तकनीक में वैश्विक स्तर का भारत भ्रम

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कोई देश केवल घोषणा करके तकनीकी महाशक्ति नहीं बन जाता। तकनीकी शक्ति धीरे-धीरे बनती है—दशकों की मेहनत, गहरे शोध, मज़बूत संस्थाओं और सवाल पूछने वाली संस्कृति से। … वैश्विक तकनीकी नेतृत्व का मतलब कुछ और होता है। वह सेमीकंडक्टर डिज़ाइन, सुपरकंप्यूटिंग, उन्नत रोबोटिक्स, नई सामग्री, जैव-प्रौद्योगिकी और मूल एआई मॉडलों जैसी खोजों से तय होता है।

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव का यह कहना कि भारत उन्नत तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल सेवाओं में वैश्विक स्तर तक पहुँच चुका है, तालियाँ बजाने से पहले सोचने की ज़रूरत पैदा करता है। इसलिए क्योंकि कोई देश केवल घोषणा करके तकनीकी महाशक्ति नहीं बन जाता। तकनीकी शक्ति धीरे-धीरे बनती है—दशकों की मेहनत, गहरे शोध, मज़बूत संस्थाओं और सवाल पूछने वाली संस्कृति से।

इन कसौटियों पर देखें तो भारत अभी वहाँ नहीं है जहाँ राजनीतिक भाषा उसे दिखाती है। यह कोई नैतिक कमी नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत है। फर्क तकनीकी तंत्र की उम्र में है, शोध की गहराई में है, उत्पादन की बनावट में है और उस निवेश के समय व पैमाने में है जो तकनीकी नेतृत्व के लिए ज़रूरी होता है।

भारत का तकनीकी कार्यबल बड़ा और जोशीला है। लेकिन वह बहुत युवा भी है, और यह बात मायने रखती है। ज़्यादातर तकनीकी पेशेवर तीस साल से कम उम्र के हैं। युवावस्था फ़ायदा है, पर तकनीकी नेतृत्व अनुभव से बनता है—लंबे शोध, जटिल इंजीनियरिंग, बार-बार असफल होकर सीखने और संस्थागत स्मृति से। अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और इज़राइल ने अपने तकनीकी तंत्र चालीस से सत्तर वर्षों में तैयार किए। वहाँ के वरिष्ठ इंजीनियर और शोधकर्ता कई तकनीकी दौर देख चुके हैं। उनका अनुभव किसी त्वरित कोर्स या छोटी डिग्री में नहीं समाया जा सकता।

इसके मुक़ाबले भारत का आधुनिक तकनीकी तंत्र मुश्किल से पच्चीस साल पुराना है। इसने शानदार व्यक्तिगत प्रतिभाएँ ज़रूर दी हैं, लेकिन अभी उतनी वरिष्ठ और शोध-आधारित विशेषज्ञता नहीं बना पाया है जो किसी परिपक्व तकनीकी शक्ति की पहचान होती है। इसलिए भारत निष्पादन में मज़बूत है, पर मौलिक डिज़ाइन और खोज में कमज़ोर।

यह बात नतीजों में भी दिखती है। भारत का आईटी और डिजिटल क्षेत्र बड़े पैमाने पर काम करने, प्रक्रिया का पालन करने और कम लागत में सेवाएँ देने में आगे है। डिजिटल सार्वजनिक ढाँचा, बड़े प्लेटफ़ॉर्म और करोड़ों लोगों को सेवाएँ देना—इनमें भारत ने बड़ी सफलता पाई है। लेकिन वैश्विक तकनीकी नेतृत्व का मतलब कुछ और होता है। वह सेमीकंडक्टर डिज़ाइन, सुपरकंप्यूटिंग, उन्नत रोबोटिक्स, नई सामग्री, जैव-प्रौद्योगिकी और मूल एआई मॉडलों जैसी खोजों से तय होता है।

इन क्षेत्रों में भारत अभी पीछे है। दुनिया की लगभग पाँचवाँ आबादी होने के बावजूद, भारत का सेमीकंडक्टर पेटेंट और उच्च-स्तरीय एआई शोध में योगदान बहुत कम है। शीर्ष शोध विश्वविद्यालयों में उसकी मौजूदगी सीमित है। ऑपरेटिंग सिस्टम, नेटवर्किंग और अन्य मूल ओपन-सोर्स तकनीकों में भी भारत की भूमिका छोटी है। एआई में भारत अच्छा उपयोगकर्ता और लागू करने वाला है, लेकिन नई दिशा देने वाला नहीं।

लागत का पहलू भी अंतर दिखाता है। लंबे समय तक भारत की ताकत सस्ती और कुशल इंजीनियरिंग रही। अब यह मॉडल धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। दुनिया के अग्रणी देश अब मज़दूरों की संख्या पर नहीं, बल्कि स्वचालन, भारी पूँजी निवेश और उन्नत निर्माण प्रणालियों पर आगे बढ़ते हैं। उनकी उत्पादकता मशीनों, रोबोटिक्स और फैब्रिकेशन से आती है। जैसे-जैसे भारत में वेतन और सिस्टम की जटिलता बढ़ रही है, सेवा-आधारित मॉडल कम असरदार होता जा रहा है। पूँजी और क्षमता आधारित तकनीक की ओर जाना एक लंबी प्रक्रिया है, जो दशकों लेती है—और भारत अभी इसकी शुरुआत में है।

सबसे बड़ा अंतर निवेश के समय और पैमाने में है। अमेरिका ने 1950 के दशक में ही कंप्यूटिंग और सेमीकंडक्टर में निवेश शुरू कर दिया था। जापान और दक्षिण कोरिया ने 1970–80 के दशकों में मज़बूत औद्योगिक रणनीतियाँ अपनाईं। ताइवान ने 1980 के दशक में सेमीकंडक्टर ढाँचा खड़ा किया। चीन ने 2000 के बाद तकनीक में भारी निवेश किया। भारत में गंभीर निवेश मुश्किल से पिछले पाँच-सात वर्षों में शुरू हुआ है।

आज भी भारत का शोध और विकास खर्च जीडीपी का एक प्रतिशत भी नहीं है। उन्नत शोध, कंप्यूट सुविधाओं और फैब्रिकेशन के लिए सरकारी समर्थन सीमित है। विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच तालमेल कमज़ोर है। निर्माण तंत्र बिखरा हुआ है। भारत बिना मज़बूत आधार बनाए तेज़ छलांग लगाने की कोशिश कर रहा है।

अन्य समस्याएँ भी इसी ओर इशारा करती हैं। भारत प्रति व्यक्ति बहुत कम पीएचडी तैयार करता है। प्रतिभाशाली लोग अब भी विदेश जा रहे हैं। चिप डिज़ाइन से लेकर क्लाउड और एआई तक, विदेशी तकनीक पर निर्भरता बनी हुई है। उच्च-स्तरीय निर्माण और स्वचालन कमज़ोर हैं। ये संकेत बताते हैं कि भारत अभी तकनीकी मानक पर नहीं पहुँचा, बल्कि उसकी ओर बढ़ रहा है।

फिर भी भारत की उपलब्धियाँ कम नहीं हैं। डिजिटल सार्वजनिक ढाँचा, भुगतान और पहचान प्रणाली, सॉफ्टवेयर सेवाएँ, युवा इंजीनियरों की बड़ी संख्या और उद्यमिता—ये सब भारत की असली ताक़तें हैं। लेकिन ये भविष्य की नींव हैं, वर्तमान की मंज़िल नहीं। यह फर्क समझना ज़रूरी है। ज़रूरत से ज़्यादा आत्मश्लाघा उस समय आत्मसंतोष पैदा कर सकती है जब अनुशासन और सच्चाई की ज़रूरत होती है।

तकनीकी शक्ति भाषणों से नहीं बनती। वह लगातार निवेश, मज़बूत संस्थाओं, गहरे शोध और बड़े औद्योगिक पैमाने से बनती है। भारत का तकनीकी भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन अभी पूरा नहीं हुआ है। दुनिया के अग्रणी देश पीढ़ियों की मेहनत से आगे बढ़े। भारत भी आगे बढ़ सकता है—अगर वह दिखावे से ज़्यादा गहराई, आश्वासन से ज़्यादा यथार्थ और तात्कालिक प्रशंसा से ज़्यादा दीर्घकालिक क्षमता को चुने। सो तकनीकी शक्ति घोषित नहीं की जाती। उसे बनाया जाता है—धीरे-धीरे, पीढ़ी दर पीढ़ी।


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