हम असाधारण समय में जी रहे हैं। इक्कीसवीं सदी में कैसी सुर्ख़ियां पढ़ने को मिल रही है। बात दो टूक है। साफ कहां जा रहा है कि “ग़ाज़ा में अकाल घोषित हो चुका है। क्या कुछ बदलेगा?” सवाल पूछे जाने से पहले ही जवाब तय था: नहीं। और यही समय की असाधारणता याकि असाधारण क्रूरता… Continue reading इक्कीसवीं सदी में अकाल, भूख!
