शिक्षक अब पढ़ाने के लिए नहीं हैं

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

शिक्षक का मूल कार्य अध्ययन और अध्यापन है। भारत के सरकारी स्कूलों के शिक्षक अध्ययन का काम पहले ही काफी हद तक छोड़ चुके थे और अब अध्यापन का काम भी नाममात्र का रह गया है। शिक्षक अब स्कूलों में पढ़ाने के लिए नहीं हैं, बल्कि पाठ्येत्तर कार्यों के लिए हैं। उनके ऊपर इतने कामों की जिम्मेदारी लाद दी गई है कि वे बच्चों को पढ़ाने के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं। सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर लगातार कम होता जा रहा है तो इसका एकमात्र कारण यह नहीं है कि शिक्षक अच्छे नहीं हैं या शिक्षकों के प्रशिक्षण की अच्छी व्यवस्था नहीं है। वह कई कारणों में से एक कारण है। असल में सरकारी स्कूलों की कार्यों की सूची में अध्यापन का कार्य प्राथमिकता में नहीं है।

उन्हें स्कूल से बाहर और स्कूल में भी कई दूसरे काम करने हैं, जिनका पढ़ाई-लिखाई से कोई मतलब नहीं है। जैसे अभी 12 राज्यों और केंद्र शासित राज्यों के शिक्षक मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के काम में लगे हैं। कुछ राज्यों के शिक्षक स्थानीय निकायों के चुनाव करा रहे हैं। इस साल और अगले साल दो चऱणों में जनगणना का काम होगा और शिक्षक उसमें लगा दिए जाएंगे। पांच राज्यों के चुनाव भी हैं तो मतदान कराने से लेकर मतगणना तक उन राज्यों के सरकारी शिक्षक उसमें व्यस्त हो जाएंगे। वैसे उन राज्यों के स्कूल भी चुनाव के लिए आरक्षित होंगे। कहीं सुरक्षा बलों को ठहराया जाएगा तो कहीं मतदान केंद्र बनेंगे तो कहीं मतगणना केंद्र बनाए जाएंगे।

मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण या संक्षिप्त पुनरीक्षण या मतदान और मतगणना या जनगणना जैसे कामों की सूची बेहद लंबी है, जो शिक्षकों को करना होता है। एक अनुमान के मुताबिक अध्ययन और अध्यापन के अलावा शिक्षकों को स्कूल के बाहर डेढ़ दर्जन किस्म के अन्य सरकारी काम करने होते हैं। एक शिक्षक ने तंज करते हुए सोशल मीडिया में लिखा था कि अच्छा है कि सरकार खेती नहीं कराती है अन्यथा बुवाई, कटाई का काम भी शिक्षकों को करना होता।

बहरहाल, सरकार परिवार और स्वास्थ्य का सर्वे करती है तो वह काम शिक्षक करते हैं, सरकार पशुओं की गिनती कराती है तो वह काम शिक्षक करते हैं, सरकार किसी आपदा की स्थिति में राहत सामग्री बांटती है तो वह काम भी शिक्षकों के जिम्मे होता है, किसी बीमारी या टीके के लिए जागरूकता फैलानी है तो उसका जिम्मा भी शिक्षकों के ऊपर होता है, सफाई अभियान चलाना है तो उसमें शिक्षकों को आगे किया जाता है, यहां तक कि सत्तापक्ष के किसी बड़े नेता की रैली होती है तो उसमें भी शिक्षकों को बस में भर कर रैली में जाना होता है। केंद्र और राज्य सरकारों के अलावा जिले के कलेक्टर, प्रखंड के बीडीओ और पंचायत के मुखिया भी शिक्षकों को किसी न किसी काम में लगाए रहते हैं।

स्कूल के बाहर शिक्षकों को जो डेढ़ दर्जन अलग अलग किस्म के काम करने होते हैं उसके बाद ऐसा नहीं है कि बचे हुए समय में उनको स्कूल में बच्चों को पढ़ाना है। स्कूल में उनको डेढ़ दर्जन अलग किस्म के काम करने हैं, जो अध्ययन और अध्यापन से इतर हैं। मिसाल के तौर पर मिड डे मील तैयार करना एक काम होता है। एक से ज्यादा शिक्षक तो इसी में लगे रहते हैं। राशन खरीदने से लेकर खाना तैयार कराना और बच्चों को खिलाना स्कूलों में प्राथमिकता का काम है। जब से सरकार को लगने लगा है कि मास्टर लोग राशन में गड़बड़ी करते हैं तब से गड़बड़ी नहीं होने के सबूत जुटाना यानी हर चीज का हिसाब रखना, वीडियो आदि बनाना, डैशबोर्ड पर अपलोड करना भी शिक्षकों का जिम्मा हो गया है।

एक समय सरकार को लगा कि बच्चे सिर्फ खाने आते हैं या बच्चों की असली संख्या कम होता है और ज्यादा बच्चों के लिए खाना बनाने के नाम पर पैसे की गड़बड़ी होती है तब से शिक्षकों को यह काम भी दिया गया कि वे मिड डे मील खाने वाले बच्चों का फेशियल रिकग्निशन करें और उनकी वीडियो तैयार करें ताकि पुष्टि हो सके कि जिस बच्चे का नाम रॉल में है उसने स्कूल में खाना खाया। सो, मिड डे मील का मामला अब राशन खरीदने, खाना बनवाने और खिलाने के काम से काफी आगे बढ़ गया है। इस बीच तमिलनाडु सहित 12 राज्यों ने प्रस्ताव दिया है कि अगर स्कूलों में बच्चों को सुबह का नाश्ता भी दिया जाए तो उनका बेहतर पोषण होगा, उपस्थिति बढ़ेगी और पढ़ाई में उनका मन भी लगेगा। केंद्र सरकार इस पर विचार कर रही है। केंद्र और राज्य सरकारों को इसे भी लागू कर ही देना चाहिए ताकि शिक्षकों को पढ़ाने के काम से पूरी तरह से मुक्ति मिल जाए।

ऐसा नहीं है कि इतने पर भी शिक्षकों की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। उन्हें और भी कई काम करने होते हैं। मान लीजिए कि शिक्षा मंत्री शिक्षा से जुड़े किसी कार्यक्रम को संबोधित करते हैं तो स्कूलों से कहा जाता है कि उनका भाषण बच्चों को सुनाया जाए ताकि वे ‘लाभान्वित’ हो सकें। केंद्रीय विद्यालयों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री का भाषण सुनाया जाता है तो राज्यों के स्कूलों में राज्य के शिक्षा मंत्री का भाषण सुनाया जाता है। प्रधानमंत्री का भाषण तो सभी स्कूलों में सुनाया जाता है। भाषण सुनाने की व्यवस्था करने में कम से कम दो कक्षाएं प्रभावित होती हैं। लेकिन इतने पर काम खत्म नहीं होता है।

भाषण सुनते बच्चों की वीडिया बना कर उनको ऊपर भेजना होता है और किसी निर्धारित पोर्टल पर अपलोड भी करना होता है। यह काम हर सरकारी फंक्शन के बाद करना होता है। राष्ट्रीय दिवस का कार्यक्रम हो या नवाचार के नाम पर शुरू की गई किसी पहल का कार्यक्रम हो। उसे आयोजित करना, उसकी वीडियो बनाना और उसे अपलोड करना शिक्षकों की जिम्मेदारी होती है। शिक्षकों को इवेंट मैनेजर बना दिया गया है। उनको कार्यक्रम आयोजित करने, उसे सफल बनाने और उसके वीडियो अपलोड करने से फुरसत नहीं मिलती है। ग्रामीण और छोटे कस्बों में तो ज्यादातर स्कूल दो या तीन शिक्षकों के साथ चलते हैं। उन स्कूलों में तो शिक्षकों को पढ़ाने की फुरसत कभी नहीं मिल पाती है।

एनसीईआरटी के निदेशक रहे देश के जाने माने शिक्षाविद् प्रोफेसर कृष्ण कुमार ने दो महीने पहले ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था ‘इन इंडिया, व्हाई टीचर्स आर वॉकिंग अवे फ्रॉम द क्लासरूम’। इसमें उन्होंने यूनेस्को की एक रिपोर्ट का हवाला दिया था, जिसका टाइटल ‘व्हेअर हैव ऑल द टीचर्स गॉन’ था। इसमें यूनेस्को ने दुनिया भर में उभर रहे एक ट्रेंड का हवाला दिया था। दुनिया भर के देशों में पिछले दो दशक में अलग अलग कारणों से शिक्षक अपनी नौकरी छोड़ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि दूसरी नौकरी मिलने पर वे शिक्षक की नौकरी छोड़ रही हैं। वे स्कूलों में नौकरी करने की बजाय बेरोजगारी और अनिश्चितता का भविष्य चुन रहे हैं। यह बहुत भयावह ट्रेंड है। ऐसा करने के कई कारणों में एक कारण स्कूलों में बच्चों का बदलता व्यवहार भी है।

अच्छे शिक्षकों के लिए अब बच्चों को स्कूलों में हैंडल करना दिन प्रतिदिन मुश्किल होता जा रहा है। एक कारण स्कूलों की दशा भी है। लेकिन एक बड़ा कारण नौकरशाही है, जिसका ऊपर जिक्र किया गया है। शिक्षकों को पढ़ाने से ज्यादा प्रबंधन के काम में लगा दिया गया है। उन्हें कार्यक्रम आयोजित करने हैं, कार्यक्रमों की वीडियो बनानी है, उन्हें सरकारी पोर्टल पर अपलोड करना है, अलग अलग कार्यों की रिपोर्ट तैयार करनी है, उस रिपोर्ट को सरकारी दफ्तरों में भेजना है, नेताओं व अधिकारियों के भाषण सुनने हैं, उन भाषणों में कही गई उलजुलूल बातों को स्कूल में बच्चों को बताना है, इन सब कारणों से अच्छे शिक्षकों का मोहभंग हो रहा है। वे स्कूल छोड़ रहे हैं। जो बचे रह जा रहे हैं वे अध्ययन या अध्यापन का काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि नौकरी कर रहे हैं।

शिक्षकों को क्लर्क या मैनेजर बना दिया गया है। उन्हें बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के तरीके खोजने के लिए प्रेरित नहीं किया जाता है। उन्हें बच्चों में रचनात्मकता लाने के लिए प्रेरित नहीं किया जाता है। उन्हें बच्चों के समग्र विकास पर ध्यान देने की बजाय प्रबंधकीय कार्यों में लगाया जाता है। उनको मजबूर किया जाता है कि वे प्रबंधकीय कार्यों का सबूत इकट्ठा करें नहीं तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो जाती है। उन्हें बच्चों को पढ़ाने और जीवन संघर्षों के लिए तैयार करने की बजाय इस पर ज्यादा ध्यान देना होता है कि डैशबोर्ड पर बने चेक लिस्ट में कितने खानों में सही का  निशान लगा है। उससे उसकी परफॉर्मेंस रिपोर्ट तैयार होती है। सरकारों द्वारा तैयार कराए गए डिजिटल रिसोर्स यूज करने का दबाव शिक्षकों पर होता है। अगर कोई शिक्षक अपनी रचनात्मकता दिखाना चाहे तो उसके लिए कोई स्पेस नहीं होता है। इससे अच्छे शिक्षकों में फ्रस्ट्रेशन बढ़ रही है और वे नौकरी छोड़ रहे हैं तो बाकी शिक्षक की नौकरी कर रहे हैं। दोनों ही स्थितियों में नुकसान बच्चों का है।


Previous News Next News

More News

क्या सचमुच कीमतें नहीं बढ़ेंगी?

April 27, 2026

एक तरफ जनता का यह अटूट विश्वास है कि 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में आखिरी चरण का मतदान समाप्त होने के तुरंत बाद सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी करेगी और दूसरी ओर सरकार का यह दावा है कि कीमतें नहीं बढ़ेंगी। सवाल है कि इन दोनों में से किसकी बात…

राम माधव सच बोल कर पलट गए

April 27, 2026

क्या राम माधव ने भाजपा के अंदर अपनी वापसी की संभावना पर खुद ही पानी फेर दिया है? कह नहीं सकते हैं क्योंकि पार्टी में कोई बड़ा पद देने का क्राइटेरिया अलग होता है। लेकिन इतना जरूर हुआ है कि राम माधव की एक बौद्धिक नेता होने की छवि को नुकसान हुआ है। वह नुकसान…

केजरीवाल की पार्टी पर संकट नहीं

April 27, 2026

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए लोधी इस्टेट का नया मकान शुभ नहीं साबित हुआ है। जिस दिन वे नए मकान में शिफ्ट हुए उसी दिन सात राज्यसभा सांसद पार्टी छोड़ कर भाजपा के साथ चले गए। अब केजरीवाल के सामने अपनी पार्टी को एकजुट रखने का संकट है। पंजाब में आप के 92…

काठ की हांड़ी दोबारा चढ़ा रही है भाजपा

April 27, 2026

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने दिल्ली विधानसभा का 2025 का चुनाव अरविंद केजरीवाल की आम आदमी की छवि को ध्वस्त करके जीता। केजरीवाल ने अपने जीवन में संभवतः सबसे बड़ी गलती की थी दिल्ली में बड़ा बंगला बनाने की। उसकी पोल खुल गई और करोड़ों रुपए के खर्च का ब्योरा सामने आ गया। सो,…

आप सांसदों की सामूहिक पलटी

April 27, 2026

यह घटना राजनीति को एक ‘धंधा’ साबित करती है, जहां सिद्धांतों की जगह स्वार्थ हावी है। लेकिन एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि जनता अब ज्यादा सजग हो रही है। 2027 के चुनाव में मतदाता इन ‘ट्रैक्टरों’ को याद रखेंगे और वोट से जवाब देंगे। अशोक मित्तल पर ईडी के छापे के महज 10…

logo