अगड़ा-पिछड़ा राजनीति का दांव मुश्किल

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

बिहार विधानसभा चुनाव में बड़ी सावधानी से अगड़ा और पिछड़ा का दांव खेलने का प्रयास हो रहा है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता अशोक महतो का यह बयान कि, ‘भूराबाल पूरी तरह से साफ कर देना है’, इसी राजनीति का संकेत है। इससे पहले राजद की प्रवक्ता सारिका पासवान और सवर्ण नेता आशुतोष कुमार के बीच हुई जुबानी जंग और मुकदमेबाजी को भी इसी नजरिए से देखने की जरुरत है। उस समय राजद के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से सामाजिक विभाजन बढ़ाने वाली पोस्ट की गई थी। हालांकि राजद के नेता तुरंत संभल गए और अपने कदम पीछे खींच लिए। राजद के नेता तेजस्वी यादव ‘ए टू जेड’ यानी सभी जातियों की राजनीति करने की बात कर रहे हैं और उन्होंने अपने पिता लालू प्रसाद के बनाए ‘माई’ यानी मुस्लिम व यादव समीकरण के बरक्स ‘माईबाप’ समीकरण बनाने की घोषणा की है। तेजस्वी ने ‘माई’ में ‘बाप’ जोड़ते हुए कहा कि, ‘बी से बहुजन, ए से अगड़ा, ए से आधी आबादी और पी से पुअर यानी गरीब’। यह भी एक तरह से ‘ए टू जेड’ का दूसरा रूप है।

चूंकि तेजस्वी यादव ‘ए टू जेड’ की राजनीति कर रहे हैं और उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा और जदयू का कोर वोट आधार माने जाने वाले भूमिहार और वैश्य समुदाय के उम्मीदवार भी राजद की टिकट पर उतारे थे इसलिए उनकी पार्टी में अगड़ा और पिछड़ा का विभाजन कराने का दांव साधने का प्रयास कर रहे नेताओं को बहुत सावधानी से यह काम करना पड़ रहा है। वे खुल कर यह काम नहीं कर रहे हैं। हालांकि संदेश स्पष्ट होता है। अशोक महतो ने कहा हो या अतरी के राजद विधायक के सामने कहा गया हो या मुजफ्फरपुर के राजद नेता ने कहा हो, जब भी राजद नेताओं ने ‘भूराबाल साफ करो’ का नारा दिया तो उनके बड़े नेता चुप रहे। उन्होंने न तो इसका खंडन किया और न इस तरह के बयान देने वाले नेताओं पर कोई कार्रवाई की। उलटे तेजस्वी यादव ने अलग तरह से यही दांव चला। उन्होंने सभी जगहों पर कहना शुरू किया है कि इस बार अगर एनडीए चुनाव जीतेगा तो नीतीश कुमार नहीं, बल्कि भाजपा के मंगल पांडेय मुख्यमंत्री बनेंगे। उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने बिहार के दो उप मुख्यमंत्रियों में से एक विजय सिन्हा के नाम की भी चर्चा करा दी। विजय सिन्हा भूमिहार जाति से आते हैं। भाजपा का मुख्यमंत्री बनेगा और कोई अगड़ा मुख्यमंत्री हो सकता है, राजद का यह प्रचार भी अगड़ा बनाम पिछड़ा राजनीति का दांव साधने वाला है।

भाजपा इस बात को लेकर सावधान है। तभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ साथ उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का चेहरा आगे रखा गया है। सम्राट चौधरी बार बार कह रहे हैं कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जा रहा है और चुनाव के बाद उन्हीं के नेतृत्व में सरकार बनेगी। नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी के चेहरे से भाजपा दो तरह के मैसेज बनवा रही है। पहला तो यह कि लव-कुश के हाथ से सत्ता नहीं जा रही है और दूसरा यह कि गैर यादव पिछड़े समाज के हाथ में ही नेतृत्व रहने वाला है। मंगल पांडेय और विजय सिन्हा या नितिन नबीन जैसे अगड़े नेता भाजपा में हैं लेकिन सबसे प्रमुख नेताओं में सम्राट चौधरी, नित्यानंद राय, दिलीप जायसवाल और संजय जायसवाल ही हैं। ये सारे नेता नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के नाम पर ही बिहार की जनता से वोट मांग रहे हैं।

बिहार के सवर्ण, जिनको ‘भूराबाल’ कहा जा रहा है उन्होंने नब्बे के दशक में ही यह समझ लिया था कि अब सत्ता उनको नहीं मिलने वाली है। जब कोई समाज एक बार इस बात को समझ लेता है तो फिर वह राजनीति को ज्यादा प्रभावित करने में सक्षम हो जाता है। तभी बिहार के सवर्ण पिछले ढाई दशक से बिहार की राजनीति को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रहे हैं। लेकिन जैसा कि आनंद मोहन ने कहा कि, ‘भूराबाल तय करेगा कि किसकी सरकार बनेगी’ वह भी सही नहीं है। बिहार में नौ से 10 फीसदी आबादी सवर्ण हिंदुओं की है। उनकी पहली पसंद एनडीए है लेकिन लगभग सभी जातियां अपनी जाति के विधायकों की संख्या बढ़ाने को प्राथमिकता दे रही हैं। जातीय समूहों की ओर से अपील की जा रही है कि किसी भी पार्टी से टिकट मिले, लेकर आएं, समाज आपका साथ देगा। तेजस्वी यादव इस बात को समझ रहे हैं तभी पिछले लोकसभा चुनाव में ‘इंडिया’ ब्लॉक की ओर से तीन भूमिहार चुनाव लड़े और भूमिहारों ने उन तीनों को वोट भी दिया। पश्चिम चंपारण की सीट पर कांग्रेस के ब्रह्माण उम्मीदवार के लिए ब्राह्मणों ने पूरी एकजुटता दिखाई। सो, सवर्णों की एक तो आबादी बहुत कम है और दूसरे उनकी प्राथमिकता बदल गई है। अब बहुत थोड़े से सवर्णों की प्राथमिकता किसी तरह से लालू प्रसाद के परिवार को रोकने की है। बहुसंख्यक सवर्ण, पार्टी की बजाय उम्मीदवार देख कर वोट करेंगे। इसलिए वे यह तय नहीं करेंगे कि बिहार में किसकी सरकार बनेगी।

बिहार में किसकी सरकार बनेगी यह तय होगा गैर यादव पिछड़ी जातियों से। बिहार में पिछड़ी जातियों की आबादी 27 फीसदी है, जिनमें 14 फीसदी यादव हैं। आठ से नौ फीसदी में कोईरी, कुर्मी और वैश्य समाज की कुछ जातियां हैं। इसमें कोईरी यानी कुशवाहा सबसे आकांक्षी जाति है और टैक्टिकल वोटिंग के लिए जानी जाती है। पिछली बार लोकसभा चुनाव में जिन सीटों पर ‘इंडिया’ ब्लॉक ने कुशवाहा उम्मीदवार दिया था वहां जाति का वोट उनको मिला था। तभी भाजपा की और से सम्राट चौधरी का चेहरा आगे किया गया है। कुर्मी वोट में नीतीश के रहते कोई गड़बड़ी नहीं होगी। गैरयादव के बाद भाजपा और जदयू का सबसे बड़ा वोट आधार अतिपिछड़ी जातियों का है। बिहार में 36 फीसदी अति पिछड़ी जातियां हैं, जिनमें से करीब 26 फीसदी हिंदू हैं। यह वोट एकमुश्त एनडीए को जाता है। इसमें जदयू से ज्यादा पकड़ भाजपा की है। इसके बाद 20 फीसदी दलित आबादी है। इसमें पांच फीसदी रविदास को छोड़ कर बाकी 15 फीसदी का बड़ा हिस्सा पारंपरिक रूप से एनडीए के साथ जाता है। इस तरह करीब आठ फीसदी गैर यादव पिछड़े, 26 फीसदी के करीब हिंदू अतिपिछड़े और 15 फीसदी दलित यानी 49 फीसदी का ठोस वोट आधार एनडीए का है, जो पिछले 20 साल से उसकी जीत का मुख्य कारण है। इसमें नौ फीसदी अगड़ों का बड़ा हिस्सा भी जुड़ता रहा है।

वैसे भी बिहार की राजनीति में ‘भूराबाल’ यानी अगड़ी जातियां कुछ भी तय करने की स्थिति में नहीं हैं। उनके नेताओं की हैसियत देने वाली नहीं, बल्कि मांगने वाली है। वे एक भी नेता को टिकट नहीं दिला सकते हैं। राजद में टिकट संजय यादव की मदद से लालू और तेजस्वी यादव तय करेंगे। कांग्रेस में दलित नेता राजेश राम अभी सबसे मजबूत स्थिति में हैं तो वीआईपी की टिकट मुकेश सहनी तय करेंगे। लेफ्ट की टिकटों में जाति का मामला ज्यादा प्रभावी नहीं होता है। उधर एनडीए की बात करें तो भाजपा में सम्राट चौधरी, नित्यानंद राय और दिलीप जायसवाल टिकट तय करेंगे। जदयू में नीतीश कुमार तय करेंगे, लोजपा में चिराग पासवान, राष्ट्रीय लोक मोर्चा में उपेंद्र कुशवाह और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा में जीतन राम मांझी तय करेंगे। किसी भी पार्टी से एक भी सवर्ण नेता ऐसी स्थिति में नहीं है कि एक भी टिकट का फैसला करा सके। पार्टियां अगड़ों को टिकट देंगी तो अपने राजनीतिक समीकऱण के तहत देंगी। इसलिए भी चाहे कोई कितना भी प्रयास कर ले बिहार का चुनाव अगड़ा बनाम पिछड़ा नहीं होगा। यह पिछड़ा बनाम पिछड़ा ही रहेगा, जिसमें बाकी जातियां होशियारी से अपनी जगह बनाएंगी।


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