चुप्पी की छटपटाहट: ‘बयान’

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फ़िल्म का सबसे भयावह पहलू उसका ‘विलेन’ नहीं, बल्कि उसका पूरा ‘सिस्टम’ है, जिसमें पंथ, सत्ता और ‘खामोश हिंसा’ अपने अपने अनुपात में मौजूद हैं। पंथ नेता का किरदार जिसे चंद्रचूड़ सिंह ने बेहद संयमित और सधे तरीके से निभाया है, किसी पारंपरिक खलनायक की तरह नहीं है। वह चिल्लाता नहीं, हिंसक नहीं दिखता लेकिन उसका प्रभाव सर्वव्यापी है।

सिने -सोहबत

हिंदी सिनेमा में कुछ फ़िल्में केवल देखी नहीं जातीं, बल्कि उन्हें महसूस किया जाता है। ऐसी फ़िल्में हमारे भीतर उतरती हैं और एक असहज चुप्पी छोड़ जाती हैं। लेखक-निर्देशक बिकास रंजन मिश्रा की फ़िल्म ‘बयान’ ऐसी ही एक सिनेमाई रचना है, जो अपने शीर्षक की तरह ही एक ‘गवाही’ बन कर उभरती है। ये गवाही समाज, सत्ता और मौन के त्रिकोण की गवाही है। ‘चौरंगा’ जैसी चर्चित फ़िल्म के बाद मिश्रा ने यहां अपनी सिनेमाई दृष्टि को और अधिक परिपक्व, गहन और राजनीतिक रूप से प्रखर बनाया है।

बयान की कहानी राजस्थान के एक छोटे कस्बे में स्थापित उस सामाजिक भूगोल को रेखांकित करती है, जहां आस्था केवल निजी विश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन का औजार बन जाती है। एक गुमनाम पत्र, जिसमें एक प्रतिष्ठित पंथ नेता पर यौन शोषण का आरोप है, पूरी कथा को गति देता है।

‘बयान’ की कहानी किसी सनसनीखेज खुलासे की नहीं, बल्कि उस ‘मौन’ की है जिसे समाज ने पवित्रता का नाम दे रखा है। फ़िल्म यह दिखाती है कि कैसे आस्था, सत्ता और पितृसत्ता मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं, जहां सच बोलना अपराध बन जाता है। यह वही भारत है जिसे हम पहचानते हैं, जहां धर्म और सत्ता के बीच की रेखा धुंधली है, और जहां ‘भक्ति’ कई बार ‘भय’ में बदल जाती है।

फ़िल्म का केंद्र है रूही, जिसे समर्थ अभिनेत्री हुमा क़ुरैशी ने अद्भुत संयम के साथ निभाया है। वह एक युवा पुलिस अधिकारी है, जिसे इस जटिल केस की जांच सौंपी जाती है। रूही का संघर्ष केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी है। एक ओर उसका कर्तव्यबोध है, दूसरी ओर वह व्यवस्था है जो उसे लगातार सीमित करती है। उसके पिता (जिनका किरदार सचिन खेड़ेकर निभाते हैं) ख़ुद पुलिस तंत्र का हिस्सा हैं और यह रिश्ता उसके संघर्ष को और जटिल बना देता है।

हुमा कुरैशी यहां ‘एक्ट’ नहीं करतीं, बल्कि वे ‘जीती’ हैं। उनका अभिनय इस फिल्म की धड़कन है, नियंत्रित लेकिन भीतर से उथल-पुथल से भरा।

फ़िल्म का सबसे भयावह पहलू उसका ‘विलेन’ नहीं, बल्कि उसका पूरा ‘सिस्टम’ है, जिसमें पंथ, सत्ता और ‘खामोश हिंसा’ अपने अपने अनुपात में मौजूद हैं। पंथ नेता का किरदार जिसे चंद्रचूड़ सिंह ने बेहद संयमित और सधे तरीके से निभाया है, किसी पारंपरिक खलनायक की तरह नहीं है। वह चिल्लाता नहीं, हिंसक नहीं दिखता लेकिन उसका प्रभाव सर्वव्यापी है।

उसके आश्रम, उसके अनुयायी, उसकी ‘इमेज’, सब मिलकर एक ऐसा कवच बनाते हैं जिसे तोड़ना लगभग असंभव है। यही वह बिंदु है, जहां बयान व्यक्तिगत अपराध से आगे बढ़कर संस्थागत अपराध की बात करती है।

फ़िल्म की कास्ट और सबकी परफॉरमेंस इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। संपा मंडल, अभिजीत दत्त और अन्य कलाकार जैसे प्रीति शुक्ला, अदिति कंचन सिंह, परितोष सांड, विभोर मयंक, स्वाति दास, पेरी छाबड़ा और मनीषा शेखावत सभी मिलकर उस सामाजिक ताने-बाने को रचते हैं, जिसमें यह कहानी घटित होती है। यहां कोई भी किरदार ‘एक्स्ट्रा’ नहीं है बल्कि हर चेहरा उस चुप्पी का हिस्सा है जो फ़िल्म का केंद्रीय विषय है। कास्टिंग के लिए युवा कास्टिंग डायरेक्टर राहुल तंवर बधाई के पात्र हैं।

‘बयान’ का चयन टोरंटो इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल के ‘डिस्कवरी’ सेक्शन में होना केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि यह कहानी वैश्विक स्तर पर भी प्रासंगिक है। इस फ़िल्म का एशिया प्रीमियर साउथ कोरिया के ‘बुसान इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ में हुआ है। यह उस भारत की कहानी है जो परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है जहां सत्ता और जेंडर के समीकरण नए रूप ले रहे हैं।

फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय ग्रांट्स और मेंटरशिप का समर्थन मिला जो इसकी स्क्रिप्ट की बौद्धिक और कलात्मक ताकत को दर्शाता है।

पिछले एक दशक में भारतीय सिनेमा और वेब सीरीज़ में ‘गॉडमैन’ या तथाकथित आध्यात्मिक गुरुओं के मिथक को तोड़ने की एक स्पष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है। वास्तविक जीवन में सामने आए कई मामलों, जहां धार्मिक नेताओं पर यौन शोषण, भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगे, ने इस विषय को और प्रासंगिक बना दिया है।

इस संदर्भ में बयान को केवल एक फ़िल्म के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘सांस्कृतिक हस्तक्षेप’ के रूप में देखना चाहिए। जहां मुख्यधारा अक्सर इस विषय को सनसनी या थ्रिल के रूप में पेश करती है, वहीं बिकास रंजन मिश्रा इसे एक मनोवैज्ञानिक और संरचनात्मक समस्या के रूप में देखते हैं।

यह फ़िल्म बताती है कि समस्या केवल ‘एक बुरे व्यक्ति’ की नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता की है जो ऐसे व्यक्तियों को जन्म देती है और उन्हें संरक्षण देती है।

मिश्रा की निर्देशन शैली क़ाबिल ए ग़ौर  है। वे दर्शक को स्पून फ़ीड नहीं करते, बल्कि पूरी रवानगी से विज़ुअल क़िस्सागोई करते हैं जो कि अपने आप में एक सधा हुआ, लगभग ध्यानात्मक नैरेटिव है। इस फ़िल्म का हर दृश्य लगातार मजबूर करता है कि आप हर दृश्य को महसूस करें, हर खामोशी को सुनें। बिकास रंजन मिश्रा की स्टोरीटेलिंग में निर्भीकता और बेबाक़ी का ज़बरदस्त संतुलन है।

फ़िल्म का निर्माण प्लाटून वन फ़िल्म्स और सम्मिट स्टूडियोज़ द्वारा किया गया है, साथ ही गाइडेंट फ़िल्म्स का सहयोग भी है। निर्माता शिलादित्य बोरा, मधु शर्मा, कुणाल कुमार, अनुज गुप्ता और सह निर्माता सादिक केशवानी ने इस तरह की गंभीर और जोखिमपूर्ण कहानी को समर्थन देकर एक ज़रूरी कदम उठाया है।

प्रोडक्शन डिज़ाइन (विनय विश्वकर्मा), आर्ट डायरेक्शन (अभिनव कुलकर्णी) और कॉस्ट्यूम (शिल्पी अग्रवाल) मिल कर एक ऐसा यथार्थ रचते हैं, जो बनावटी नहीं, बल्कि भयावह रूप से परिचित लगता है। राजस्थान का सूखा परिदृश्य यहां केवल लोकेशन नहीं, बल्कि एक मनोदशा है, एक ऐसा समाज जो भीतर से बंजर हो चुका है।

फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि “क्या सच बोलना संभव है?”

यहां गवाह केवल कानूनी शब्द नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है। महिलाएं बोलना चाहती हैं, लेकिन उनके सामने खड़ा है डर, शर्म, सामाजिक बहिष्कार और एक संगठित सत्ता। ‘बयान’ यह दिखाती है कि न्याय केवल अदालतों में नहीं मिलता, बल्कि वह समाज की स्वीकृति से भी जुड़ा होता है और जब समाज ही चुप हो, तो न्याय एक असंभव कल्पना बन जाता है।

‘बयान’ एक फ़िल्म से अधिक एक सामाजिक दस्तावेज़ है, एक ऐसा दस्तावेज़ जो हमारे समय की सबसे असहज सच्चाइयों को दर्ज करता है।

बिकास रंजन मिश्रा ने यहां एक साहसी, ईमानदार और गहन फ़िल्म बनाई है। हुमा कुरैशी का प्रदर्शन इसे भावनात्मक गहराई देता है, जबकि पूरी कास्ट इसे विश्वसनीय बनाती है।

यह फ़िल्म हमें झकझोरती नहीं बल्कि धीरे-धीरे भीतर से बदलती है। यह हमें हमारी चुप्पियों का आईना दिखाती है और पूछती है कि क्या हम सच सुनने के लिए तैयार हैं? और शायद यही बयान का सबसे बड़ा प्रभाव है कि यह केवल एक कहानी नहीं कहती, बल्कि हमें हमारी अपनी कहानी से सामना कराती है।

जल्द ही रिलीज़ होने वाली है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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