चालीस दिन की जंग से अमेरिका को क्या मिला?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पश्चिम एशिया में जंग थम गई है। 40 दिन के बाद अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम हुआ है। हालांकि इजराइल इससे खुश नहीं है लेकिन अमेरिका के तैयार हो जाने के बाद उसके पास कोई रास्ता नहीं बचा था। अब सवाल है कि यह सिर्फ अस्थायी युद्धविराम है या अगले दो हफ्तों में जो बातचीत होगी, उससे युद्ध पर पूर्णविराम लग जाएगा? इसका एक जवाब यह है कि अगर वार्ता बीच में नहीं टूटी और दो हफ्ते तक पूर्ण युद्धविराम रहा तो यह युद्ध थम जाएगा। ऐसा मानने का कारण यह है कि अगर अमेरिका और इजराइल को युद्ध जारी रखना होगा तो वे वार्ता को दो हफ्ते तक नहीं खीचेंगे।

ध्यान रहे 28 फरवरी को भी युद्ध शुरू हुआ था तब संधि का समय चल रहा था।

मस्कट के बाद जेनेवा में हुई दूसरे दौर की वार्ता के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो हफ्ते का समय दिया था लेकिन पहले ही हफ्ते में उन्होंने हमले शुरू कर दिए। सो, इस बार अगर फिर से हमले नहीं शुरू होते हैं और बातचीत चलती रहती है तो उम्मीद की जा सकती है कि शांति बहाल हो जाएगी। इस बार शांति बहाली की उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि पहली बार चीन ने इस मामले में दखल दिया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उसके सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने तो संदेशवाहक का काम किया परंतु चीन ने ईरान को अपने तेवर नरम करने के लिए कहा, जिसके बाद दो हफ्ते के लिए युद्ध रोकने पर सहमति बनी।

अब बड़ा सवाल यह है कि 40 दिन के इस युद्ध से अमेरिका को क्या हासिल हुआ? क्या उसने पूरे पश्चिम एशिया या खाड़ी के इलाके को ज्यादा असुरक्षित नहीं बना दिया? क्या इससे इजराइल की कमजोरियों नहीं जाहिर हो गईं? क्या इससे अमेरिका के महाशक्ति होने की धारणा नहीं प्रभावित हुई है? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर इसी मुकाम पर युद्ध समाप्त होता है तो क्या उससे ईरान पश्चिम एशिया के सुपरपावर की तरह स्थापित नहीं होगा?

ध्यान रहे ईरान ने अमेरिका और इजराइल के सबसे भीषण हमलों का 40 दिन तक सामना किया और बराबरी से नहीं तो लगभग बराबरी से उसका जवाब दिया है। शीर्ष राजनीतिक, धार्मिक और सैन्य नेतृत्व के मारे जाने के बावजूद सरकार का ढांचा बना रहा और सरकार व सैन्य प्रशासन संरचना बिल्कुल प्रभावित नहीं हुई। दो दशक के बाद पहली बार अमेरिका के लड़ाकू विमान को किसी देश ने मार गिराया। खाड़ी देशों में अमेरिका के सैन्य ठिकानों पर ईरान ने सटीक हमला किया। 31 प्रांतों में बंटी उसकी विकेंद्रित सैन्य व्यवस्था लगातार जवाबी हमले करती रही।

अगर इजराइल की बात करें तो उसने जबरदस्त सेंसर लगाया था और एक रिपोर्ट के मुताबिक हर दिन कम से कम 20 खबरों को सेंसर किया जा रहा था, जिसमें विदेशी पत्रकारों की रिपोर्ट भी थी। खबरें या तो काट दी जाती थीं या पूरी तरह से रोक दी जाती थीं। कर्नल नेतोनेम कुला सेंसर के प्रभारी थे। अपनी तरफ से इजराइल ने सिर्फ सिविलयन ढांचे का नुकसान दिखाया, जबकि ईरान ने उसे सैन्य ढांचे को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। उसका एयर डिफेंस सिस्टम बुरी तरह से विफल रहा। अमेरिका और इजराइल कह सकते हैं कि उन्होंने ईरान की परमाणु क्षमता खत्म कर दी। दिल को बहलाने के लिए यह ठीक है। असल में उलटा हुआ है। अब ईरान सहित दूसरे कई देशों में परमाणु बम विकसित करने की भावना मजबूत हुई है। फ्रांसिस फुकोयामा जैसे व्यक्ति ने माना कि लीबिया में गद्दाफी का परमाणु कार्यक्रम छोड़ना गलत फैसला था और उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम बंद नहीं करना सही फैसला था।

बहरहाल, अमेरिका और इजराइल ने ईरान के नेतृत्व को तो मारा लेकिन ईरान का न तो मिसाइल सिस्टम पूरी तरह से नष्ट हुआ और न उसकी ड्रोन फैसिलिटी नष्ट हुई। कहीं पहाड़ों की गुफाओं में या जमीन के नीचे सुरंगों में ईरान ने जो मिसाइल और ड्रोन सेंटर बनाए हैं उन्हें नष्ट नहीं किया जा सके। हजारों लोग मारे गए लेकिन उससे ईरानी लोगों का जज्बा और मजबूत हुआ। ईरान की पारंपरिक सेना, आईआरजीसी और बासिज फोर्स को मिला कर कुल संख्या 15 से 16 लाख की बनती है लेकिन एक करोड़ 40 लाख लोगों ने अपने को सेना में भरती होने के लिए और अपनी कुर्बानी देने के लिए रजिस्टर कराया। ईरान की खामेनेई शासन की ज्यादतियों की वजह से सत्ता के खिलाफ आम ईरानियों का जो गुस्सा था वह राष्ट्रवाद की आंच में पिघल गया।

उलटे ईरान ने जंग लड़ने और अमेरिका, इजराइल के साथ साथ दुनिया को झुकाने का नया फॉर्मूला हासिल कर लिया। उसने एक तरफ होर्मुज की खाड़ी बंद करके यह दिखा दिया कि दुनिया के तेल संसाधन के प्रवाह पर नियंत्रण करने का अमेरिका का सपना आसानी से पूरा नहीं हो सकता है तो दूसरी ओर दुनिया को भी दिखाया कि अगर दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश नियम आधारित व्यवस्था को नहीं मानता है तो ईरान जैसा देश भी नियम भंग करके दुनिया की व्यवस्था को छिन्न भिन्न कर सकता है। ईरान ने अमेरिका के हाथों अपनी संप्रभुता सौंप देने वाले खाड़ी देशों को भी बता दिया कि अमेरिका उनकी रक्षा नहीं कर सकता है।

तभी 40 दिन की यह लड़ाई अमेरिका के लिए घाटे का सौदा साबित हुई है। अमेरिका ने महाशक्ति होने की धारणा गंवाई है तो दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना की सीमाएं भी जाहिर हुई हैं। पिछले साल जब राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ वॉर शुरू किया तो रेयर अर्थ मैटेरियल्स की सप्लाई रोक कर चीन ने अमेरिका की महाशक्ति की हैसियत को चुनौती दी थी। अब ईरान ने 40 दिन तक युद्ध लड़ कर बता दिया कि अमेरिका अपने बमवर्षक विमानों से किसी देश में तबाही तो ला सकता है लेकिन उसे जीत नहीं सकता है। तीन अलग अलग क्षेत्रों में इस युद्ध का जो संदेश है वह अमेरिका के लिए अच्छा नहीं है। पहला क्षेत्र खाड़ी का है, जहां अमेरिका के सहयोगी देश नए सिरे से अपने सुरक्षा आर्किटेक्चर पर विचार करेंगे।

अगर उन्होंने अमेरिका से दूरी बनाई तो यह पेट्रोडॉलर की व्यवस्था के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। अगर ईरान की बातचीत की शर्तों में यह शर्त आती है कि वह होर्मुज को कंट्रोल करेगा और ओमान के साथ मिल कर टोल वसूलेगा तो यह पेट्रोडॉलर के लिए और बड़ा झटका होगा क्योंकि यह खबर युद्ध के बीच ही आने लगी थी कि ईरान चीन की मुद्रा युआन में टोल वसूल रहा है। अगर पेट्रोडॉलर की व्यवस्था प्रभावित होती है तो 40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज वाले अमेरिका की हालत बहुत खराब होगी।

दूसरा क्षेत्र दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया का और प्रशांत महासागर का है। जब ईरान का युद्ध चल रहा था तब जापान और दक्षिण कोरिया बहुत बारीकी से उस पर नजर ऱख रहे होंगे। उनको यह समझ में आया होगा कि अगर ईरान के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका निर्णायक जीत हासिल नहीं कर पा रहा है और इजराइल की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो चीन और उत्तर कोरिया के साथ युद्ध में वह कैसे जापान और दक्षिण कोरिया की रक्षा करेगा? ताइवान के मन में भी यह सवाल होगा कि अगर चीन उसके खिलाफ कोई पहल करता है तो अमेरिका उसमें क्या कर सकता है? ध्यान रहे खबर है कि अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध में प्रशांत महासागर में तैनात अपनी सैन्य सामग्री का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर लिया है।

तीसरा क्षेत्र यूरोप और नाटो देशों का है।

ईरान के साथ युद्ध में लगभग सभी यूरोपीय देशों ने अमेरिका की मदद करने से इनकार कर दिया। उन्होंने ईरान के खिलाफ युद्ध के लिए अपने सैन्य ठिकानों और हवाईअड्डे के इस्तेमाल की मंजूरी नहीं दी। ट्रंप ने भी यूरोप के सभी नेताओं को अपमानित किया। ध्यान रहे यूरोप के साथ अमेरिका का संबंध अमेरिका के बहुत बड़ी आर्थिक या सैन्य शक्ति होने की वजह से नहीं था, बल्कि आपसी विश्वास और भरोसे से बना था। यूरोपीय देशों ने अमेरिका के हाथों में अपनी सुरक्षा सौंपी थी। लेकिन उनका भ्रम भी टूट गया है। अब सारे यूरोपीय देश अपनी सैन्य शक्ति बढ़ा रहे हैं। सो, पश्चिम एशिया, दक्षिण व दक्षिण पूर्व एशिया और यूरोप में इस युद्ध ने अमेरिका के प्रति नकारात्मक धारणा को

मजबूत किया है।

अगर युद्ध के खर्च की बात करें तो वह अमेरिका पर बहुत भारी पड़ा है। हर दिन लगभग एक अरब डॉलर यानी साढ़े नौ हजार करोड़ रुपए का खर्च आ रहा था। इसका अर्थ है कि 40 दिन की लड़ाई में लगभग चार लाख करोड़ रुपया खर्च हुआ है। अगर युद्ध आगे बढ़ता, जमीन पर सैनिक उतरते और समुद्र में मरीन व 82 एयरबॉर्न डिवीजन उतरता तो खर्च कई गुना बढ़ जाता। ध्यान रहे वियतनाम में जब अमेरिका ने युद्ध छेड़ा तो शुरुआत में उसके सिर्फ तीन हजार सैनिक जमीन पर थे लेकिन चार साल के बाद उसके पांच लाख सैनिक वहां लड़ रहे थे। अगर इस बार भी अमेरिका युद्ध को आगे बढ़ाता तो वह एक अंतहीन युद्ध में बदल सकता था। तभी राष्ट्रपति ट्रंप बार बार कह रहे थे कि ईरान में सत्ता बदल गई, अब वहां कम कट्टर और ज्यादा समझदार लोग सत्ता में आ गए हैं, ईरान की वायु सेना व नौ सेना समाप्त हो गई है आदि आदि। यह सब युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाशने की कोशिश भर थी।


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