बंगाल में आर-पार की चुनावी लड़ाई

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अब बिहार में भाजपा की सरकार बनने जा रही है। 20 साल का नीतीश कुमार का राज समाप्त हो रहा है। यह संयोग भी है कि ये दोनों राज्य किसी समय बंगाल का हिस्सा रहे थे। इनके बाद अब बंगाल की बारी है। भारतीय जनता पार्टी कुछ इसी अंदाज में चुनाव की तैयारी कर रही है।

भारतीय जनता पार्टी ने बिहार का किला फतह कर लिया है। अब पश्चिम बंगाल की बारी है। ध्यान रहे उत्तर, पश्चिम और पूर्वी भारत के सिर्फ तीन बड़े राज्य ऐसे थे, जहां भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री नहीं बन पाया था। 2024 में उनमें से एक राज्य ओडिशा में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की और उसका मुख्यमंत्री बना। भाजपा ने 25 साल का नवीन पटनायक का राज खत्म किया। उसके बाद अब बिहार में भाजपा की सरकार बनने जा रही है। 20 साल का नीतीश कुमार का राज समाप्त हो रहा है। यह संयोग भी है कि ये दोनों राज्य किसी समय बंगाल का हिस्सा रहे थे। इनके बाद अब बंगाल की बारी है। भारतीय जनता पार्टी कुछ इसी अंदाज में चुनाव की तैयारी कर रही है। इतिहास में भी दिल्ली और देश पर उसी का राज मजबूत हुआ, जिसका बंगाल पर कब्जा था। दक्कन यानी दक्षिण भारत की लड़ाई उसके बाद लड़ी जाती है। हालांकि भाजपा एक साथ दक्षिण भारत की लड़ाई भी लड़ रही है।

बहरहाल, पश्चिम बंगाल की चुनावी लड़ाई आर-पार की सिर्फ इसलिए नहीं है कि वहां भाजपा को अपनी सरकार बनानी है या अपना मुख्यमंत्री बनाना है। यह कई दूसरे कारणों से आर-पार की लड़ाई है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा और बंगाली हिंदुओं की सुरक्षा से जुड़ा चुनाव है। ध्यान रहे हर चुनाव के साथ सुरक्षा की चिंता गहराती जाती है। पांच साल पहले जो चुनाव हुआ वह भी राष्ट्रीय सुरक्षा और बंगाली हिंदुओं की सुरक्षा से जुड़ा था। तभी भाजपा के पक्ष में व्यापक हिंदू ध्रुवीकरण हुआ था। भाजपा को 40 फीसदी से कुछ कम वोट मिले थे। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद जो हुआ उसने चिंता को कई गुना बढ़ा दिया। दो मई 2021 को आए नतीजों के बाद राज्य के कई हिस्सों में बड़ी हिंसा हुई। भाजपा का समर्थन करने वाले हिंदुओं की पहचान पहले से की गई थी। नतीजों के बाद उनके घरों पर हमले हुए। उनको मारा गया। सैकड़ों हत्याएं हुईं, जिसे नस्ली सफाए की कोशिश कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इस बार के चुनाव पर उस डर का साया साफ दिख रहा है। बंगाल के लोगों को इस डर से बाहर निकलना होगा। भारतीय जनता पार्टी को यह भरोसा दिलाना होगा कि वह आम लोगों के साथ खड़ी है। सुरक्षा बलों की तैनाती अपनी जगह है। लेकिन वह स्थायी समाधान नहीं है क्योंकि केंद्रीय बलों की तैनाती अनंतकाल तक नहीं हो सकती है। तृणमूल कांग्रेस के राज और उसमें एक समुदाय की ओर से होने वाले अत्याचार से त्रस्त लोगों को अगर यह भरोसा नहीं हुआ कि भाजपा जीतेगी और उसके बाद जमीनी हालात बदलेंगे, तब तक वह हिम्मत के साथ मतदान के लिए नहीं निकलेगा। उसके मनोविज्ञान में पिछली बार के चुनाव के बाद हुई हिंसा की तस्वीरें बैठी हुई हैं। इसलिए वह डरा हुआ है लेकिन यह भी चाहता है कि किसी तरह के बदलाव हो। यह पहला मौका है, जब बांग्लाभाषी हिंदू वास्तव में इस बात की चिंता कर रहा है कि अगर तृणमूल कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई तो उसका क्या होगा!  इसलिए वे सत्ता परिवर्तन चाहते हैं लेकिन उससे पहले उनको हौसला और संबल चाहिए।

इस बार का विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए अपने साथ साथ परिवार और पार्टी का अस्तित्व बचाने वाला चुनाव बन गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पता है कि अगर उनकी पार्टी चुनाव हारी तो उसका हस्र भी वैसा ही होगा, जैसा वामपंथी मोर्चे की जीत के बाद कांग्रेस का हुआ था और तृणमूल की जीत के बाद वाम मोर्चे की पार्टियों का हुआ था। एक बार चुनाव हार कर सत्ता से बाहर होने के बाद कोई साथ नहीं देगा। तभी वे भी आर-पार की लड़ाई की तैयारी में हैं। उनकी तैयारी में एक बड़ी बाधा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से पैदा हो रही है। चुनाव आयोग ने राज्य सरकार के सारे दांव फेल कर दिए हैं। गौरतलब है कि बिहार में एसआईआर शुरू होने के बाद पश्चिम बंगाल की सरकार ने बड़े पैमाने पर लोगों को ऐसे प्रमाणपत्र उपलब्ध कराए, जो एसआईआऱ की प्रक्रिया में मददगार बने। तभी एसआईआऱ के पहले चरण के बाद बंगाल में 58 लाख ही नाम कटे, जबकि बिहार में 69 लाख नाम कटे थे।

एसआईआऱ के दूसरे चरण के बाद यानी तमाम अदालती हस्तक्षेप के बाद जो अंतिम मतदाता सूची सामने आई उसमें भी 60 लाख नाम विचाराधीन कर दिए गए। इन मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच का जिम्मा अब न्यायिक अधिकारियों के हाथ में है। पिछले एक हफ्ते में इन 60 लाख मतदाताओं में से सिर्फ 10 फीसदी यानी छह लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच हो पाई है। ध्यान रहे अगले एक हफ्ते में पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा होने वाली है। सोमवार और मंगलवार को चुनाव आयोग की टीम बंगाल में रहेगी और लौटने के बाद अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देकर चुनाव की घोषणा कर दी जाएगी। जाहिर है इतने कम समय में सभी 60 लाख नामों की जांच नहीं हो पाएगी। इस बीच राज्य की विपक्षी पार्टियों, जिसमें वाममोर्चा और कांग्रेस मुख्य हैं, ने यह मांग शुरू कर दी है कि जब तक सारे नामों की जांच नहीं हो जाती है तब तक चुनाव की घोषणा नहीं होनी चाहिए।

अगर ऐसा होता है तो यह ममता बनर्जी के लिए ज्यादा चिंता की बात होगी क्योंकि 60 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच के लिए चुनाव टालना पड़ेगा और अगर चुनाव टला तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाएगा। ध्यान रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी और तमिलनाडु में तीन साल से ज्यादा समय तक राज्यपाल रहे रविंद्र नारायण रवि को बंगाल का राज्यपाल बनाया गया है। वे बिहार के रहने वाले हैं। राष्ट्रपति शासन लगते ही सरकार की कमान उनके हाथ में चली जाएगी।

शासन और नौकरशाही की कमान हाथ से निकलने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी और उनके कैडर में घबराहट बढ़ेगी, जिसका बहुत बड़ा चुनावी नुकसान उनको हो सकता है। पिछले दिनों ममता बनर्जी ने कहा कि उनके चुनाव क्षेत्र भबानीपुर में 44 हजार नाम काटे गए हैं और कई हजार नाम विचाराधीन रखे गए हैं। इसके आगे उन्होंने कहा कि अगर एक भी मतदाता बचेगा तो वे ही चुनाव जीतेंगे। इससे ऐसा लग रहा है कि वे नहीं चाहती हैं कि चुनाव टले और राष्ट्रपति शासन में चुनाव हो। वे चाहेंगी कि भले 40 या 50 लाख नाम और कट जाएं, लेकिन चुनाव समय पर हो जाए। ऐसा होता है तो यह अभूतपूर्व बात होगी। ध्यान रहे बंगाल में अंतिम मतदाता सूची में 63 लाख से ज्यादा नाम कटे हैं और 60 लाख नाम विचाराधीन हैं। अगर समय पर चुनाव होता है तो संभव है कि बंगाल में एक करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के बगैर चुनाव हो।

बहरहाल, एक तरफ भाजपा की आखिरी किला फतह करने की तैयारी है तो दूसरी ओर बांग्ला भाषी हिंदुओं की सुरक्षा का मामला है और तीसरी ओर ममता बनर्जी की अपनी चिंताएं हैं। लेकिन इन तीनों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है। पश्चिम बंगाल की सीमा बांग्लादेश से लगती है और राज्य सरकार की ओर से जमीन नहीं दिए जाने की वजह से बड़े इलाको में बाड़ लगाने का काम नहीं हो पाया है। इसकी वजह से घुसपैठ और तस्करी बहुत आम है। पश्चिम बंगाल और बिहार के कई सीमावर्ती जिलों में मुस्लिम आबादी इतनी बढ़ी है कि जनसंख्या संरचना बदल गई है। घुसपैठ को रोकना देश की सुरक्षा और जनसांख्यिकी दोनों के लिए बहुत अहम है।

संभवतः इसलिए पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार के सीमांचल में तीन दिन का प्रवास किया। उन्होंने केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारियों के साथ विचार विमर्श किया। उसके बाद ही खबर आई कि बिहार के किशनगंज, पूर्णिया, अररिया और कटिहार के साथ पश्चिम बंगाल के माल्दा और उत्तरी दिनाजपुर को मिला कर एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जा सकता है। ध्यान रहे जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद वहां सुरक्षा हालात में व्यापक सुधार हुआ है। उस मॉडल पर कुछ करने की तैयारी हो सकती है। संभव है कि सेना की पृष्ठभूमि वाले अता हुसैन को बिहार का राज्यपाल बनाना ऐसी ही किसी रणनीति का हिस्सा हो। इस नजरिए से भी पश्चिम बंगाल का चुनाव नतीजे बहुत अहम होगा। बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री बन रहा है और असम में कम से कम अभी कोई ऐसी संभावना नहीं दिख रही है कि भाजपा वापस न हो। ऐसे में अगर पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की सरकार बनती है तो इस पूरे इलाके में यानी समूचे पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सुरक्षा का परिदृश्य बेहतर होगा। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


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