ना दिशा, ना उम्मीद

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मोदी ने संकटकाल में राष्ट्रीय एकजुटता का आह्वान किया। मगर इसके लिए विपक्ष और देश को भरोसे में लेने का कोई इरादा उन्होंने नहीं जताया। ऐसे में उनका बयान कोई नई दिशा दिखाने में सफल हुआ, ये कहना कठिन है।

प्रधानमंत्री की इस बात से सहज सहमत हुआ जा सकता है कि पश्चिम एशिया में युद्ध से भारत के सामने कोरोना महामारी जैसा संकट खड़ा हुआ है। उनकी ये बात भी सही है कि इस संकट का प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है। मगर उनकी ये बात उतनी ही आसानी से गले नहीं उतरती कि ये चुनौतियां अप्रत्याशित ढंग से सामने आईं। ना ही उनका ये कथन सहज स्वीकार्य है कि गुजरे एक दशक में उनकी सरकार ने जो तैयारियां कीं, वे इस वक्त काम आ रही हैं। हकीकत यह है कि रसोई गैस आपूर्ति में आई रुकावटों से देशवासी मुसीबत में फंसे हुए हैं, देश की खाद्य सुरक्षा के ऊपर उर्वरक का गंभीर संकट मंडरा रहा है, और भीषण महंगाई की आशंका हर रोज सघन होती जा रही है।

बेशक, इस पूरी हालत के लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है, लेकिन उसकी व्यापार एवं विदेश नीति संबंधी प्राथमिकताओं ने हालात ज्यादा मुश्किल बनाए हैं, यह भी जग-जाहिर है। अमेरिकी दबाव में रूस से रियायती दर पर तेल लेना बंद करना एक ऐसी ही प्राथमिकता थी। अब संकटकाल में जब अमेरिका ने रूसी तेल को प्रतिबंध मुक्त किया है, तो भारत को बाजार भाव पर वही तेल खरीदना पड़ रहा है। इसी तरह पश्चिम एशिया में सबसे समान दूरी की नीति छोड़ने की महंगी कीमत अब चुकानी पड़ी है।

नरेंद्र मोदी ने संसद के मंच पर अपनी नीतियों के पक्ष में कोई दमदार दलील पेश नहीं की। बल्कि पश्चिम एशिया के बारे में एकमात्र नीतिगत बयान यह दिया कि होरमुज जलडमरूमध्य को बंद करना अस्वीकार्य है। मगर, इससे यह बात गायब रही कि ये रास्ता किसने बंद किया और उसकी पृष्ठभूमि क्या है? इस संबंध में विपक्षी दलों ने अपनी अलग राय रखी है। लोकसभा में दिए बयान में मोदी ने संकटकाल में राष्ट्रीय एकजुटता का आह्वान किया। मगर इसके लिए विपक्ष और पूरे देश को भरोसे में लेने का कोई इरादा उन्होंने नहीं जताया। ऐसे में युद्ध के 24वें दिन जाकर दिया गया उनका बयान कोई नई दिशा दिखाने और जन-विश्वास पैदा करने में सफल हुआ, यह शायद ही कहा जा सकता है।


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