कुछ कहानियां हमें डराती नहीं हैं। वे हमें बेचैन करती हैं। डर कुछ देर का होता है। बेचैनी देर तक साथ चलती है। वह कहानी खत्म होने के बाद भी हमारे भीतर अपना घर बनाए रखती है और बार-बार एक ही सवाल पूछती है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों?
सिने-सोहबत
प्राइम वीडियो की नई अपराध शृंखला ‘राख’ मेरे लिए इसी दूसरी श्रेणी की कहानी है। पहली नज़र में यह एक अपराध की जांच-पड़ताल है। सन् 1978 की दिल्ली में दो किशोर भाई-बहन, सुमन और साहिल अरोड़ा, अचानक गायब हो जाते हैं। सुमन महज 16 साल की है और आकाशवाणी पर गाने का सपना देख रही है। एक परिवार के लिए शुरू हुई यह तलाश धीरे-धीरे एक ऐसे अपराध का रूप लेती है जिसकी परछाईं पुलिस, समाज और पूरे शहर तक फैल जाती है।
इस मामले की जांच सब इंस्पेक्टर जयप्रकाश जाटव के जिम्मे आती है, जिसे अली फज़ल ने निभाया है। लेकिन ‘राख’ की असली दिलचस्पी यह जानने में नहीं है कि अपराध किसने किया। दिलचस्पी इस बात में है कि अपराध होने के बाद इंसान के भीतर क्या बचता है। और शायद इसी वजह से इसका नाम ‘राख’ है।
एक ऐसा समय जब अपराधी के पास तकनीक नहीं थी। सन् 1978। आज के दर्शक के लिए यह सिर्फ़ एक बीता हुआ साल है, लेकिन ‘राख’ के लिए यह कहानी का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। न मोबाइल फ़ोन। न सोशल मीडिया। न हर चौराहे पर निगरानी कैमरे। न चौबीस घंटे चलते समाचार चैनल। न अपराधी के पीछे भागती हुई तकनीक।
उस समय पुलिस के पास अपराध सुलझाने के लिए आदमी थे, कागज थे, मुखबिर थे, पूछताछ थी और सबसे बढ़कर था, धैर्य। आज किसी की तस्वीर कुछ ही सेकंड में हज़ारों लोगों तक पहुंच सकती है। उस समय किसी गुमशुदा व्यक्ति की तलाश का मतलब था शहर की गलियों में घूमना, लोगों से पूछना, छोटे-छोटे सुरागों को जोड़ना और कई बार अंधेरे में हाथ-पैर मारना।
इसलिए ‘राख’ की जांच-पड़ताल का धीमा होना मुझे उसकी कमी से ज्यादा उसकी ज़रुरत लगता है। यह कहानी उसी समय की गति से चलती है।और यह बात आज के तेज़ भागते हुए दर्शक के लिए चुनौती भी है।
अली फज़ल का जयप्रकाश नायक नहीं, एक आदमी है। अली को हमने कई तरह के किरदारों में देखा है। लेकिन जयप्रकाश जाटव की भूमिका में वह अपने सितारे वाले व्यक्तित्व को लगभग पूरी तरह पीछे छोड़ देते हैं। यह पुलिसवाला किसी फिल्मी नायक की तरह अपराधियों को देखकर पहचान नहीं लेता। उसे सब कुछ मालूम नहीं है। वह गलतियां करता है। थकता है। गुस्सा होता है। उलझता है। और कई बार खुद भी समझ नहीं पाता कि वह किस दिशा में जा रहा है। लेकिन उसके भीतर एक चीज़ है और वो है ज़िद।
यह ज़िद केवल नौकरी निभाने की नहीं है। धीरे-धीरे यह मामला उसके लिए निजी बेचैनी बन जाता है। अली फज़ल ने इस बेचैनी को बहुत ऊंची आवाज़ में नहीं निभाया है। उनके अभिनय में संयम है। कई बार उनका चेहरा ही संवाद बन जाता है। और यही इस किरदार की खूबसूरती है।जयप्रकाश कोई महान पुलिस अधिकारी बनने नहीं निकला है। वह बस सच तक पहुंचना चाहता है। और कभी-कभी किसी अपराध-कथा का सबसे मजबूत नायक वही होता है जो खुद को नायक समझता ही नहीं।
सोनाली बेंद्रे को पर्दे पर देखना अपने आप में सुखद है। लेकिन ‘राख’ में उनकी मौजूदगी को केवल लंबे अंतराल के बाद वापसी के रूप में देखना ठीक नहीं होगा।
मोनिका अरोड़ा के किरदार में वह उस मां की पीड़ा लेकर आती हैं, जिसकी बेटी अचानक उससे छीन ली गई है। सिनेमा में मां का दुख अक्सर बहुत शोर करता है। चीखता है। रोता है। टूटता है। ‘राख’ का दुख थोड़ा अलग है। यह भीतर दबा हुआ दुख है। वह खाली निगाहों में दिखाई देता है। उन क्षणों में दिखाई देता है जब कोई मां कुछ कह नहीं रही होती, लेकिन उसके चेहरे पर एक पूरा संसार टूट चुका होता है। सोनाली बेंद्रे ने इस मौन को अच्छी तरह पकड़ा है। और शायद मां के दुख का सबसे सच्चा रूप वही है जब उसके पास रोने के लिए भी शब्द नहीं बचते।
राकेश बेदी को गंभीरता से देखना अच्छा लगता है। राकेश बेदी की छवि लंबे समय से हमारे भीतर एक खास तरह की बनी हुई है, हंसी, हल्के-फुल्के किरदार और सहज हास्य। पिछले दिनों ‘धुरंधर’ में उन्होंने ये छवि तोड़ी और इस सीरीज़ राकेश बेदी का गंभीर रूप इसलिए अधिक प्रभाव पैदा करता है। यह भूमिका याद दिलाती है कि कलाकार को उसकी पुरानी छवि में कैद करना कितना आसान और कितना गलत है।
आमिर बशीर, दिव्येंदु भट्टाचार्य और दूसरे कलाकार भी कहानी की दुनिया को मजबूती देते हैं। यहां कलाकार कहानी से बड़े होने की कोशिश नहीं करते। और यह बात आज के दौर में कम देखने को मिलती है।
अपराधी से ज्यादा डरावना है वह समाज जो उसे पैदा करता है। ‘राख’ की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अपराधी को केवल एक राक्षस बनाकर छोड़ नहीं देती क्योंकि राक्षस बना देना आसान है। फिर हम उससे दूरी बना सकते हैं। कह सकते हैं कि वह हमारे जैसा नहीं था। वह अलग था। वह बुरा था। लेकिन अगर हम यह मान लें कि अपराध करने वाला भी इसी समाज से निकला एक इंसान है, तब सवाल असुविधाजनक हो जाता है। उसके भीतर यह हिंसा आई कहां से? किस सोच ने उसे ताकत और हिंसा को एक ही चीज समझना सिखाया? किस तरह का पुरुषत्व उसे यह विश्वास देता है कि सामने वाले इंसान की इच्छा, गरिमा और जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी अपनी इच्छा है? ‘राख’ इन सवालों को किसी भाषण की तरह सामने नहीं रखती। वह घटनाओं के भीतर से इन्हें उभरने देती है। और यही इसकी समझदारी है।
कुछ जगहों पर ‘राख’ धीमी लगती है, लेकिन हर धीमी चीज कमज़ोर नहीं होती। यहां आकर ‘राख’ से थोड़ी शिकायत भी बनती है। कहीं कहीं पर कहानी जरूरत से ज्यादा ठहर जाती है। कुछ प्रसंग ऐसे हैं जिन्हें थोड़ा छोटा किया जा सकता था। कुछ सहायक पात्रों की कहानी को और कसाव मिल सकता था।
आज का दर्शक अपराध-कथा से लगातार नए रहस्य, नए मोड़ और तेज़ गति की उम्मीद करता है। ‘राख’ हर समय यह सुविधा नहीं देती।
दरअसल, वास्तविक जांच-पड़ताल ऐसी नहीं होती जैसी हम पर्दे पर देखने के आदी हो चुके हैं। असली जांच में एक ही सवाल बार-बार पूछा जाता है। एक सुराग कई दिनों तक कुछ नहीं देता। किसी बयान में मामूली-सा विरोधाभास अचानक महत्वपूर्ण हो जाता है। कई बार पुलिस गलत दिशा में जाती है। और कई बार सच सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देता। ‘राख’ इस थकान को अपनी कहानी का हिस्सा बनाती है।
‘राख’ देखते हुए सबसे दिलचस्प बात यह है कि सन् 1978 और सन् 2026 के बीच दूरी महसूस होने के बावजूद कहानी के कुछ सवाल बिल्कुल आज के लगते हैं।
माता-पिता अपने बच्चों को कितना जानते हैं? बच्चे अपने माता-पिता से कितनी बातें छिपाते हैं? क्या तकनीक ने हमें एक-दूसरे के करीब ला दिया है या सिर्फ एक-दूसरे पर नजर रखना आसान किया है? आज हमारे पास पहले से कहीं ज्यादा जानकारी है। लेकिन क्या हमारे पास एक-दूसरे को समझने का समय भी है? यह सवाल ‘राख’ सीधे नहीं पूछती, लेकिन कहानी देखते हुए मन में जरूर आता है। और यहीं एक पुरानी अपराध-कथा अचानक हमारे समय की कहानी बन जाती है।
‘राख’ में दिल्ली सिर्फ़ घटनाओं की पृष्ठभूमि नहीं है। वह खुद एक किरदार है। एक तरफ सरकारी इमारतें हैं, परिवार हैं, आकाशवाणी है, सड़कों पर चलता हुआ सामान्य जीवन है। दूसरी तरफ उसी शहर में एक ऐसा अंधेरा है जिसे सामान्य जीवन देख नहीं पाता। यह विरोधाभास बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि हर अपराध किसी वीरान ग्रह पर नहीं होता। अधिकांश अपराध उसी समाज में होते हैं जिसमें हम और आप रहते हैं। उसी सड़क पर। उसी शहर में। उसी व्यवस्था के बीच। और अपराध के बाद भी शहर चलता रहता है। सुबह होती है। लोग काम पर जाते हैं। दुकानें खुलती हैं। बसें चलती हैं। बच्चे स्कूल जाते हैं। लेकिन किसी एक घर में समय रुक जाता है। ‘राख’ की असली त्रासदी शायद यही है।
दुनिया आगे बढ़ जाती है। पीड़ित परिवार वहीं रह जाता है। अच्छा अपराध-नाटक अपराध से ज्यादा उसके बाद की जिंदगी को याद रखता है।
‘राख’ यह सोचने पर मजबूर करती है कि जो हो चुका है, उसके बाद क्या होगा। अपराधी पकड़ा जाएगा। कानून अपना काम करेगा। मामला अदालत तक जाएगा।
समाचार-पत्रों में खबर छपेगी। कुछ दिनों तक पूरा देश बात करेगा।
फिर?
फिर समाज आगे बढ़ जाएगा।
लेकिन जिस परिवार ने अपना बच्चा खोया है, उसके लिए वह घटना कभी अतीत नहीं बनेगी।
यही ‘राख’ है। आग खत्म हो जाने के बाद भी उसका निशान बचा रहता है। और इसलिए नाम ‘राख’ सार्थक लगता है। आग को हम देखते हैं। राख को हम अक्सर सिर्फ़ बचे हुए अवशेष की तरह देखते हैं। लेकिन राख में आग की पूरी कहानी छिपी होती है।
कितनी गर्म थी।
कितनी देर जली।
क्या-क्या जलाया।
और उसके बाद क्या बचा।
‘राख’ भी अपराध के बाद बचे हुए संसार की कहानी है।
यह हमें बताती है कि हर अपराध की एक दूसरी कहानी होती है जो अपराधी के पकड़े जाने के बाद शुरू होती है।
वह परिवार की कहानी है।
उस मां की कहानी है।
उस पुलिसवाले की कहानी है जो महीनों उस मामले के साथ जीता है।
उस शहर की कहानी है जो कुछ समय बाद सब भूल जाना चाहता है।
और उस समाज की कहानी है जिसे अपने भीतर झांकना पसंद नहीं।
‘राख’ कोई ऐसी सीरीज़ नहीं है जिसे देखकर आप हर दस मिनट में कहें कि “क्या जबरदस्त मोड़ आया!”
यह उससे अलग तरह की कहानी है। यह धीरे-धीरे भीतर उतरती है। कहीं आपको रोकती है। कहीं अधीर करती है। कहीं परेशान करती है। और खत्म होने के बाद शायद कुछ देर तक चुप रहने के लिए मजबूर करती है।
अली फज़ल अपने संयमित अभिनय से जयप्रकाश जाटव को याद रह जाने वाला पुलिसवाला बनाते हैं। सोनाली बेंद्रे बिना अनावश्यक भावुकता के एक मां की टूटन को सामने रखती हैं। राकेश बेदी का गंभीर रूप सुखद आश्चर्य है। बाकी कलाकार भी उस दुनिया को विश्वसनीय बनाते हैं।
कुछ जगहों पर कहानी का कसाव कम पड़ता है। स्पीड और एडिटिंग को थोड़ा और सधा हुआ किया जा सकता था। लेकिन इन कमियों के बावजूद ‘राख’ में एक ऐसी ईमानदारी है जो इसे सिर्फ़ एक और अपराध शृंखला बनने से बचाती है। ‘राख’ अनुषा नंदकुमार और संदीप साकेत ने लिखी है और प्रोसित रॉय, अनुषा नंदकुमार और संदीप साकेत ने निर्देशन किया है।
यह अपराध के बारे में है, लेकिन सिर्फ़ अपराध के बारे में नहीं।
यह पुलिस के बारे में है, लेकिन सिर्फ़ पुलिस के बारे में नहीं।
यह एक परिवार के बारे में है, लेकिन सिर्फ़ उस परिवार के बारे में नहीं।
यह दरअसल उस समाज के बारे में है जिसमें अपराध पैदा होता है, घटित होता है और फिर धीरे-धीरे भुला दिया जाता है।
और शायद इसलिए आखिरी सवाल यही रह जाता है कि आग बुझ गई। अपराधी पकड़ा गया। कहानी खत्म हो गई। लेकिन जो राख बची है, उसका क्या? अगर आप अपराध की ऐसी कहानियां पसंद करते हैं जो सिर्फ़ अपराधी तक पहुंचने की कोशिश नहीं करतीं, बल्कि उस अंधेरे को भी समझना चाहती हैं जिसमें अपराध जन्म लेता है तो देख लीजिएगा।
(पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार औरयूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़”के होस्ट हैं )
