बिहार को प्रयोगशाला बना दिया

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

बिहार राजनीति की प्रयोगशाला बना हुआ है। पांच महीने पहले नीतीश कुमार 80 फीसदी से ज्यादा सीटें जीत कर एनडीए के मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन उनको अभी हटाना है क्योंकि उनकी सेहत ठीक नहीं है। हालांकि यह कहा नहीं गया कि सेहत खराब होने और वह भी मानसिक सेहत की वजह से उनको हटाया जा रहा है। कहा गया कि वे राज्यसभा जाना चाहते थे इसलिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे। देश के किसी व्यक्ति ने इस बताए गए कारण पर यकीन नहीं किया। उन्होंने राज्यसभा का नामांकन दाखिल किया और चुन भी लिए गए। जब वे एक साथ दो सदनों के सदस्य हो गए तो 14 दिन के भीतर उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

इससे यह संवैधानिक सवाल भी खड़ा हुआ कि जब उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया तो फिर मुख्यमंत्री कैसे बने हुए हैं? ध्यान रहे संविधान का अनुच्छेद 164 बहुत स्पष्ट है। उसमें कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी सदन का सदस्य बने बगैर मंत्री बन जाता है तो उसे किसी भी सदन का सदस्य निर्वाचित होने के लिए छह महीने का समय दिया जाएगा। परंतु इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है कि अगर कोई मुख्यमंत्री, विधानमंडल के जिस सदन का सदस्य है, किसी वजह से उस सदन की सदस्यता गवां देता है तब क्या होगा। जाहिर है संविधान बनाने वालों ने भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी।

मुख्यमंत्री के राज्यसभा जाने की तमन्ना और संवैधानिक सवाल को छोड़ दें तब भी कई सवाल हैं, जो बिहार की 14 करोड़ की आबादी के लिहाज से बहुत अहम हैं। सबसे पहला सवाल तो यह है कि क्या बिहार में बच्चों का खेल चल रहा है? अगर नीतीश कुमार की ऐसी दिली तमन्ना है कि उनको राज्यसभा जाना है तो मुख्यमंत्री का पद क्यों नहीं छोड़ रहे हैं? वे राज्यसभा के लिए चुन लिए गए हैं। जब सभापति कहेंगे तब उनकी शपथ होगी। लेकिन उससे पहले मुख्यमंत्री पद पर क्यों बने हुए हैं? पिछले एक महीने से ज्यादा समय से यह नाटक चल रहा है। पांच मार्च को उन्होंने राज्यसभा के लिए नामांकन किया था। उसी दिन तय हो गया था कि वे संसद के उच्च सदन में जाएंगे।

उस दिन से बिहार में सब कुछ ठप हो गया। बिहार में एक ‘लेम डक’ यानी अस्थायी और तदर्थ व्यवस्था बन गई। कानूनी रूप से न सही लेकिन व्यावहारिक रूप से मुख्यमंत्री का कोई मतलब नहीं रह गया है। जब यह तय हो गया कि नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे और उनकी जगह कोई नया मुख्यमंत्री बनेगा तो अपने आप उनकी ऑथोरिटी समाप्त हो गई। मंत्रियों और अधिकारियों को मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से निर्देश जाने बंद हो गए और अगर जा भी रहे हैं तो कोई मंत्री या अधिकारी उस पर ध्यान नहीं दे रहा है। क्या किसी को ध्यान है कि बिहार में कब से कैबिनेट की बैठक नहीं हुई है? डेढ़ महीने हो गए। आखिरी बार 20 फरवरी को कैबिनेट की बैठक हुई थी।

सोचें, कैबिनेट की बैठक नहीं हो रही है। मुख्यमंत्री मंत्रियों या अधिकारियों के साथ बैठक नहीं कर रहे हैं। मुख्यमंत्री का सचिवालय काम नहीं कर रहा है। फिर बिहार कैसे चल रहा है? असल में बिहार चल ही नहीं रहा। सब कुछ ठप है। और यह स्थिति सिर्फ डेढ़ महीने से नहीं है, बल्कि छह महीने से ज्यादा समय से है। पिछले साल अक्टूबर में बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई थी और आचार संहिता लगने के बाद बिहार जो ठप हुआ तो आज तक ठप है।

चुनाव से ठीक पहले बिहार सरकार ने खजाने का मुंह खोल दिया था। महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपए भेजे गए। तीन श्रेणियों में सामाजिक सुरक्षा पेंशन चार सौ रुपए से बढ़ा कर 11 सौ रुपए की गई। सभी समूहों के वेतन और मानदेय में बढ़ोतरी की गई। 125 यूनिट बिजली फ्री करने की घोषणा की गई। इन सबका मिला जुला असर यह हुआ है कि बिहार का वित्तीय घाटा जीडीपी के नौ फीसदी तक पहुंच गया। सोचें, जिसे तीन फीसदी होना था वह नौ फीसदी हो गया!

सत्तारूढ़ दल की चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने हजारों करोड़ रुपए बांट दिए। अलग अलग योजनाओं के पैसे निकाल कर चुनाव जीतने के मकसद से लाई गई लोक लुभावन घोषणाओं पर खर्च किया गया। नतीजा यह रहा कि चुनाव के बाद सरकार के पास खर्च करने के लिए कुछ नहीं बचा, बल्कि बजट अनुमान से कई गुना ज्यादा वित्तीय घाटा हो गया। लगभग एक लाख करोड़ रुपया सरकार ने अतिरिक्त खर्च कर दिया। इस वजह से वेतन व पेंशन देने की समस्या खड़ी हुई। आयुष्मान कार्ड से लेकर स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड तक कई योजनाओं के पैसे रूक गए।

विकास के सारे कामकाज ठहर गए। बुनियादी ढांचे के निर्माण का काम जिन कंपनियों को मिला था उनका भुगतान कई महीनों से नहीं हुआ है। नई सरकार बनने के बाद उम्मीद थी कि सब कुछ वापस पटरी पर लौटेगा। लेकिन नई सरकार का खजाना खाली था तो सब कुछ टाल दिया गया। कहा गया कि नए वित्त वर्ष यानी एक अप्रैल 2026 से कामकाज शुरू होगा। परंतु तब तक नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने का ड्रामा शुरू हो गया।

देश के किसी भी राज्य में ऐसा ड्रामा नहीं हुआ होगा और न मुख्यमंत्री के हटने की प्रक्रिया इतनी लंबी चली होगी। चुनाव के समय की आचार संहिता की अवधि को छोड़ दें तो देश के किसी राज्य में ऐसा नहीं हुआ होगा कि महीनों तक कैबिनेट की बैठक न हो। इसमें कोई संदेह नहीं है कि नीतीश कुमार की सेहत ठीक नहीं है और वे मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन में सक्षम नहीं हैं। तो क्या बिहार को जल्दी से जल्दी किसी सक्षम हाथ में नहीं सौंपना चाहिए? क्या यह भाजपा, जनता दल यू और दूसरी सहयोगी पार्टियों की जिम्मेदारी नहीं है कि सत्ता हस्तांतरण जल्दी से जल्दी हो? जब एक बार तय हो गया कि नीतीश कुमार राज्यसभा जाएंगे और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे तो इसे एकता कपूर के सीरियल की तरह एक सौ एपिसोड का बनाने की क्या जरुरत है?

बिहार की जनता ने स्वीकार कर लिया है कि नीतीश कुमार की सेहत ठीक नहीं है और इसलिए वे पद छोड़  रहे हैं। यह भी स्वीकार कर लिया गया है कि विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी के नाते भाजपा को मुख्यमंत्री का पद मिलेगा। मंत्रियों की संख्या, मंत्रालय या स्पीकर का पद आदि को लेकर जो समझौता होना है वह भी पहले से तय है और अगर तय नहीं है तो यह एक दिन का काम है। इसके बावजूद न नीतीश का इस्तीफा हो रहा है और न नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति हो रही है। तारीख पे तारीख बताई जा रही है!

सोचें, दोनों सदनों का सदस्य निर्वाचित हो जाने के बाद 14 दिन के अंदर किसी एक सदन से इस्तीफा देना होता है तो नीतीश कुमार ने एकदम 14वें दिन विधान परिषद से इस्तीफा दिया। इसकी क्या जरुरत है? इसका भी कोई अर्थ नहीं है कि राज्यसभा की सदस्यता लेने के बाद ही वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे। नीतीश 20 साल मुख्यमंत्री रहे हैं। अगर वे 20 दिन और रह लेंगे तो क्या बदल जाएगा? उनके जीवन में कुछ नहीं बदलेगा लेकिन बिहार के करोड़ों लोगों के जीवन पर हर दिन असर हो रहा है।

नीतीश जिस मिजाज के व्यक्ति हैं वे पांच मार्च को ही राज्यसभा के लिए नामांकन भरने के बाद इस्तीफा दे सकते थे। तभी सवाल है कि क्यों इस्तीफा नहीं हो रहा है? क्या नीतीश कुमार के आसपास के जो लोग प्रॉक्सी सरकार चला रहे थे वे नहीं चाहते हैं कि बदलाव हो? क्या वे किसी खास मकसद से इसमें देरी कर रहे हैं? यह सवाल भी है कि क्या कोई दबाव है या नीतीश कुमार अपनी पसंद के मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा के लिए इस्तीफा रोके हुए हैं?

सबसे बड़ा कारण यह दिख रहा है कि भाजपा इससे संतुष्ट हो गई है कि नीतीश हट रहे हैं और उसका मुख्यमंत्री बन रहा है। इसलिए उसे दूसरी किसी चीज की परवाह नहीं है। वह चुपचाप तमाशा देख रही है। वह नहीं चाहती है कि उसकी ओर से ऐसी कोई पहल हो, जिससे जनता दल यू में नाराजगी हो। हालांकि जनता दल यू के बगैर भी भाजपा सरकार बनाने में सक्षम है। लेकिन उसके अंदर यह सोच है कि जब एक बार नीतीश सत्ता छोड़ने को तैयार हो गए हैं तो उनको अपना समय लेने दिया जाए। बिहार का जो होना है वह होता रहे!


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