युद्ध का भारत पर बड़ा असर होगा

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले में भारत पक्षकार नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युद्ध शुरू होने से दो दिन पहले जरूर इजराइल की यात्रा पर गए थे। लेकिन भारत इस सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं है। इसके बावजूद इस युद्ध का बड़ा असर भारत के ऊपर होगा। भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा दोनों पर व्यापक असर होगा तो साथ ही खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीय कामगारों और पेशेवरों द्वारा भेजे जाने वाले रेमिटेंसेज यानी उनके पैसे पर भी असर होगा। इसके अलावा भारत की कूटनीति और सामरिक नीति भी प्रभावित होगी। सवाल है कि क्या भारत इस युद्ध की संभावना को देख रहा था और उसके असर से निपटने की कोई तैयारी हुई थी? दोनों का जवाब नकारात्मक है। अगर भारत युद्ध की वास्तविक संभावना देख रहा होता तो प्रधानमंत्री मोदी इजराइल की यात्रा पर नहीं जाते। जब युद्ध की संभावना नहीं दिख रही थी तो जाहिर है कोई तैयारी भी नहीं होगी।

ध्यान रहे भारत किसी सैन्य गठजोड़ का हिस्सा नहीं है और इजराइल के साथ साथ ईरान से भी पारंपरिक रूप से भारत के संबंध अच्छे रहे हैं। इसलिए भारत के लिए यह एक कठिन परीक्षा की घड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बात की है। ईरान द्वारा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पर किए जा रहे हमले को लेकर भी भारत ने चिंता जताई है और इसकी आलोचना की है। लेकिन ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत पर भारत की चुप्पी से इसकी रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी हमेशा कहते रहे हैं कि यह युद्ध का समय नहीं है। रूस और यूक्रेन युद्ध में उन्होंने कई बार यह बात कही है। लेकिन इजराइल और अमेरिका के हमले में भारत यह बात नहीं कह रहा है। यह भी रणनीतिक स्वायत्तता के भारत के दावे पर सवाल खड़े करता है।

बहरहाल, ईरान पर इजराइल और अमेरिका के साझा हमले के असर को समझना हो तो सबसे पहले भारत की ऊर्जा सुरक्षा के नजरिए से इसे देखना होगा। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 81 फीसदी हिस्सा आयात करता है। पश्चिम एशिया इस आयात का प्रमुख स्रोत है। अगर ईरान होरमुज की खाड़ी को बाधित करता है और लाल सागर में हूती द्वारा हमला करके उस क्षेत्र को डिस्टर्ब किया जाता है तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है। दुनिया का करीब 20 फीसदी तेल होरमुज की खाड़ी से होकर गुजरता है। लेकिन भारत का 40 फीसदी तेल इस रास्ते से आता है। सोचें, अमेरिका के दबाव में भारत ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया है। अब अगर खाड़ी से तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है तो भारत की मुश्किल बढ़ेगी। इससे भारत पर अमेरिका और वेनेजुएला से ज्यादा तेल खरीदने के दबाव बढ़ेगा।

तेल की आपूर्ति प्रभावित होने से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल संभव है। अभी यह 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है और अगर जंग जारी रहती है तो यह एक सौ डॉलर प्रति बैरल तक या उससे ऊपर भी जा सकता है। इससे भारत के आयात बिल में बड़ी बढ़ोतरी होगी। इसका असर भारत की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। भारत का चालू खाते का घाटा बढ़ेगा और पहले से दबाव झेल रहा रुपया और दबाव में आएगा। अगर सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी करती है तो उससे आम उपभोक्ताओं पर असर होगा और साथ ही परिवहन, उर्वरक, बिजली और विमानन सेवाओं की कीमतें बढ़ेंगी। अंततः इसका बोझ भी जनता पर ही पड़ेगा। अगर महंगाई बढ़ती है तो उसका असर भारतीय रिजर्व बैंक की उदार ब्याज नीतियों पर भी पड़ेगा। केंद्रीय बैंक को सख्ती बरतनी होगी। अगर ब्याज दर बढ़ते हैं तो विकास दर में भी कमी आएगी।

एक अनुमान के मुताबिक खाड़ी देशों में 90 लाख से एक करोड़ भारतीय नागरिक रहते हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ओमान जैसे देशों में भारतीय समुदाय की बड़ी मौजूदगी है। बाहर से भारतीय पेशेवेर जो रेमिटेंस यानी पैसा भेजते हैं उसका एक तिहाई से ज्यादा करीब 35 फीसदी हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यह बड़ी रकम होती है, जिसका कई राज्यों की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान होता है। अगर ईरान का युद्ध व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में बदलता है, तो सभी खाड़ी देशों की सुरक्षा स्थिति प्रभावित हो सकती है। ध्यान रहे ईरान ने लगभग सभी खाड़ी देशों पर हमला शुरू कर दिया है। ऐसी स्थिति में भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी एक बड़ी कूटनीतिक और मानवीय चुनौती बन जाएगी। भारत ने यमन और यूक्रेन जैसे संकटों में बड़े पैमाने पर निकासी अभियान चलाए हैं, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में संकट कहीं अधिक जटिल हो सकता है। रेमिटेंसेज में कमी आएगी, जिससे केरल और तेलंगाना से लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश तक में लाखों परिवार प्रभावित होंगे।

ध्यान रखने की जरुरत है कि भारत का एक बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार के जरिए पश्चिम एशिया और यूरोप से जुड़ा है। युद्ध की स्थिति में इस रास्ते में व्यापार प्रभावित होगा, माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी, आपूर्ति शृंखला प्रभावित होगी और एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक शिपिंग बीमा महंगा होगा। इससे ऊर्जा के अलावा पेट्रोकेमिकल, फार्मा और इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात पर भी असर पड़ेगा। यदि समुद्री मार्गों में अस्थिरता बढ़ती है तो भारत को वैकल्पिक रास्तों और रणनीतियों पर तेजी से काम करना होगा।

भारत ने ईरान में चाबहार बंदरगाह के विकास में बड़ा निवेश किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टेलीविजन इंटरव्यू में इसे बड़ी उपलब्धि बताते रहे हैं। इस बंदरगाह से भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच मिलती है और भारत को क्षेत्रीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका मिलता है। युद्ध बढ़ने की स्थिति में यह परियोजना ठप पड़ सकती है, जिससे भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक योजनाएं प्रभावित होंगी। अगर यह क्षेत्र अस्थिर होता है तो चीन और अन्य शक्तियों को अपना असर बढ़ाने का मौका मिल सकता है।

भारत के सामने आर्थिक व ऊर्जा सुरक्षा से ज्यादा बड़ी चुनौती कूटनीतिक है। ईरान निश्चित रूप से चीन और रूस के ज्यादा करीब है लेकिन भारत के संबंध ऐतिहासिक और ऊर्जा आधारित रहे हैं। दूसरी ओर इज़राइल और अमेरिका के साथ भारत की रक्षा और रणनीतिक साझेदारी बेहद मजबूत है। ऐसे में भारत के लिए तटस्थ रहना और संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। भारत मल्टी एलायनमेंट की नीति पर काम कर रहा है। ऐसे में वह दोनों पक्षों से युद्ध खत्म करने और शांति बनाने की अपील कर सकता है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर उसे एक स्पष्ट पोजिशन लेनी होगी। अगर एशिया में हो रहे सैन्य टकराव में भी भारत मूक दर्शक ही रहता है तो वह वैश्विक मंच पर एक मजबूत मैसेज देने का मौका गंवा देगा। युद्ध के बाद इस क्षेत्र में हो सकता है कि अमेरिका की सैन्य उपस्थिति बढ़े। साथ ही इस क्षेत्र में नया इराक बनने की संभावना भी दिख रही है, जिससे अस्थिरता बढ़ेगी और स्थायी रूप से तनाव बना रहेगा। ऐसी स्थिति में भारत को अपनी ऊर्जा जरुरतों को पूरा करने के लिए खरीद में विविधता लाने पर गंभीरता से विचार करना होगा और वैकल्पिक व्यापार मार्गों की तलाश और विकास भी करना होगा।


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