अभिषेक का नेता बन पाना मुश्किल

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पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। उनकी पार्टी के विधायक, सांसद और सामान्य कार्यकर्ता भी दूर होते जा रहे हैं। यह समस्या इस वजह से है कि तृणमूल कांग्रेस के अंदर ममता बनर्जी ने दूसरी लाइन के नेता तैयार नहीं किए। उन्होंने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अपना उत्तराधिकारी तो बना दिया लेकिन अभिषेक ने कभी भी संगठन या जमीन की राजनीति नहीं की। वे ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद सक्रिय हुए और हमेशा सरकार चलाने वाला काम किया। किसी सकारात्मक काम के लिए उनकी चर्चा पिछले 15 साल में नहीं हुई है। यही कारण है कि उनकी छवि विलेन वाली बनी और आज उसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ रहा है।

सोचें, ममता बनर्जी की पार्टी में अब कौन नेता है, जो अभिषेक के साथ चलेगा! नेता ही नहीं हैं। ममता बनर्जी के साथ जैसे मुकुल रॉय, सुदीप बंदोपाध्याय, फिरहाद हाकिम, पार्थ चटर्जी, मदन मित्रा, शोभनदेब, अणुब्रत मंडल आदि थे वैसा कोई नेता अभिषेक के साथ नहीं है। इन नेताओं में से मुकुल रॉय का निधन हो गया है और बाकी नेताओं की अच्छी खासी उम्र हो गई है। अभी जो विधायक और नेता पार्टी छोड़ रहे हैं वह अपनी जगह है वह बंगाल की राजनीतिक संस्कृति है। वहां चुनाव हारने के बाद कोई साथ नहीं रहता है। तभी पहले कांग्रेस का और बाद में लेफ्ट पार्टियों का वजूद समाप्त हुआ। लेकिन असली समस्या यह है कि अभिषेक के पास साथ चलने वाले नेता नहीं हैं, जो उनको आगे ले जाएंगे। अगर टीम होती, अच्छे और प्रतिबद्ध नेता होते तो अभिषेक तात्कालिक संकट से निपट लेते। वह होता नहीं दिख रहा है।


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