आपराधिक न्याय की धज्जियां

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यह पहला मौका नहीं है, जब ऐसा हुआ हो। इस मामले में बात सिर्फ यह है कि हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था मानव चेतना को आहत करने वाले एक कांड में भी दोषियों तक कानून के हाथ नहीं पहुंचा सकी।

हृदयविदारक निठारी कांड का अभियुक्त सुरिंदर कोली सुप्रीम कोर्ट से बरी होकर जेल से बाहर आ गया है। इस तरह 19 वर्ष पहले जिस कांड के सामने आने से सारा देश हिल गया था, उसमें कोई अपराधी साबित नहीं हुआ। घटना असाधारण थी। इसमें कम-से-कम 16 महिलाओं और बच्चों की बलात्कार के बाद हत्या की गई। नोएडा के पास निठारी गांव में एक आलीशान बंगले के पीछे के ड्रेनेज से पीड़ितों के अवशेष बरामद होने से मामला सामने आया। तब तक रहस्यमय ढंग से गायब हुए बच्चों और महिलाओं के परिजन दर-दर की ठोकरें खा रहे थे। जब घटना में मानव भक्षण के संकेत भी मिले, तो लोगों की रूह कांप गई।

पुलिस ने कुल 13 मुकदमे दर्ज किए। घटना की गंभीरता को देखते हुए जांच सीबीआई को सौंपी गई। मगर अब साफ है कि सीबीआई ने खुद से नए सिरे से साक्ष्य जुटाने के बजाय पुलिस जांच को ही आगे बढ़ाया, जिसमें अनेक खामियां थीं। नतीजतन, 12 मामले कोर्ट में नहीं टिके। 13वें मामले में कोली को सजा हुई। बंगले का मालिक मोनिंदर सिंह पांधेर बच निकला। अब सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि इकबालिया बयान और दोषपूर्ण साक्ष्य के कारण 12 मामले न्यायिक परीक्षण में नहीं टिके, तो 13वें में भी सजा सुनाने का भी कोई आधार नहीं बचता, क्योंकि साक्ष्य वही हैं।

नतीजा है कि इतने बड़े कांड में कोई दोषी साबित नहीं हुआ। यह भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था की धज्जियां उड़ना नहीं है, तो इसे क्या कहा जाएगा? बच्चों और महिलाओं की हत्या हुई, यह निर्विवाद है। पीड़ितों के परिजन मौजूद हैं, जो ताजा घटनाक्रम से खुद को ठगे गए महसूस कर रहे होंगे। आखिर उन्हें किसने ठगा? जाहिर है, पुलिस, सीबीआई और अभियोग पक्ष ने अपना काम ठीक से नहीं किया। उन्होंने अकाट्य सबूत नहीं जुटाए और कोर्ट को स्वीकार्य दलीलें पेश नहीं कीं। मगर यह पहला मौका नहीं है, जब ऐसा हुआ हो। इस मामले में बात सिर्फ यह है कि हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था मानव चेतना को आहत करने वाले एक कांड में भी दोषियों तक कानून के हाथ नहीं पहुंचा सकी।


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