बंगाल के प्रभाव से बदलती देश की राजनीति

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किसी भी पार्टी के लिए पूर्वी भारत का विजय अभियान तभी पूरा होता, जब वह पश्चिम बंगाल जीते। वैसे ही जैसे पश्चिम का विजय अभियान महाराष्ट्र और उत्तर का अभियान उत्तर प्रदेश के बगैर अधूरा होता है। बहरहाल, पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत ने सिर्फ पूर्वी भारत के अभियान को संपूर्ण नहीं बनाया है, बल्कि भाजपा को इतनी ताकत दी है कि वह देश की राजनीति को स्थायी  रूप से बदल देने वाले फैसले कर सके।

भारत के इतिहास, भूगोल और राजनीति तीनों में पश्चिम बंगाल का महत्व अभूतपूर्व है। अभी भी पूरे देश में मानसून अटका है तो मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का मजबूत क्षेत्र नहीं बन रहा है इसलिए मानसून आगे नहीं बढ़ रहा है और बारिश नहीं हो रही है। ऐसा ही राजनीति के बारे में पुराने जमाने से कहा जाता है कि बंगाल आज जो सोचता है कल उसे पूरा देश करता है। पश्चिम बंगाल के इस बार के विधानसभा चुनाव का ऐसा ही असर पूरे देश में देखने को मिल रहा है। ऐसा लग रहा है कि एक यथास्थिति बनी हुई थी, राजनीति में जड़ता सी दिख रही थी, जिसे बंगाल के चुनाव नतीजों ने तोड़ दिया है। अब सारी राजनीतिक गतिविधियां मोशन में आ गई हैं। वैसे भी यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की विशाल जीत का असर 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को लोकसभा चुनाव में मिली जीत के समान हुआ है।

बहरहाल, 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ 240 सीटें मिली थीं। लगातार दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद पहली बार भाजपा को बहुमत से कम सीटें मिली थीं। उसके बाद दो साल में भाजपा ने झारखंड छोड़ कर हर राज्य की विधानसभा में बड़ी जीत हासिल की। महाराष्ट्र से लेकर हरियाणा और दिल्ली से लेकर बिहार तक। इन तमाम विजयों के बाद भी राजनीतिक जड़ता नहीं टूट रही थी। इसका संकेत इस साल का बजट सत्र भी है, जिसके समाप्त होने के बाद केंद्र सरकार ने तीन दिन का विशेष सत्र आयोजित किया और नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन का बिल पेश किया। संख्या कम होने और विपक्ष के एकजुट हो जाने से वह बिल पास नहीं हो पाया। कई दशकों में यह पहली बार हुआ था कि सरकार का बिल लोकसभा से पास नहीं हो पाया था। परंतु उसके एक महीने के अंदर ही सारी स्थितियां बदल गईं और ऐसा पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत से संभव हो पाया।

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत ने केंद्र सरकार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए वह सारे काम आसान कर दिए, जो अभी तक मुश्किल दिख रहे थे। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व खास कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को बंगाल चुनाव के महत्व का पता था। तभी उन्होंने पूरे दमखम से चुनाव लड़ा और कोई कसर नहीं छोड़ी। भाजपा के चुनाव जीतने के साथ ही उसका जो असर शुरू हुआ उससे बड़े बड़े किले ध्वस्त होने लगे हैं। इसका प्रत्यक्ष लाभ भारतीय जनता पार्टी को हो रहा है लेकिन जो सरकार की योजना है, अंततः उसका लाभ देश को मिलेगा। बंगाल में भाजपा की जीत ने सुनिश्चित किया है कि केंद्र सरकार की ताकत बढ़े और विपक्ष कमजोर हो।

अप्रैल में तीन दिन के विशेष सत्र में 233 सदस्यों का विपक्ष पूरी तरह से एकजुट था। इस वजह से सरकार 360 की दो तिहाई संख्या पूरी नहीं कर पाई और उसका विधेयक विफल हो गया। परंतु अब विपक्ष की 233 की संख्या घट कर 207 पर आ गई है। दूसरी ओर एनडीए की संख्या 293 से बढ़ कर 319 पहुंच गई है। यह विशुद्ध रूप से बंगाल का असर है। सबसे पहले इसकी शुरुआत बंगाल से ही हुई। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 सांसदों ने उनके खिलाफ बगावत कर दी। पार्टी के नेताओं का जो गुस्सा वर्षों से दबा हुआ था वह फूट पड़ा। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ सांसद, विधायक, पार्षद सब बागी हो गए। यह मामूली बात नहीं है कि 20 सांसदों और 60 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी। विधायकों को तो अलग गुट की मान्यता मिल गई है और उनके नेता ऋतब्रत बनर्जी को स्पीकर ने नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी है। हाई कोर्ट ने भी इसे स्वीकार कर लिया है। लोकसभा में 20 सांसदों की चिट्ठी भी स्पीकर के पास पहुंच गई है। राज्यसभा के तीन सांसदों का इस्तीफा हो गया है, जिसे सभापति ने मंजूर कर लिया है। राज्यसभा के और भी सांसद कतार में हैं, जो इस्तीफा देंगे। उनकी सीटों पर उपचुनाव होगा और उससे राज्यसभा में भी भाजपा की सीटें बढ़ेंगी।

पश्चिम बंगाल के बाद महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिव सेना में बगावत हुई। उनकी पार्टी के नौ लोकसभा सदस्यों में से छह सांसदों ने स्पीकर को चिट्ठी लिख कर अलग गुट की मान्यता देने की मांग की है। खबर है कि उनके 20 में से 15 से 16 विधायक और 65 पार्षदों में से ज्यादातर पार्षद पाला बदलने की तैयारी कर रहे हैं। उद्धव ठाकरे की शिव सेना के बाद शरद पवार की एनसीपी भी खतरे में है। उनके ऊपर पहले से इस बात का दबाव है कि वे अपने भतीजे दिवंगत अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार की पार्टी, जिसे असली एनसीपी माना गया है, उसमें अपनी पार्टी का विलय करें और एनडीए के साथ रहें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो संभावना यह है कि उद्धव ठाकरे की पार्टी की तरह उनकी पार्टी भी बिखर सकती है। ध्यान रहे जब से केंद्र, राज्य और बीएमसी तीनों की सत्ता भाजपा के हाथ में आई तभी से उद्धव ठाकरे और शरद पवार की पार्टी के सांसद, विधायक व पार्षद छटपटा रहे थे। लेकिन पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत ने उनके लिए फैसला करना आसान बना दिया है। उनको लग रहा है कि अगर भाजपा बंगाल जीत सकती है तो इसका अर्थ है कि वह लंबे समय तक भारतीय राजनीति की केंद्रीय शक्ति बनी रहने वाली है।

ध्यान रहे किसी भी पार्टी के लिए पूर्वी भारत का विजय अभियान तभी पूरा होता, जब वह पश्चिम बंगाल जीते। वैसे ही जैसे पश्चिम का विजय अभियान महाराष्ट्र और उत्तर का अभियान उत्तर प्रदेश के बगैर अधूरा होता है। भाजपा इन तीनों क्षेत्रों पूर्वी, उत्तरी और पश्चिमी भारत का विजय अभियान पूरा कर चुकी है। दक्षिण भारत का विजय अभियान तमिलनाडु के बगैर नहीं पूरा होता है। बहरहाल, पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत ने सिर्फ पूर्वी भारत के अभियान को संपूर्ण नहीं बनाया है, बल्कि भाजपा को इतनी ताकत दी है कि वह देश की राजनीति को स्थायी  रूप से बदल देने वाले फैसले कर सके। देश में परिसीमन के जरिए लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जानी है और महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित करना है। संसद के मानसून सत्र में सरकार इस काम को पूरा कर सकती है और ऐसा करने की ताकत बंगाल की जीत ने दी है। बंगाल की जीत ने भाजपा को संसद में संख्यात्मक रूप से तो मजबूत किया ही है साथ ही विपक्ष के ऊपर जबरदस्त मनोवैज्ञानिक बढ़त भी दी है।

इस पूरे घटनाक्रम में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ साथ मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी को भी जाता है। याद करें शिव सेना टूटी थी तो कितना नाटकीय घटनाक्रम हुआ था। विधायकों को पहले गुजरात और फिर गुवाहाटी ले जाया गया था। बंगाल में ऐसा कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं पड़ी तो इसका कारण सुवेंदु अधिकारी का तृणमूल कांग्रेस के सभी नेताओं के साथ सीधा संवाद और सहज स्वाभाविक संबंध हैं। उनके साथ बंगाल के सारे नेता अपने को सहज महसूस करते हैं। वे उनके ऊपर अपनी सर्वोच्चता आरोपित नहीं करते हैं और न उनको दबाने का प्रयास करते हैं। तभी तृणमूल कांग्रेस में जो नेता अपने को असहाय महसूस कर रहे थे और छटपटा रहे थे उनको सुवेंदु अधिकारी में अपनी मुक्ति का रास्ता मिला। सुवेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद राजनीति और शासन दोनों को जिस संतुलन के साथ साधा वह अद्भुत है। उन्होंने सभी प्रशासनिक व वैचारिक मुद्दों पर प्रतिबद्धता के साथ निर्णय किया और उसके क्रियान्वित किया तो साथ ही राजनीतिक रूप से अपने विपक्षी को इतना निष्क्रिय कर दिया कि वह प्रतिरोध नहीं कर सके। प्रशासनिक व वैचारिक मुद्दों पर हुए निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रम ने भाजपा को अभूतपूर्व मजबूती दी है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


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