कांग्रेस के पुराने क्षत्रपों की छुट्टी

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राहुल गांधी एक एक करके कांग्रेस के पुराने क्षत्रपों से पीछा छुड़ा रहे हैं। अब उनके साथ सिर्फ वे ही पुराने चेहरे बचे हैं, जिनकी उपयोगिता उनकी राजनीति में दिख रही है या जो अपने दम पर आज भी इतने ताकतवर हैं कि कांग्रेस आलाकमान की बांह मरोड़ कर फैसला करा सकें। जैसे मल्लिकार्जुन खड़गे और सिद्धारमैया अपनी उपयोगिता के कारण हैं। ये दोनों नेता दो साल बाद होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिहाज से जरूरी हैं। दूसरी ओर भूपेंद्र सिंह हुड्डा हैं, जो अपनी शक्ति के दम पर हैं। इनके बीच जो लोग हैं उनके लिए कांग्रेस में कोई जगह नहीं है। वे रहेंगे लेकिन कांग्रेस आलाकमान की कृपा पर। जैसे केरल में रमेश चेन्निथला हैं। अब उनकी पहले जैसी ताकत नहीं बची है तो आलाकमान ने उनको वीडी सतीशन की सरकार में मंत्री बना दिया और उनको बनना पड़ा। ऐसी तस्वीर हर राज्य में देखी जा सकती है। महाराष्ट्र में कांग्रेस के सारे पुराने नेता या तो छोड़ गए या किनारे कर दिए गए।

इस बार का राज्यसभा चुनाव इस लिहाज से बहुत अहम था। कांग्रेस के कई पुराने नेता जोर आजमाइश कर रहे थे कि किसी तरह से उच्च सदन में पहुंच जाएं तो अगले छह साल तक प्रासंगिकता बनी रहेगी और इस दौरान राज्यों में होने वाले चुनाव में दखल भी बना रहेगा। लेकिन राहुल गांधी ने ऐसा नहीं होने दिया। जानकार सूत्रों का कहना है कि राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राज्यसभा जाना चाहते थे। लेकिन राहुल गांधी ने राजस्थान से नीरज दांगी को उम्मीदवार बना दिया। बाद में गहलोत ने सफाई देने के अंदाज में कहा कि वे कोई पद नहीं चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सितंबर 2022 का घटनाक्रम कांग्रेस आलाकमान के खिलाफ बगावत नहीं था। ध्यान रहे उस समय कांग्रेस के 90 विधायकों ने गहलोत के समर्थन में इस्तीफा देने की पेशकश कर दी थी। पर्यवेक्षक के रूप में जयपुर पहुंचे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को बड़ा अपमान झेलना पड़ा था। उसके करीब चार साल बाद गहलोत ने अपनी सफाई प्रस्तुत करके यह भी कहा है कि वे कांग्रेस अध्यक्ष पद का महत्व जानते हैं और उन्होंने अपने मन से अध्यक्ष पद नहीं छोड़ा, बल्कि उनके खिलाफ साजिश हुई। समझा जा सकता है कि अभी सफाई देने की क्या जरुरत पड़ी।

इसी तरह मध्य प्रदेश में कांग्रेस की राजनीति को पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से संचालित कर रहे कांग्रेस को दोनों बड़े नेता किनारे हो गए। दिग्विजय सिंह लगातार दो बार मुख्यमंत्री और 10 साल के ब्रेक के बाद लगातार दो हार राज्यसभा सदस्य रहने के बाद अब किसी सदन के सदस्य नहीं रहेंगे। वे राजनीति करेंगे लेकिन उनको भी पता है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में उनकी बात ज्यादा नहीं चलने वाली है। यही स्थिति कमलनाथ की हुई। पिछले 50 साल की राजनीति में पहली बार ऐसा हुआ है कि वे या उनके परिवार के सदस्य राजनीति में बिल्कुल हाशिए पर पहुंच गए हैं। उन्होंने अपने लिए या बेटे नकुलनाथ के लिए राज्यसभा सीट की लॉबिंग की थी लेकिन राहुल गांधी ने वहां से मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा भेज दिया। सो, मध्य प्रदेश में दिग्विजय और कमलनाथ युग का अंत हुआ समझा जाना चाहिए। हालांकि दोनों के बेटे जरूर राजनीति में सक्रिय रहेंगे। राहुल गांधी एक एक करके सभी राज्यों में अपनी पसंद के युवा नेताओं को मौका दे रहे हैं। हालांकि इनमें कई अराजनीतिक या कम परिपक्व लोग भी हैं लेकिन राहुल इसकी परवाह नहीं कर रहे हैं।


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