उफ! 75 वर्ष बाद ही भारत बूढ़ा, बांझ और बेकार!

Categorized as हरिशंकर व्यास कालम

भारत आज उस श्राप का मारा है, जो न पीछे देखता है और न आगे! वह वर्तमान को कॉकरोच अवस्था में जीता है! सोचें, भारत सरकार और उसके मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अवस्था पर। खुद ने कथित फर्जी डिग्रियों के कॉकरोच पैदा किए और अब उन्हीं को निपटाने की चिंता में खपे हुए है। जबकि उन्हीं की कमान में बहुसंख्यकों की परजीवी भीड़ का भारत निर्माण है।

और यह भीड़ अगले 75 वर्षों में एकदम से घटेगी। मात्र पचहत्तर वर्षों में 165-170 करोड़ लोगों की संख्या (इतिहास की सर्वाधिक युवा आबादी भी) का रिकॉर्ड बनेगा तो उसके मात्र पचास वर्षों में आबादी इतनी तेजी से घटेगी कि सन् 2100 में भीड़ सौ करोड़ की संख्या से नीचे होगी।

हां, तब गांव-कस्बों-शहरों-महानगरों में बच्चों के चेहरे, उनकी आवाज़ कम सुनाई देगी। उनकी जगह पराश्रित, दारुण अवस्था में भटकते बूढ़ों की भीड़ होगी। स्कूल बंद होते हुए और उनकी जगह वृद्ध देखभाल केंद्र खुलते हुए। न काम करने वाले हाथ, न बुद्धि और न मेहनतकश युवा। तब डिग्रियां लिए युवा कॉकरोच क्या करते हुए होंगे? मंदिरों में कीर्तन, सरकार से जेबखर्च की खैरात की जिंदगी और न शादी, न यौन जीवन, न संतान। हां, संभव है तब अधिकांश मुस्लिम चेहरे काम करते मिलें। वे सब काम जिन्हें वर्ण और वर्ग के चक्कर में हिंदुओं की जातियों ने करना लगभग बंद कर दिया है उन्हे मुस्लिम आबादी ही करते हुए होगी।

मेरे ये दो पैराग्राफ इसलिए अतिवादी नहीं हैं क्योंकि मेरा असल मकसद कॉकरोच होती उस भीड़ को झिंझोड़ना है, जिसका धर्म-कर्म अब बुद्धि गंवाकर, गंवार बनकर मात्र सत्ता की भक्ति में जयकारा लगाने का है। वह वर्तमान की वास्तविकताओं से भी आंख, कान, मुंह बंद किए हुए है। गांधी के तीन बंदरों की अवस्था में समय काटती हुई है।

बहरहाल, मैं स्वयं हैरान हूं कि अगले 75 वर्षों में कैसे संभावित 165 करोड़ की आबादी एक सौ करोड़ से नीचे की संख्या में बदली हुई होगी? दरअसल मैं भी पहले मानता था कि 2060 तक भारत 165 करोड़ की आबादी तक पहुंचेगा। इसके बाद जनसंख्या धीरे-धीरे घटेगी क्योंकि तब बच्चे पैदा होने की जन्म-प्रजजन दर भले कम हो मगर वह स्थिर तो होगी। यानी जो गिरावट हुई है, वह 165 करोड़ लोगों की संख्या पर आकर स्थिर होगी। यही संयुक्त राष्ट्र का अनुमान था। लेकिन दुनिया के सभी देशों के अनुभव, ट्रेंड और उन पर बने मॉडल अब साफ बता रहे हैं कि जन्म, प्रजजन दर गिरने लगती है तो घटते-घटते वह स्थिर दर पा कर टिके, यह नहीं होता है। नई बात यह है कि अपेक्षाकृत गरीब देशों में भी जन्मदर तेज़ी से गिर रही है। भारत (जो असलियत में गरीब है) इस नए वैश्विक पैटर्न का सबसे बड़ा उदाहरण बन रहा है। पहले धारणा थी कि अमीरी बढ़ेगी, देश विकसित होगा, महिलाओं में शिक्षा बढ़ेगी, वे रोजगार करने लगेगी तो जन्मदर गिरने लगेगी। ये धारणाएं गलत होती हुई है।

भारत को ही ले। फिलहाल जन्म-प्रजनन दर 1.9 पर है, जबकि आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए लगभग 2.1–2.15 की आवश्यकता है। यह सबसे कम दिल्ली में 1.2 पर है। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल 1.3 पर हैं। शहरी भारत 1.5 पर पहुंच चुका है। इससे भी गंभीर बात है जन्म दर में गिरावट केवल संपन्न राज्यों में ही सीमित नहीं है। वह बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी दिख रही है। इन राज्यों में भी माता-पिता कम बच्चे पैदा कर उन्हें अच्छी तरह पालने-पोसने की मानसिकता में व्यवहार कर रहे हैं। जाहिर है यह मानसिकता जिंदगी की मुश्किलों, महंगाई, महंगी स्कूल फीस, चिकित्सा आदि कारणों से है। ऐसे में भारत की आबादी कुछ समय तक अपनी गति (population momentum) के कारण बढ़ेगी, लेकिन उसके बाद तेजी से सिकुड़ेगी।

यह निष्कर्ष किसी सनसनीखेज अनुमान पर आधारित नहीं है। इसी मसले पर लंदन की पत्रिका ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ने हाल में भारत पर कवर स्टोरी की है। उसकी विस्तृत रपट में भारत की जनसांख्यिकीय दिशा का विश्लेषण अमेरिका स्थित प्रतिष्ठित शोध संस्था इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्युएशन (IHME) के अध्ययन का आधार है। सिएटल स्थित वॉशिंगटन विश्वविद्यालय से संबद्ध IHME दुनिया की अग्रणी स्वास्थ्य और जनसंख्या अनुसंधान संस्थाओं में एक है। उसके आंकड़ों और मॉडलों का उपयोग सरकारें, विश्वविद्यालय, विश्व स्वास्थ्य समुदाय और प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाएं नियमित रूप से करती हैं। संस्था का अनुमान है कि भारत की आबादी इस सदी के मध्य में ही लगभग 160–165 करोड़ के शिखर पर पहुंचेगी। उसके बाद घटने लगेगी। सदी के अंत तक भारत की आबादी 100–110 करोड़ के आसपास सिमट सकती है।

सही बात है कि यह अंतिम सत्य नहीं है, पर भारत के आकंड़े, अनुभव, समाज की बदलती मानसिकता, युवा पीढ़ी की दशा-दिशा तथा दुनिया के देशों के गंभीर जनसांख्यिकीय अध्ययनों के निष्कर्षों की इसमें पुष्टि है।

इतिहास की दृष्टि से सोचें, हिंदुओं की दशा-दिशा पर सोचें, जो बिना विकास के ही, गरीबी में भी आबादी बढ़ोतरी में बांझ होने की और बढ़ते हुए हैं। याद करें 2001 से शुरू इक्कीसवीं सदी के पहले दशक को, जब 2014 तक भारत तेजी से बढ़ती आबादी, बच्चों, छात्रों, नौजवानों की भीड़ के साथ उभरती अर्थव्यवस्था की सच्चाई में उछलता, कूदता हुआ था? तभी निजी स्कूलों, कॉलेज, विश्विद्यालयों का विशाल कारोबार बना। मगर ठिक सौ साल बाद सन् 2100 में क्या नजारा होगा?

भारत तब अमीर कतई नहीं होगा। इसकी गांरटी इसलिए है क्योंकि भीड़ बुद्धि गंवा कर भक्ति में डूब गई है। उद्यमी-पुरुषार्थी तब तक देश छोड़ चुके होंगे। वही मैन्यूफैक्चरिंग का दम टूटा हुआ। पूरा देश चीन, वियतनाम, अमेरिका यानी औद्योगिक, व्यापारिक महाशक्तियों पर आश्रित जीवन का तब आदी होगा। आईटी के कारण सेवा क्षेत्र के बैकऑफिस का रूतबा अमेरिकी एआई कंपनियों से खत्म हो चुका होगा। एआई के कारण न विदेश में भारत के मजदूरों (खाड़ी, आसियान आदि में) की जरूरत होगी और न भारतीय आईटी कंपनियों की। सो, विकास का कुल भारत चक्र अंदरूनी आबादी के जीने पर केंद्रित। चार-पांच करोड़ सरकारी कर्मचारियों, क्रोनी उद्योगपतियों की लूट-खसोट, प्रॉपर्टी और राजनीति के धंधों से बढ़ता-चलता हुआ भारत तथा उसी से विकास और आर्थिकी की गति।

उस नाते भारत की आबादी 165 करोड़ हो या लुढ़क कर 90-95 करोड़ रह जाए, कोई फर्क नहीं पड़ना है। आबादी की संख्या के शिखर और गिरावट दोनों की भूमिका के लक्षण चौतरफा दिख रहे है। परिवार टूट रहे हैं। घर-घर की कहानी एकल-स्वार्थी रिश्तों का दांपत्य जीवन है। मौजूदा आबादी का आधा हिस्सा आज 30 वर्ष से कम उम्र के लड़के-लड़कियों का है। ये निजी स्कूलों की महंगी पढ़ाई, कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाओं, महंगी उच्च शिक्षा, इंजीनियरिंग-डॉक्टर, मैनेजमेंट, आईटी की महंगी डिग्रियों की लागत में बने तथा पके हैं। जिस नौजवान ने एमबीबीएस, एमएस की डिग्री में करोड़ों रुपए खर्च किए हैं वह किस उम्र में अपने हुए खर्च को निकालेगा, शादी करेगा, बच्चा पैदा करेगा और कितने बच्चे? और जैसी डॉक्टर नौजवान वाली मानसिकता है वैसे ही घर-घर सामान पहुंचाने वाले गिग वर्कर की भी है। उसे भी कच्ची बस्ती में किराए के घर के लिए आठ-दस हजार रुपए चाहिए। उसे भी वह हैसियत (याकि भूख) चाहिए जिससे वह बच्चा पैदा करने की सोचे। दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी का नौजवान भी यह हिसाब लगाते हुए कि बच्चे को प्राइमरी स्कूल भेजने पर महिने में कितने हजार का खर्चा होगा?

ऐसी मानसिक व्याधियों में पूरा भारत आज है। वह सब चालीस-पचास साल बाद कितनी गंभर होगी? तीस-पैंतीस साल का नौजवान शादी करेंगा, बच्चे पैदा करेंगा या करियर, घर के किराये, घर खरीदने, कथित अपने स्पेस में अपनी जिंदगी जीने, कर्जा चुकाने की चिंताओं में होगा या बच्चा पैदा कर रहा होगा? यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया तब बूढ़े होना शुरू हुए जब पूरा देश अमीर, समृद्ध हो चुका था। सभी के लिए कम-ज्यादा सामाजिक सुरक्षा के बंदोबस्त बन गए थे। जबकि भारत आज भी प्रति व्यक्ति आय और सामाजिक सुरक्षा में कहीं नहीं है। उलटे गरीब देश, गरीब अर्थव्यवस्था होने के बावजूद अमीर देशों के ठीक विपरीत भारत में कर्ज मंहगा हैं। ब्याज दर महंगी है। बच्चों का पढ़ाना और पालना लगातार मंहगा होता हुआ है।

सो, इन मूर्खतापूर्ण गलतफहमियों का अर्थ नहीं है कि चीन बूढ़ा होगा पर भारत जवान रहेगा; पश्चिम सिकुड़ेगा तो भारत आगे बढ़ेगा। मात्र एक सदी में भारत की कहानी ऐसा पलटा मारने वाली है कि भारत की कहानी युवा आशा से बूढ़ों की चिंता में बुढ़ा गए भारत वाली होगी। पूरा देश वृद्ध नागरिकों की बढ़ती संख्या और उनके देखभाल के संकट से जूझता हुआ होगा। न उनको सहारा देने वाली श्रमशक्ति (युवा) होगी और न ही भारत के पास चीन या पश्चिम से बुढ़ापे के सहारे के लिए बने एआई रोबोट मंगाने के डॉलर होंगे।


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