विपक्ष क्यों इतना आशंकित है?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को पद से हटाने का प्रावधान करने के लिए लाए गए विधेयकों पर विपक्ष बहुत चिंतित है और आशंकित है। विपक्ष के सारे नेताओं की एक ही चिंता है कि केंद्रीय एजेंसियां खास कर सीबीआई और ईडी विपक्षी पार्टी की सरकारों को अस्थिर कर सकती हैं। उनका कहना है कि केंद्रीय एजेंसियां मुकदमा करेंगी और मंत्री या मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर लेंगी। धन शोधन के कानून में जमानत के प्रावधान बहुत सख्त हैं इसलिए उनको 30 दिन तक जमानत नहीं मिलेगी और इस नाम पर उनको हटा दिया जाएगा।

आशंका यही पर खत्म नहीं होती है। यह भी कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री को गिरफ्तारी का डर दिखा कर उसको किसी काम के लिए मजबूर किया जा सकेगा। इतना ही नहीं यह आशंका भी जताई जा रही है कि मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर लिया जाएगा और फिर उसकी पार्टी तोड़ कर सरकार गिरा दी जाएगी। ऐसा लग रहा है कि सरकार ने बिल बनाते समय इसके जितने मकसद नहीं सोचे होंगे उतने मकसद विपक्ष ने समझा दिए हैं।

अभी तक मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों या प्रधानमंत्री को पद से हटाने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं था। विधायक और सांसद को हटाने का प्रावधान भी लिली थॉमस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश के बना। इसमें तय किया गया कि किसी विधायक या सांसद को दो साल या उससे ज्यादा की सजा हो जाती है तो वह विधायिका का सदस्य नहीं रह पाएगा और सजा की तारीख से उसके चुनाव लड़ने पर रोक लग जाएगी। आमतौर पर निचली अदालत से सजा होते ही विधायकों, सांसदों की सदस्यता समाप्त कर दी जाती है, जैसा कि राहुल गांधी के मामले में हुआ था।

बाद में अगर ऊपरी अदालत सजा पर रोक लगा दे तो सदस्यता बहाल हो जाती है। बहरहाल, अगर कोई व्यक्ति विधायक या सांसद होने के अयोग्य हो जाएगा तो वह स्वतः मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने के भी अयोग्य हो जाएगा। इस नियम से इतर अब सरकार संविधान संशोधन करके कानून बना रही है कि अगर किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को किसी गंभीर अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और 30 दिन तक जमानत नहीं होती है तो 31वें दिन उसको पद से हटा दिया जाएगा।

अब सवाल है कि इसकी जरुरत क्यों पड़ी? इसकी जरुरत पड़ी अरविंद केजरीवाल की वजह से। दिल्ली का मुख्यमंत्री रहते केजरीवाल शराब घोटाले से जुड़े केस में गिरफ्तार हुए और उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। वे 156 दिन तक दिल्ली की तिहाड़ जेल में रहे और मुख्यमंत्री बने रहे। उससे पहले उन्होंने हवाला मामले में गिरफ्तार अपनी सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन को भी काफी समय तक मंत्री पद से नहीं हटाया था। ऐसे ही तमिलनाडु में एमके स्टालिन सरकार के मंत्री सेंथिल बालाजी गिरफ्तार होकर जेल चले गए लेकिन मंत्री बने रहे।

इससे पहले आमतौर पर मंत्री या मुख्यमंत्री गिरफ्तारी से पहले इस्तीफा दे देते थे। पिछले ही साल जनवरी में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया गया था और उन्होंने गिरफ्तारी से ठीक पहले इस्तीफा देकर चम्पई सोरेन को मुख्यमंत्री बनवा दिया। लेकिन उसके दो महीने बाद मार्च में गिरफ्तार हुए अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा नहीं दिया। सो, अब तक जो काम नैतिकता और लोकलाज के आधार पर होते थे वह काम सुनिश्चित करने के लिए सरकार कानून ला रही है।

अब आएं विपक्ष की चिंता और आशंका पर तो उसकी एक आशंका का जवाब हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल के मामले से मिल जाता है। हेमंत सोरेन ने इस्तीफा दिया और जेल गए तो अगले चुनाव में उनकी पार्टी ज्यादा बड़े बहुमत से सरकार में लौटी। दूसरी ओर केजरीवाल जेल गए और इस्तीफा नहीं दिया तो अगले चुनाव में वे खुद भी हारे और उनकी पार्टी भी हार कर सत्ता से बाहर हुई। दोनों की पार्टियों ने गिरफ्तारी को राजनीतिक बदले की कार्रवाई कहा था लेकिन झारखंड की जनता ने हेमंत की बात पर यकीन किया और दिल्ली के लोगों ने केजरीवाल पर यकीन नहीं किया।

यह मामला कहीं न कहीं नैतिकता, परंपरा और लोकलाज से जुड़ा हुआ है। अतीत में भी देखें तो नेता नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देते थे और उनको राजनीतिक नुकसान नहीं होता था। लालू प्रसाद ने गिरफ्तारी से पहले इस्तीफा देकर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवाया। लालू प्रसाद के जेल जाने से न तो उनकी पार्टी टूटी और न सरकार गिरी, बल्कि अगले चुनाव में फिर उनकी पार्टी जीत कर सत्ता में आई। ऐसे ही तमिलनाडु में जयललिता मुख्यमंत्री रहते दो बार गिरफ्तार हुईं। एक बार उन्होंने ओ पनीरसेल्वम को मुख्यमंत्री बनाया और दूसरी बार ई पलानीसामी को मुख्यमंत्री बनाया। दोनों बार न तो उनकी पार्टी टूटी और न सरकार गिरी।

इसके उलट पार्टियों के टूटने या सरकार गिरने की पिछले 10 साल की घटनाएं देखें तो अलग तस्वीर सामने आती है। कमलनाथ जैसा व्यक्ति मुख्यमंत्री पद पर बैठा रहा और कांग्रेस पार्टी टूट गई, सरकार गिर गई। कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री पद पर बैठे रहे और कांग्रेस टूट गई, सरकार गिर गई। कांग्रेस और एनसीपी के समर्थन से सरकार चला रहे उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहे और उनकी पार्टी टूट गई, सरकार गिर गई। इसका मतलब है कि मुख्यमंत्री गिरफ्तार होगा तो अनिवार्य रूप से पार्टी टूट जाएगी या सरकार गिर जाएगी और गिरफ्तार नहीं होगा तो अनिवार्य रूप से पार्टी नहीं टूटेगी, ऐसा मानना मूर्खतापूर्ण विचार है।

अब रही बात इस कानून के जरिए भारत को पुलिस स्टेट बनाने की तो यह चिंता भी बहुत सेलेक्टिव है। देश की आम जनता के लिए भारत पुलिस स्टेट ही है। पुलिस जहां चाहती है, जिसको चाहती है उसको पकड़ लेती है, उस पर लाठी डंडा चला देती है, झूठे मुकदमे में फंसा देती है। हां, माननीय लोगों को अब इसका डर लगने लगा है। तभी कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा कि अब एक कांस्टेबल के पास भी सरकार बदल देने की क्षमता होगी।

उनके कहने का मतलब है कि कांस्टेबल किसी मुख्यमंत्री को गिरफ्तार कर लेगा और सरकार बदल जाएगी। अव्वल तो किसी मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी ऐसे नहीं होती है और दूसरे मुख्यमंत्री के गिरफ्तार हो जाने से उसकी सरकार नहीं गिर जाती है। सिंघवी खतरे को बढ़ा चढ़ा कर दिखा रहे हैं। ऊपर से वे न्यायपालिका को बिल्कुल शून्य मान कर चल रहे हैं। सोचें, खुद वकील हैं लेकिन मान रहे हैं कि कोई कांस्टेबल किसी मुख्यमंत्री को मनमाने तरीके से गिरफ्तार कर लेगा और अदालतें कुछ नहीं करेंगी!

अगर उनकी बात मान भी ली जाए कि केंद्रीय एजेंसियां किसी विपक्षी शासन वाले राज्य के मंत्री या मुख्यमंत्री को मनमाने तरीके से गिरफ्तार कर लेगी तो उसी तरह प्रदेश सरकार की एजेंसियां अपने राज्य में केंद्रीय मंत्रियों को गिरफ्तार कर सकती हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और अगर कांग्रेस को लग रहा है कि उसके मुख्यमंत्री या उप मुख्यमंत्री को झूठे मुकदमे में फंसाया जा रहा है तो कर्नाटक सरकार की एजेंसियां केंद्रीय मंत्रियों को ऐसे ही मुकदमों में फंसा सकती हैं। उनके ऊपर हत्या से लेकर बलात्कार और चोरी, डकैती या जमीन हड़पने के झूठे मुकदमे किए जा सकते हैं और गिरफ्तार करके जेल में डाला जा सकता है। 30 दिन तक जमानत न हो इसके भी इंतजाम किए जा सकते हैं। यह तो अराजकता की स्थिति होगी। पता नहीं कैसे विपक्ष ऐसी स्थिति की कल्पना कर लेता है?

अंत में: राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं के साथ साथ अच्छे अच्छे पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि केंद्र की मोदी सरकार चंद्रबाबू नायडू के समर्थन पर टिकी है इसलिए उनको डराने के लिए यह कानून लाया जा रहा है। यह बिल्कुल बुद्धि विरोधी बात है। अव्वल तो चंद्रबाबू नायडू या किसी दूसरे मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने के लिए अलग से किसी कानून की जरुरत नहीं है। केंद्रीय एजेंसियां चाहें तो उनको गिरफ्तार कर सकती हैं।

ध्यान रहे नायडू को जगन मोहन रेड्डी की सरकार ने भी गिरफ्तार किया था। दूसरे ऐसी बात कहने वालों को आंध्र प्रदेश विधानसभा का हिसाब नहीं मालूम है। 175 सदस्यों की आंध्र प्रदेश विधानसभा में नायडू की पार्टी टीडीपी के 135 विधायक हैं यानी बहुमत से 47 ज्यादा। बाकी सभी पार्टियों को मिला कर 40 विधायक हैं। कोई बुद्धि निरपेक्ष व्यक्ति ही यह सोच सकता है कि नायडू को गिरफ्तार कर लेंगे तो उनकी पार्टी टूट जाएगी और उनकी सरकार गिर जाएगी। उनको गिरफ्तार करेंगे तो उनका बेटा या परिवार का कोई सदस्य मुख्यमंत्री बन जाएगा और वे जेल से नायक बन कर लौटेंगे।


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