कैसे बने नकलमुक्त शिक्षा व्यवस्था?

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नीट परीक्षाओं के विवाद से देश भर में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। ये परीक्षाएं दोबारा करवाने की बात भी हो रही है। लेकिन अक्सर यह देखा गया है कि भारत में होने वाली परीक्षाओं में या तो पेपर लीक किए जाते हैं या फिर परीक्षाओं के समय बड़े स्तर पर नक़ल की जाती है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता रहती है कि जो परीक्षाएँ हों, न तो उनके पेपर लीक हों न ही ऐसी परीक्षाओं में नकल हो। लेकिन असल में वास्तविकता इसके विपरीत ही हो जाती है। ऐसा नहीं है कि देश में नक़लमुक्त शिक्षा संभव नहीं है। कमी है तो सिर्फ़ इसके प्रबंधन की।

प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश का हर युवा, देश के विकास में योगदान करे। इसके लिए उन्होंने ‘कौशल विकास’ का विशेष मंत्रालय भी बनाया है। सर्वविदित है कि सरकार हर नौजवान को नौकरी नहीं दे सकती है। निजी क्षेत्र, कृषि या स्वरोजगार ही वो रास्ते है, जिनके जरिये एक नौजवान अपने जीवन में स्थायित्व ला सकता है। जीवन जीने की चुनौतियां अनेक है। जिनका सामना करने के लिए, हर युवा का संतुलित विकास होना आवश्यक है। व्यक्तित्व विकास का एक महत्वपूर्णं अंग शिक्षा है। अशिक्षित युवा के लिए चुनौतियां और भी बढ़ जाती है। पर समस्या इस बात की है कि जिन्हें शिक्षित या डिग्रीधारी माना जाता है, वे स्वयं ही अंधेरे कुऐं में पड़े हैं। डिग्रियां हाथ में हैं, फिर भी वे शिक्षित नहीं कहे जाते।

वैसे तो संपूर्ण भारत में प्राथमिक, माध्यमिक और स्नातक स्तर की शिक्षा व्यवस्था अपनी आत्मा और आधारभूत संरचनाओं में वर्तमान एवं भावी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। परन्तु विशेषतः उत्तर प्रदेश के परिपेक्ष में इसे सरकारी संरक्षण में नकल माफिया के हाथ सौंपकर इसकी लगभग हत्या ही कर दी गयी है। आश्चर्य जनक है कि समाज, सरकार, प्रशासन और मीडिया, इस न बदली जा सकने वाली सामाजिक और राष्ट्रीय बर्बादी पर चुप्पी साधे है।

सारे साल स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाई न के बराबर होती है। शिक्षा व्यवस्था के प्रबंध तंत्र, शिक्षक एवं छात्र सभी भाई-भतीजावाद एवं पैसों के लेनदेन से नकल कराकर प्रमाणपत्र हासिल कर लेने के दुश्चक्र में फंस चुके हैं। इस माफिया का अंग बना युवा, मेधावी बच्चों की संभावनाओं का गला काटकर, अपने प्रमाण पत्र लहराकर शिक्षित दिखता है, सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है या फिर बड़े संस्थानों में प्रवेश पा लेता है। जबकि मेधावी छात्र, जो इस फरेब का अंग नहीं बनना चाहते, वे पीछे छूट जाते हैं।

इससे उपजी अर्थव्यवस्था से सरकारी अधिकारी परीक्षा करने वाली संस्थाएं, स्कूल-कॉलेजों के मालिक, शिक्षक, माफिया एवं निकम्मे छात्र लाभान्वित होते हैं और भारत के ताबूत में हर साल कीलें ठोक रहे हैं। आश्चर्य है कि इस सामूहिक बर्बादी पर सब चुप हैं। सरकार शायद विवश है कि वो निकम्मे और जाल-साज शिक्षकों पर अच्छा काम करने का दबाव डालना नहीं चाहती क्योंकि वह चुनाव तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

देशों में कई बार ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं जिन्होंने बातें तो बड़ी-बड़ी की लेकिन बजाए इसके कि वो शिक्षा में सुधार लाते, उन्होंने एक ऐसा शिक्षा माफिया खड़ा कर दिया, जिसने विद्यार्थियों की नकल करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया और इससे उपजने वाले धन के संग्रहण के लिए पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी। कोई भी पीढ़ी जिसकी शिक्षा की जड़ें हवा में हों, मजबूत भारत के निर्माण में कैसे सहायक होगी? खोखली शिक्षा के आधार पर तैयार ये पीढ़ी, जिसके हाथों में स्मार्ट फोन है, वही इस माफिया तंत्र का हिस्सा बन जाता है और ये क्रम निरंतर जारी है।

छोटे-छोटे देश अपनी मजबूत शिक्षा व्यवस्था की वजह से विकसित देशों की कतार में आ गए हैं। हमने माफिया को शिक्षा व्यवस्था सौंपकर अपनी कम से कम दो पीढ़ियों को निकम्मा और लाचार बना दिया है। इस बात की ज्यादा संभावना है कि ये पीढ़ी, नक्सलवाद, आतंकवाद और संगठित अपराध की ओर जाए। ऐसे में ऐसी पीढ़ी न समाज के लिए और न ही देश के विकास के लिए कोई योगदान देने में सक्षम हो पायेगी।

यदि हमें एक विकसित समाज और देश की संरचना करनी है, जैसा हमारे नेता भी अपने चुनावी भाषणों में बोलते हैं, तो नेताओं व बुद्धिजीवियों को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करनी ही होगी, जिसमें तकनीक द्वारा संचालित नकल मुक्त शिक्षा पद्धतियों का विकास, मानकीकरण एवं निगरानी अनुभवी व्यक्तियों की समिति या आयोग द्वारा की जाए। नौकरशाही, शिक्षकों एवं पुलिस द्वारा केवल प्रबंधन ही किया जाए। क्योंकि नौकरशाही, शिक्षक एवं पुलिस इस व्यवस्था को ठीक करने में लगातार नाकाम रहे हैं।

तकनीकी पर आधारित शिक्षा व्यवस्था ही हमें इस मानवीय दुर्गुण से बचा सकती है। अन्यथा हम ऐसे सामूहिक विनाश की तरफ अग्रसर होंगे, जिसे ठीक करने का मौका भी समय हमे नहीं देगा और भावी पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। आशा की जानी चाहिए कि सभी शिक्षाविद् इसकी महत्ता को समझेंगे और वर्तमान नेतागण इस विषय पर गंभीर और महत्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे और इस अधोगति को रोकने में सहायक होंगे।

आजादी के बाद से आज तक शिक्षा को सुधारने के लिए दर्जनों आयोग बने और उन्होंने तमाम सुझाव भी दिये। जिसकी रिर्पोट दशाब्दियों से धूल खा रही है। जब देश में इतना कुछ बदल रहा है, तो प्रदेशों की सरकार को अपने-अपने प्रदेशों के शिक्षा तंत्र से इस माफिया को दूर करना चाहिए और शिक्षा नीति में बड़ा परिवर्तन करना चाहिए। तभी होगा ‘सबका साथ और सबके विकास‘ का नारा सार्थक।


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