराब है। माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ ने भी कहा है कि अगले डेढ़ से दो साल में सारे व्हाइट कॉलर जॉब्स एआई के जरिए ऑटोमेटेड हो जाएंगे। हालांकि इसके बावजूद चिप बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी और दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनी एनवीडिया के निवेशक अपने पैसे निकाल रहे हैं। सॉफ्टबैंक से लेकर पीटर थील तक ने पैसे निकाले हैं तो यह भी खबर है कि कंपनी के सीईओ से लेकर दूसरे अहम लोग भी अपने शेयर बेच रहे हैं। यह अविश्वास पूरी अर्थव्यवस्था को अपने चपेट में ले सकता है।

वैश्विक भू राजनीतिक और आर्थिक अविश्वास के माहौल में सबसे चिंता की स्थिति भारत में दिख रही है, जहां राजनीतिक और सामाजिक विभाजन दिन प्रतिदिन गहरा होता जा रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ कहने की जरुरत नहीं है। यह उपभोग आधारित है तो डेढ़ सौ करोड़ लोगों की अर्थव्यवस्था चलती ही रहेगी और जिस रफ्तार से बढ़ रही है उस रफ्तार से बढ़ती रहेगी। लेकिन सामाजिक और राजनीतिक विभाजन, अविश्वास देश के सामने बड़ा खतरा बन कर आया है।

देश की राजनीति में कभी भी ऐसी स्थिति नहीं रही थी कि सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियों के बीच एक दूसरे के प्रति नफरत का भाव हो। अब पार्टियों के बीच निजी दुश्मनी हो गई है। संसद और राज्यों की विधानसभाओं में पार्टियों के नेता एक दूसरे से दुआ सलाम करने से घबरा रहे हैं कि कहीं उनके शीर्ष नेता ने देख लिया या पता चल गया तो उसके नंबर कट जाएंगे।

अगर पहले सामाजिक विभाजन की बात करें तो इतने गहरे विभाजन की शुरुआत 80 बनाम 20 की राजनीति से हुई थी और यूजीसी के नियमों से अंतिम मुकाम तक पहुंची है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ की बात कही लेकिन उनकी पार्टी की नीतियों और नेताओं के बयानों से यह संदेश गया कि भाजपा को 20 फीसदी अल्पसंख्यकों, जिनमें मुस्लिम, सिख और ईसाई तीनों शामिल हैं उनके वोट नहीं चाहिए। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो खुल कर 80 और 20 की बात कही। उन्होंने बंटोंगे तो कटोगे का नारा दिया। प्रधानमंत्री ने भले ऐसा कोई नारा नहीं दिया लेकिन जब भाजपा ने लोकसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया और एक भी मुस्लिम को मंत्री नहीं बनाया गया तो बिना कहे यह सिद्धांत स्थापित हुआ।

मुसलमानों को अलग थलग करने की जो राजनीति शुरू हुई थी उसमें राज्यवार दूसरी चीजें जुड़ती गईं। बिहार और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम के साथ साथ यादव को अलग थलग किया गया। हरियाणा में जाट को, महाराष्ट्र में मराठों को, झारखंड में आदिवासियों को अलग थलग किया गया। कहीं गैर यादव पिछड़ी व अन्य जातियों का समीकरण बनाया गया तो कहीं गैर मराठा तो कहीं गैर आदिवासी का समीकरण बनाया गया। अब इस विभाजनकारी राजनीति का अगला मुकाम सामान्य जातियों को अलग थलग करने का है। उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के लिए यूजीसी की ओर से जो नियम लाए गए हैं, जिनको भेदभावकारी बता कर सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया है, वो इसी प्रयोग का हिस्सा हैं।

भारतीय जनता पार्टी के नेता और उसकी सरकार के मंत्री अब खुल कर कह रहे हैं कि वे देश के गरीबों, पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं। सरकार की पूरी स्कीम ऑफ थिंग्स में से सामान्य जातियों को बाहर कर दिया गया है। इससे सामाजिक स्तर पर इतना अविश्वास बढ़ा है कि जाति पूछ कर यूनिवर्सिटी कैम्पस में छात्रों पर हमले हो रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के कैम्पस में एक ब्राह्मण पत्रकार की जाति पूछ कर उसके ऊपर हमला किया गया। विपक्ष खास कर राहुल गांधी की बहुजन राजनीति से घबरा कर भाजपा ने यह प्रयोग किया। उसको लग रहा है कि सामान्य जातियां उसको बाई डिफॉल्ट वोट देंगी। लेकिन अब यह वोट का मामला नहीं रह गया है।

जहां तक गहरे राजनीतिक विभाजन की बात है तो इसकी शुरुआत ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के नारे से हुई थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने यह नारा दिया था। उसके बाद से भाजपा, उसकी सरकार, उसका पूरा इकोसिस्टम और मीडिया व सोशल मीडिया का पूरा तंत्र इस काम में लग गया कि किस तरह से कांग्रेस शासन की पूरी विरासत को मिटाया जाए, कैसे उसके नेताओं की साख खराब की जाए, कैसे उसे कमजोर किया जाए और कैसे उसे चुनाव हराया जाए।

इसके बाद भाजपा ने यह प्रचार शुरू किया कि सिर्फ वही एक अच्छी पार्टी है बाकी पार्टियां भ्रष्ट, परिवारवादी और राष्ट्रविरोधी हैं। चुनाव के समय पहले भी पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ आरोप लगाती थीं। लेकिन भाजपा ने इसे रोजमर्रा का काम बना दिया। 24 घंटे और 365 दिन भाजपा की मशीनरी इस काम में लग गई। पहले तो पार्टियां, नेता और आम लोग भी इसे आश्चर्य की नजर से देखते रहे लेकिन फिर यह मुख्यधारा का राजनीतिक काम बन गया कि एक दूसरे के खिलाफ निरंतर दुष्प्रचार चले।

अब विपक्षी पार्टियों की सरकारों के नीतिगत फैसलों और नेताओं के निजी चरित्र को लेकर लगातार आलोचना चलती रहती है। लगातार 12 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद भी नरेंद्र मोदी कांग्रेस की पहले की सरकारों और नेताओं की कमियां बता कर वोट मांगते हैं। संसद में खड़े होकर भाजपा के सांसद कांग्रेस के पुराने नेताओं और पूर्व प्रधानमंत्रियों को ‘गद्दार’ और ‘अय्याश’ बोलते हैं। विपक्ष के मौजूदा नेतृत्व को ‘पप्पू’, ‘टुक़डे टुकड़े गैंग’, ‘देश विरोधी’, ‘सनातन विरोधी’, ‘टोंटी चोर’, ‘चारा चोर’ आदि कहा जाता है। जवाब में दूसरी तरफ से भी सत्तापक्ष के नेताओं के लिए इसी तरह के विशेषणों का प्रयोग होने लगा है।

‘तड़ीपार’ और ‘चौकीदार चोर है’ से शुरू हुआ प्रचार ‘कॉरपोरेट के नौकर’, ‘देश बेचने वाले’ और ‘ट्रंप के गुलाम’ तक पहुंच गया है। ऐसा नहीं है कि नेता इसे राजनीतिक बयानबाजी भर मान रहे हैं। वे इसे सच मानते हैं और उनके निजी संबंध भी इसी से निर्धारित हो रहे हैं। चूंकि सभी पार्टियों के नेता खास कर भाजपा में ज्यादातर नेता बिना राजनीतिक आधार वाले हैं इसलिए वे अपने पार्टी नेतृत्व की ओर से कही गई बात को ब्राह्म वाक्य मान कर दोहराते रहते हैं। सभी नेताओं का एकमात्र काम अपने नेतृत्व को खुश करना हो गया है। इसके लिए वे विरोधी नेताओं के बारे में अनाप शनाप बोलते रहते हैं। उनके बीच इस बात का कंपीटिशन है कि विरोधी नेता के लिए कौन ज्यादा अपमानजनक बात कह सकता है। अपने विरोधी नेताओं के प्रति अपमान का भाव ही भारतीय राजनीति की पहचान बन गई है।


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