मनरेगा पर भी विपक्ष एक साथ नहीं

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यह सही है कि ‘इंडिया’ ब्लॉक का गठन लोकसभा चुनाव के लिए हुआ था और उसके बाद इसकी प्रासंगिकता ज्यादा नहीं है। राज्यों में विपक्षी पार्टियों को इस गठबंधन के तहत चुनाव नहीं लड़ना है। लेकिन चुनावी राजनीति से अलग जिस तरह से संसद सत्र के दौरान इस गठबंधन की पार्टियां मिल कर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलती हैं वैसी कोई पहल संसद के बाहर नहीं दिखती है। इसकी मिसाल मनरेगा बचाओ आंदोलन है, जिसमें कांग्रेस पार्टी अकेले चल रही है। कांग्रेस ने किसी पार्टी के संपर्क नहीं किया है। 10 जनवरी से उसका देश भर में अभियान शुरू होगा। कांग्रेस की कई सहयोगी पार्टियों ने कहा कि अगर उनसे संपर्क किया जाता है तो वे इस आंदोलन में शामिल हो सकते थे। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा भी मनरेगा बचाने की लड़ाई लड़ना चाहते हैं। इनके अलावा तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों का भी बिहार और झारखंड में अच्छा आधार है। लेकिन कांग्रेस ने इनको साथ नहीं लिया।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जाने माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज से मुलाकात की। ज्यां द्रेज ने उनको मनरेगा की जगह लाए गए विकसित भारत जी राम जी बिल की कमियां बताईं और कहा कि इससे मनरेगा कानून की आत्मा मार दी गई है। इसके बाद हेमंत सोरेने ने इसका विरोध करने संकल्प जताया। गौरतलब है कि 2004 में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार बनने पर सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी कौंसिल यानी एनएसी ने राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून का मसौदा तैयार किया था। उसमें ज्यां द्रेज और अरुणा रॉय की मुख्य भूमिका थी। अब ज्यां द्रेज मीडिया के जरिए और विपक्षी पार्टियों के नेताओं से मिल कर नए कानून की कमियों के बारे में बता रहे हैं। कांग्रेस नेताओं को इससे भी मतलब नहीं है। कांग्रेस के एक जानकार नेता का कहना है कि पार्टी इसे एक बड़े मौके के तौर पर देख रही है और अकेले इस आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहती है ताकि पूरा लाभ सिर्फ उसको मिले।

दूसरी विपक्षी पार्टियां भी कांग्रेस की इस रणनीति को समझ रही हैं। इसलिए उन्होंने भी अपनी ओर से कदम नहीं बढ़ाए। हकीकत यह है कि सभी राज्यों में प्रादेशिक पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं। ममता बनर्जी के सांसदों ने तो इसके खिलाफ संसद परिसर में पूरी रात धरना दिया। उसके बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी रोजगार योजना कर्म श्री का नाम बदल कर महात्मा गांधी के नाम पर कर दिया। चुनावी राज्यों में खास कर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में इसे चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता था। लेकिन कांग्रेस अकेले यह लड़ाई लड़ना चाहती है। इसमें मुश्किल यह है कि कांग्रेस के पास अनेक राज्यों में बहुत मजबूत संगठन नहीं है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में कांग्रेस सिर्फ विरोध की औपचारिकता निभा रही है। कोई असरदार प्रदर्शन न पहले हुआ है और न 10 जनवरी को लेकर कोई बड़ी तैयारी दिख रही है। बिहार और झारखंड में तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ही इतने कमजोर हैं कि उनके कहने से कहीं 10 लोग इकट्ठा नहीं हो रहे हैं। ध्यान रहे इन राज्यों में मनरेगा के लाभार्थियों की बड़ी संख्या है। अगर जेएमएम, राजद और लेफ्ट को साथ रखते तो कांग्रेस इसे बड़ा आंदोलन बना सकती थी।


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