एक मूक स्त्री की चीख: ‘बेबी डू डाई डू’

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फ़िल्म का शीर्षक भी अपने भीतर एक विचित्र बेचैनी समेटे हुए है। बेबी डू डाई डूकिसी लोकप्रिय धुन जैसा सुनाई देता है, लेकिन फ़िल्म देखते हुए महसूस होता है कि यह जीवन के एक अंतहीन चक्र का रूपक है, करो, बचो, गिरो, फिर उठो। यहां मृत्यु केवल शरीर की नहीं, संवेदनाओं की भी है।

सिने-सोहबत

हर दौर का सिनेमा अपने समय की बेचैनियों का दस्तावेज़ होता है। कुछ फ़िल्में हमें हंसाती हैं, कुछ रुलाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद भी हमारे भीतर चलती रहती हैं। निर्देशक नचिकेत सामंत की ‘बेबी डू डाई डू’ इसी तीसरी श्रेणी की फ़िल्म है। यह अपने दर्शक से त्वरित मनोरंजन नहीं, बल्कि थोड़ी संवेदनशीलता और थोड़ा धैर्य मांगती है। बदले में वह एक ऐसा अनुभव देती है जो केवल देखा नहीं, महसूस किया जाता है।

हिंदी सिनेमा में अपराध, गैंगस्टर और कॉन्ट्रैक्ट किलर नई बातें नहीं हैं। दशकों से हम बंदूक, बारूद और बदले की कहानियां देखते आए हैं। लेकिन हर कहानी का मूल्य इस बात से तय होता है कि वह हिंसा को कैसे देखती है। क्या वह हिंसा का तमाशा बनाती है या उसके पीछे छिपे मनुष्य को खोजती है? ‘बेबी डू डाई डू’ दूसरे रास्ते पर चलती है। यह फ़िल्म हत्या से अधिक उस मनःस्थिति को समझने का प्रयास करती है जहां एक इंसान हत्या तक पहुंचता है।

फ़िल्म की नायिका ‘बेबी’ सुन नहीं सकती, बोल नहीं सकती। पहली नज़र में यह उसकी सीमा लगती है, लेकिन फ़िल्म आगे बढ़ते-बढ़ते इसी मौन को उसकी सबसे बड़ी अभिव्यक्ति में बदल देती है। यह एक दिलचस्प सिनेमाई निर्णय है। जिस पात्र के पास शब्द नहीं हैं, वही सबसे अधिक बातें कह जाता है। उसकी आंखों में जो ठहराव है, वह कई लंबे संवादों से अधिक प्रभावशाली बनकर उभरता है।

आज के दौर में जब हर फ़िल्म अपने पात्रों को समझाने में व्यस्त रहती है, नचिकेत सामंत अपने दर्शकों पर भरोसा करते हैं। वे हर भावना का अनुवाद नहीं करते। वे दर्शक को दृश्य पढ़ने देते हैं। कैमरे की गति, फ्रेम की बनावट, प्रकाश और सन्नाटा, ये सब मिलकर कहानी कहते हैं। यही वह सिनेमाई भाषा है, जिसकी कमी आज के मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में अक्सर महसूस होती है।

फ़िल्म का शीर्षक भी अपने भीतर एक विचित्र बेचैनी समेटे हुए है। ‘बेबी डू डाई डू’ किसी लोकप्रिय धुन जैसा सुनाई देता है, लेकिन फ़िल्म देखते हुए महसूस होता है कि यह जीवन के एक अंतहीन चक्र का रूपक है, करो, बचो, गिरो, फिर उठो। यहां मृत्यु केवल शरीर की नहीं, संवेदनाओं की भी है।

मुझे हमेशा लगता है कि किसी भी फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होता कि उसका नायक कौन है, बल्कि यह कि निर्देशक किसके प्रति करुणा रखता है। नचिकेत सामंत की करुणा अपराध के प्रति नहीं, मनुष्य के प्रति है। यही कारण है कि फ़िल्म किसी भी क्षण हिंसा का उत्सव नहीं मनाती। हर हिंसक दृश्य के बाद एक अजीब सी रिक्तता रह जाती है। जैसे निर्देशक हमें याद दिला रहे हों कि हर गोली केवल एक शरीर को नहीं, कई स्मृतियों को भी घायल करती है।

हुमा कुरैशी ने अपने अभिनय जीवन के सबसे कठिन किरदारों में से एक को निभाया है। बिना संवादों के अभिनय करना अभिनय की अंतिम परीक्षा माना जाता है। वहां अभिनेता के पास शब्दों का सहारा नहीं होता। केवल आंखें, सांसें, चाल, ठहराव और चेहरे की सूक्ष्म मांसपेशियां होती हैं। हुमा इन सभी माध्यमों का असाधारण उपयोग करती हैं। उनके चेहरे पर एक साथ कठोरता और मासूमियत दिखाई देती है। यही विरोधाभास ‘बेबी’ को यादगार बनाता है।

सिकंदर खेर अपनी सहज उपस्थिति से कथा को संतुलित करते हैं। चंकी पांडे अपने अनुभव से किरदार में अप्रत्याशित गहराई जोड़ते हैं। सीमा पाहवा कम दृश्यों में भी अपनी छाप छोड़ जाती हैं। सहायक कलाकारों की विश्वसनीयता ही किसी भी थ्रिलर की रीढ़ होती है, और यह फ़िल्म उस परीक्षा में सफल रहती है।

फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफी विशेष उल्लेख की अधिकारी है। मुंबई यहां चमकते पोस्टरों वाला महानगर नहीं, बल्कि अपने भीतर हजारों अधूरी कहानियां छिपाए एक जीवित चरित्र बनकर सामने आती है। अंधेरी गलियां, भीगी सड़कें, टूटती इमारतें, बंद कमरे और शहर का लगातार धड़कता शोर, सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं जहां पात्रों की मानसिक अवस्था शहर के भूगोल से जुड़ जाती है। कैमरा कई बार इतना निकट आ जाता है कि दर्शक स्वयं पात्र की सांसों का हिस्सा महसूस करने लगता है।

फ़िल्म का ध्वनि-निर्माण भी उल्लेखनीय है। यह विडंबना नहीं, बल्कि संवेदनशीलता है कि एक मूक पात्र की कहानी में ध्वनि का इतना गहरा अर्थ पैदा किया गया है। कई दृश्यों में संगीत अनुपस्थित है, और वही अनुपस्थिति दृश्य को कहीं अधिक बेचैन बना देती है। सिनेमा में मौन का उपयोग जितना कठिन है, उतना ही प्रभावशाली भी। इस फ़िल्म ने उस कठिनाई को स्वीकार किया है।

इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके तकनीकी पक्ष से आगे जाकर उसकी वैचारिक दृष्टि में है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां समाज हर घटना का त्वरित निर्णय चाहता है। हमें अपराधी चाहिए, कारण नहीं। हमें खलनायक चाहिए, इतिहास नहीं। हम परिणाम देखते हैं, प्रक्रिया नहीं। ‘बेबी डू डाई डू’ इस अधीरता का प्रतिरोध करती है। वह यह पूछने का साहस करती है कि क्या कोई मनुष्य केवल अपने अपराध से परिभाषित किया जा सकता है? क्या हर हिंसा के पीछे कोई ऐसी कहानी नहीं होती जिसे समाज ने कभी सुनना ही नहीं चाहा?

यहां फ़िल्म अपने सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रवेश करती है। वह न्यायालय की भाषा नहीं बोलती, मनुष्य की भाषा बोलती है। वह अपराध को उचित नहीं ठहराती, लेकिन अपराधी बनने की यात्रा को समझने का आग्रह करती है। यही वह बिंदु है जहां यह फ़िल्म सामान्य एक्शन थ्रिलर से आगे निकल जाती है।

हां, कुछ कमियां भी हैं। दूसरे हिस्से में पटकथा कुछ जगह अपनी ही गति से संघर्ष करती दिखाई देती है। शुरुआती एक घंटे में जो रहस्य बड़ी सावधानी से निर्मित होता है, वह बाद के हिस्से में अपेक्षाकृत जल्दी खुलने लगता है। कुछ मोड़ अधिक गहरे भावनात्मक प्रभाव छोड़ सकते थे यदि उन्हें थोड़ा और समय दिया जाता। क्लाइमैक्स भी दृश्यात्मक रूप से प्रभावशाली होने के बावजूद भावनात्मक स्तर पर उतनी तीव्रता नहीं प्राप्त कर पाता, जितनी फिल्म ने प्रारम्भ में सम्भावना जगाई थी।

लेकिन किसी फ़िल्म का मूल्य केवल उसकी कमियों से तय नहीं होता। कला की सबसे बड़ी कसौटी उसकी ईमानदारी है। ‘बेबी डू डाई डू’ अपने प्रयास में ईमानदार है। वह आसान रास्ता नहीं चुनती। वह दर्शक को लगातार सोचने के लिए विवश करती है।

मुझे इस फ़िल्म को देखते हुए बार-बार यह महसूस हुआ कि आधुनिक समाज की सबसे बड़ी त्रासदी संवादहीनता है। हम बोलते बहुत हैं, सुनते बहुत कम हैं। रिश्तों में, परिवारों में, संस्थाओं में और राजनीति में, हर जगह शब्द बढ़े हैं, संवाद घटा है। शायद इसलिए इस फ़िल्म की सबसे मुखर पात्र वही स्त्री है जो बोल नहीं सकती। यह केवल पटकथा का संयोग नहीं, एक गहरी सांस्कृतिक टिप्पणी है।

अच्छी फ़िल्में अपने समय से बहस करती हैं। महान फ़िल्में समय से आगे निकल जाती हैं। ‘बेबी डू डाई डू’ शायद अभी उस दूसरी श्रेणी में नहीं पहुंचती, लेकिन वह निश्चित रूप से पहली श्रेणी की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म है। यह बताती है कि शैलीगत सिनेमा भी संवेदनशील हो सकता है और व्यावसायिक संरचना के भीतर भी मनुष्य की जटिलताओं पर बात की जा सकती है।

आज जब हिंदी सिनेमा अक्सर दो ध्रुवों में बंट जाता है, एक ओर बड़े बजट का तमाशा और दूसरी ओर सीमित दर्शकों के लिए बना कला-सिनेमा ऐसे समय में यह फ़िल्म एक मध्य पथ तलाशती है। यही उसका महत्व है। यह मनोरंजन और विचार, दोनों को साथ लेकर चलने का साहस करती है।

फ़िल्म समाप्त होने के बाद मेरे मन में एक विचार देर तक ठहरा रहा। समाज अक्सर अपराधियों की तलाश करता है, जबकि सिनेमा उनके भीतर बचे हुए मनुष्य की। शायद इसी कारण सिनेमा हमें कानून से अधिक करुणा सिखाता है। और करुणा, किसी भी सभ्य समाज की पहली शर्त है।

‘बेबी डू डाई डू’ केवल एक मूक हत्यारी की कहानी नहीं है। यह उस शोरगुल भरे समय की कहानी है, जहां सबसे महत्वपूर्ण आवाज़ें सुनाई ही नहीं देतीं। नचिकेत सामंत की यह फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि हर चीख शब्दों से नहीं निकलती। कुछ चीखें आंखों में रहती हैं, कुछ स्मृतियों में और कुछ हमारे सामूहिक मौन में।

जब आप सिनेमाघर से बाहर निकलेंगे, तो संभव है आपको कहानी के सारे मोड़ याद न रहें। लेकिन एक स्त्री की शांत आंखें, उसका ठहरा हुआ चेहरा और उसके भीतर जमा अनकहा दुख बहुत देर तक आपका पीछा करेंगे। और शायद किसी भी फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता यही होती है कि वो खत्म होने के बाद भी हमारे भीतर चलती रहे।

नज़दीकी सिनेमाघर में है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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