गर्मियों में कैसे बिजली की आपूर्ति हो ?

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जब हर साल गर्मी आती है और मांग बढ़ती है, तो तैयारी क्यों नहीं होती? पिछले वर्षों में क्षमता में वृद्धि हुई है, लेकिन वितरण व्यवस्था में सुधार अपर्याप्त रहा। ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर, पुरानी लाइनें और शाम के समय सोलर जनरेशन घटने के बाद की कमी को प्रबंधित करने की ठोस योजना नजर नहीं आती।

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनता से बिजली की खपत कम करने की अपील की है। हालांकि उन्होंने यह भी आश्वासन दिया है कि बिजली की आपूर्ति में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी। उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली मिलेगी। उनका यह आश्वासन सराहनीय है। मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है। इसी हफ़्ते टीवी पर एक शो में बहस के दौरान पत्रकारों ने बताया कि नोएडा में बिजली का भारी संकट चल रहा है। बहुमंजलीय इमारतों में रहने वाले लोग भी बेहाल हैं। क्योंकि उन्हें पॉवर बैक-अप नहीं मिल रहा। उत्तर प्रदेश के अनेक शहरों में बिजली कमी को लेकर जगह-जगह जन-आंदोलन चल रहे हैं।

इसी बीच उत्तर प्रदेश में बिजली के ‘स्मार्ट मीटर’ का बड़ा घोटाला भी सामने आया है। इन मीटरों को लगवाने का निर्णय योगी सरकार के पहले कार्यकाल में ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के नेतृत्व में लिया गया था। इन मीटरों को लेकर जनता की शुरू से ही यह शिकायत रही है कि उनके बिल खपत से कई गुना ज़्यादा आ रहे हैं। अब जब पानी सर के ऊपर से गुज़र गया तो उत्तर प्रदेश की त्रस्त जनता ने ‘स्मार्ट मीटर’ उखाड़ कर फेंकने शुरू कर दिए और आक्रोशित जनता सड़कों पर उतर आई। योगी सरकार ने अब इन मीटरों को ना लगाने का फ़ैसला किया है।

वैसे तो हर साल गर्मियों में खास कर कर उत्तर भारत में बिजली का संकट बहुत बढ़ जाता है। क्योंकि बांधों में जल का स्तर तेज़ी से घटता है और नदियाँ भी सूखने लगती हैं। कारण पहाड़ों पर चल रहे सड़कों के विस्तार ने वृक्षों की अंधाधुंध कटाई की है। जिससे वर्षा की मात्रा तेज़ी से गिर गई है। पहाड़ ही क्यों मैदानों में भी जंगलों की अविवेकपूर्ण कटाई ने देश का हरित क्षेत्र  खतरनाक स्तर तक कम कर दिया है। जब ज़्यादा हरियाली होती है तो वातावरण में नमी पैदा होती है और उससे वर्षा होती है।

उधर अमेरिका-इजराइल-इराक़ युद्ध हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो, इन युद्धों में जो गोला बारूद रात-दिन आग उगल रहा है, उससे भी ‘ग्लोबल वार्मिंग’ बढ़ रही है। इसका प्रमाण है, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर तेज़ी से घटते हिमखंड। कुछ वर्ष पहले तक यूरोप के लोग गर्मी का नाम ही नहीं जानते थे। वहाँ के घरों में पंखे या एसी नाम का उपकरण नहीं लगाया जाता था। आज यूरोप के इन देशों को भीषण गर्मी की मार झेलनी पड़ रही है। पर किसी भी देश की सरकार पर्यावरण के इस मुद्दे पर गंभीरता से कोई ठोस काम नहीं कर रही।

अगर बिजली की खपत पर लौट कर आएँ तो योगी जी की ये चिंता निर्मूल नहीं है। एक ज़माने में ख़स के पर्दे से ही भवन ठण्डे किए जाते थे। फिर कूलर का दौर आया और आज तो घर-घर ए सी लग गए हैं। पर ए सी की जितनी खपत आम नागरिक करते हैं उससे कई गुना ज़्यादा सरकारी और व्यवसायिक प्रतिष्ठान करते हैं। योगी जी अगर अपने मंत्रालयों के भवनों का औचक निरीक्षण करें तो पाएंगे कि जब अफ़सर और बाबू कमरों में नहीं होते तब भी वहाँ कई-कई ए सी फालतू चलते रहते हैं। यही हाल अन्य प्रांतों के सरकारी दफ्तरों का भी होता है। इसलिए बिजली की खपत कम करने की पहल जितनी नागरिकों की तरफ़ से ज़रूरी है, उतनी ही शासक वर्ग से भी है।

हाइड्रो पॉवर या थर्मल पॉवर की बिजली बनाने की अनेकों सीमाएँ हैं। इनसे उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होता। बिजली की आपूर्ति को सुनिश्चित करने का सबसे बढ़िया उपाय है, सोलर एनर्जी। भारत जैसे विशाल भूभाग वाले क्षेत्र में भवनों की छतों पर सोलर पैनल लगा कर प्रदूषण मुक्त बिजली पैदा की जा सकती है। चीन इस दिशा में बहुत आगे बढ़ गया है। वो अपनी आवश्यकता से कहीं ज़्यादा बिजली सोलर पैनलों से पैदा कर रहा है। कोचीन का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पूरी तरह सोलर एनर्जी पर निर्भर है। इसलिए शेष प्रांतों में भी इस दिशा में तीव्रता से काम करने की ज़रूरत है।

उल्लेखनीय है कि मई 2026 में उत्तर प्रदेश ने 31,824 MW का रिकॉर्ड पीक डिमांड पूरा करने का दावा किया है। ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे राष्ट्रीय रिकॉर्ड बताते हुए कहा कि शहरों में 24 घंटे और गांवों में 18-22 घंटे बिजली दी जा रही है। केंद्र सरकार भी पूरे देश में 270 GW से अधिक पीक डिमांड को सफलतापूर्वक पूरा करने का दावा कर रही है। 2012 के बड़े ब्लैकआउट की तुलना में यह प्रगति प्रभावित करती है, लेकिन इन आंकड़ों की चमक जमीनी हकीकत को छुपा नहीं पा रही।

वास्तविकता यह है कि यूपी में ललितपुर व घाटमपुर जैसे थर्मल प्लांटों के बंद पड़े रहने से बिजली का संकट गहराया है। कोयला आपूर्ति की कमी और ट्रांसमिशन-डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के पुरानेपन ने स्थिति और बिगाड़ दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 6-12 घंटे तक बिजली गुल रहने की शिकायतें आम हैं। लखनऊ, गोंडा, वाराणसी जैसे शहरों में भी रात के समय बिजली की कटौती हो रही है। यहां तक कि भाजपा के विधायक भी इस मुद्दे पर सरकार से सवाल पूछ रहे हैं।

सरकार का दावा है कि मांग बढ़ने के कारण समस्या है, न कि उत्पादन की कमी। लेकिन सवाल उठता है कि जब हर साल गर्मी आती है और मांग बढ़ती है, तो तैयारी क्यों नहीं होती? पिछले वर्षों में क्षमता में वृद्धि हुई है, लेकिन वितरण व्यवस्था में सुधार अपर्याप्त रहा। ओवरलोडेड ट्रांसफार्मर, पुरानी लाइनें और शाम के समय सोलर जनरेशन घटने के बाद की कमी को प्रबंधित करने की ठोस योजना नजर नहीं आती। ऊर्जा एक्सचेंज से भी पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही । क्योंकि पूरे उत्तर भारत में बिजली की मांग समान रूप से बढ़ी हुई है।

यह संकट केवल गर्मी का नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का भी है। नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद, बैटरी स्टोरेज और स्मार्ट ग्रिड पर पर्याप्त निवेश नहीं हुआ। किसान, छोटे उद्योग और आम घरेलू उपभोक्ता सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। गर्मी में बिजली न होने से स्वास्थ्य, पानी की आपूर्ति और आजीविका सब प्रभावित हो रही है।

सरकार को अब संख्याओं से आगे बढ़कर समाधान पर ध्यान देना चाहिए। थर्मल प्लांटों का तुरंत रखरखाव, नई ट्रांसमिशन लाइनों का तेजी से निर्माण, डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम का आधुनिकीकरण और मांग प्रबंधन की बेहतर रणनीति जरूरी है। ‘24×7 बिजली’ के बड़े-बड़े दावे तब तक खोखले रहेंगे, जब तक जनता को राहत न मिले।

विद्युत क्षेत्र में प्रगति निश्चित रूप से हुई है, लेकिन संकट के समय यह प्रगति जनता तक नहीं पहुंच रही। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी भारी है। सरकार को अब दावों से हटकर वास्तविक सुधार पर ध्यान देना होगा, अन्यथा गर्मी के साथ-साथ जनाक्रोश भी बढ़ता रहेगा।


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