डब्लूटीओ पर घातक प्रहार

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अब नियम तय करने के मामले में भी मजबूत देश आम सहमति की परवाह नहीं कर रहे हैं। जो सहमत नहीं हैं, उनको छोड़कर आगे बढ़ने का नजरिया उन्होंने अपनाया है। डब्लूटीओ के ढांचे और उसकी भावना पर यह घातक प्रहार है।

विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में सीमा पार डिजिटल ट्रांसमिशन पर टैक्स लगाने पर रोक को जारी रखने के लिए अमेरिका ने अपना पूरा दम लगाया। लेकिन कुछ देशों के विरोध के कारण वह सफल नहीं हुआ। तो अब उसने एलान किया है कि वह उससे सहमत देशों के साथ अलग से समझौता करेगा। ऐसे करार में शामिल होने के लिए उसने अपने व्यापार सहयोगी देशों से आगे आने को कहा है। अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर ने कहा- ‘सामान्य समझ से प्रेरित इस समझौते पर डब्लूटीओ सहमत नहीं हो सकता, तो अमेरिका उसके बाहर उन देशों के साथ ऐसा करार करेगा, जिनकी इसमें दिलचस्पी है।’

अमेरिका के मन-माफिक समझौते को मोटे तौर पर ब्राजील और तुर्किये ने रोका। उधर भारत ने चीन की ‘विकास के लिए निवेश सुविधा करार’ (आईएफडी) संपन्न करने की कोशिश नाकाम कर दी। पिछले हफ्ते हुई 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में 166 में से 129 देशों ने चीन के प्रस्ताव का समर्थन किया। अब संकेत हैं कि चीन उन देशों के साथ लेकर इस समझौते पर आगे बढ़ेगा। ये दोनों घटनाएं डब्लूटीओ की लगातार बढ़ रही अप्रासंगिकता को जाहिर करती हैँ। डब्लूटीओ की स्थापना के पीछे सोच अधिकतम सहमति से विश्व व्यापार के नियमों को तय करना और तय नियमों पर सख्ती से अमल की गारंटी करना थी।

समझौतों पर अमल सुनिश्चित कराने के लिए डब्लूटीओ के अंदर अपनी न्यायिक प्रणाली बनाई गई। मगर डॉनल्ड ट्रंप ने बतौर राष्ट्रपति अपने पहले कार्यकाल में डब्लूटीओ में न्यायाधीशों की नियुक्ति रोक कर अदालती प्रक्रिया को ठप करने की शुरुआत कर दी। उनके बाद आया जो बाइडेन प्रशासन भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ा। जजों के अभाव में डब्लूटीओ का यह अंग फिलहाल लकवाग्रस्त पड़ा हुआ है। इसी कारण विभिन्न देश द्विपक्षीय व्यापार समझौतों का सहारा लेने पर मजबूर हुए हैं। इस बीच अब नियम तय करने के मामले में भी मजबूत देश आम सहमति बनाने की परवाह नहीं कर रहे हैं। जो सहमत नहीं हैं, उनको छोड़कर आगे बढ़ने का नजरिया उन्होंने अपनाया है। डब्लूटीओ के ढांचे और उसकी भावना पर यह घातक प्रहार है।


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