अन्ना डीएमके का क्या होगा?

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अभी तत्काल तो नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इससे भी खराब स्थितियों के बाद भी तमिलनाडु की पार्टियों ने वापसी की है। 2011 के चुनाव में डीएमके ही 25 सीट के आसपास आ गई थी लेकिन उसने वापसी की। लेकिन अन्ना डीएमके का मामला थोड़ा अलग है। यह उन चुनिंदा प्रादेशिक पार्टियों में से है, जिसके संस्थापक नेता ने अपने परिवार से किसी को उत्तराधिकारी नहीं बनाया है। एमजी रामचंद्रन इसके संस्थापक थे। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन ने पार्टी संभाली लेकिन वे कामयाब नहीं हुईं और आखिरकार जयललिता नेता बनीं। उसी तरह जयललिता ने अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया और उनके निधन के बाद उनके दो करीबी नेताओं ओ पनीरसेल्वम और ई पलानीस्वामी में घमासान छिड़ गया।

पनीरसेल्वम ने आखिरकार हथियार डाले और डीएमके के साथ चले गए। अब अन्ना डीएमके में फिर विभाजन हो रहा है। सीवी षणमुगम 30 विधायकों को लेकर अलग हो गए हैं और मुख्यमंत्री विजय को समर्थन दे रहे हैं। दूसरी ओर पलानीस्वामी के साथ 17 विधायक बचे हैं। दूसरी ओर एक फोर्स के तौर पर विजय की पार्टी आ गई है और डीएमके में एमके स्टालिन के बाद उनके बेटे उदयनिधि स्टालिन पार्टी की कमान संभाल रहे हैं। वहां नेतृत्व तय है। हो सकता है कि लोगों में परिवार की राजनीति से थोड़ी नाराजगी हो लेकिन उसके बचे रहने की संभावना है। अन्ना डीएमके में जो हो रहा ह उससे यह प्रमाणित होता है कि प्रादेशिक पार्टियों के संस्थापक नेताओं के परिवार का कोई व्यक्ति आगे नहीं आए तो पार्टी के सामने अस्तित्व का संकट होता है। अन्ना डीएमके पहले भी इसलिए बची क्योंकि जयललिता जैसा करिश्माई नेतृत्व उसे मिला।


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