क्यों मोदी ‘नाराज फूफाओं’ से वाहवाही चाहते?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

यह गजब बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि विपक्ष उनके कामकाज की तारीफ करे, उनका समर्थन करे, उनकी वाहवाही करे, उनको विश्वगुरू माने और जब विपक्ष ऐसा नहीं करता है तो वे उसे ‘नाराज फूफा’ बताते हैं। अगर यह नहीं भी मानें कि उन्होंने ‘अर्बन नक्सल’ और ‘दिमागी नक्सल’ विपक्ष को कहा है, तब भी इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘नाराज फूफा’ विशेषण का इस्तेमाल उन्होंने विपक्ष के लिए ही किया है। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया के मीम्स से यह संदर्भ उठाया है। लेकिन पता नहीं उनको इसके असल सामाजिक संदर्भ की जानकारी है या नहीं या उन्होंने इसके सभी पहलुओं पर विचार किया या नहीं। असल में रिश्तों को समझें तो जो जीजा है वह फूफा होता है। हालांकि बच्चों की घटती संख्या की वजह से ऐसे कई रिश्ते खत्म होते जा रहे हैं। फिर भी इन रिश्तों की अपनी खूबसूरती है।

माना जाता है कि जीजा और फूफा अपनी ससुराल में अतिरिक्त खातिर तवज्जो चाहते हैं, जो नहीं मिलने पर नाराज हो जाते हैं। लेकिन उनके बगैर किसी भी परिवार में कोई शुभ कार्य संपन्न नहीं होता है और अपनी नाराजगी के बावजूद वे उसका हिस्सा होते हैं। उनका रिश्ता हंसी मजाक का होता है इसलिए उनकी नाराजगी की बातें हंसी मजाक में ही कही जाती हैं। कभी किसी गंभीर विमर्श के लिए ऐसे विशेषण का इस्तेमाल होते नहीं सुना गया है। इसलिए प्रधानमंत्री ने इसका इस्तेमाल किया तो इस पर स्वाभाविक रूप से चर्चा हो रही है।

इसके पारिवारिक और सामाजिक पहलू को छोड़ें और इसे ठीक उसी अर्थ में लें, जिस अर्थ में प्रधानमंत्री ने कहा है तब भी सवाल है कि प्रधानमंत्री या कोई भी सरकार अपनी विपक्षी पार्टियों से समर्थन की उम्मीद कैसे कर सकती है? कैसे सोच सकती है कि विपक्ष उसकी सच्ची या झूठी उपलब्धियों पर खुश होगा और तारीफ करेगा? क्या कभी विपक्ष में रहते भारतीय जनता पार्टी ने या खुद नरेंद्र मोदी ने उस समय की सरकारों के किसी काम की तारीफ की है? ध्यान रहे इस देश में ज्यादा समय तक समाजवादी, कम्युनिस्ट और जनसंघ व भाजपा ही विपक्ष में रहे हैं।

कांग्रेस तो ज्यादा समय सरकार में रही है। एकाध अपवाद छोड़ दें तो कभी ऐसा नहीं हुआ कि विपक्ष में रहने वाली पार्टियों ने सरकार का समर्थन किया हो या सरकार की उपलब्धियों पर तालियां बजाई हों। हालांकि सरकारें हर बार जरूर कहती हैं कि विपक्ष रचनात्मक भूमिका निभाए लेकिन कभी किसी सरकार ने इतनी शिद्दत से विपक्ष से वाहवाही की उम्मीद नहीं की होगी और न इतनी नफरत से आलोचना की होगी।

इस बात को प्रमाणित करने के लिए आजादी के बाद 80 साल के इतिहास को खंगालने और सभी विपक्षी पार्टियों का इतिहास देखने की जरुरत नहीं है। अगर सिर्फ यह देखा जाए कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कामकाज को लेकर भाजपा का और खास कर नरेंद्र मोदी का क्या रुख रहा है तब भी तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी। जितने समय मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री रहे उतने समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। केंद्र में भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी थी। इस नाते भाजपा के बड़े नेता जैसे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज आदि हर समय सरकार की आलोचना करते थे।

संसद के बाहर और भीतर दोनों जगह सरकार पर दबाव बना कर रखते थे। उसी दौर में अरुण जेटली ने संसद को बाधित करने की राजनीति को एक सैद्धांतिक स्वरूप दिया और कहा कि संसद नहीं चलने देना भी एक तरह की संसदीय राजनीति है। हालांकि अब भाजपा के सारे नेता संसद बाधित करने पर विपक्ष को देश विरोधी बताते हैं और भारत विरोधी ताकतों का एजेंट ठहराते हैं।

बहरहाल, उस दौरान भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के अलावा गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार के हर फैसले की घनघोर आलोचना की। खुद प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने यूपीए सरकार के जिन फैसलों या नीतियों को जस का तस लागू किया उनकी भी आलोचना की थी। मिसाल के तौर पर नरेंद्र मोदी ‘आधार’ के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते कहा था कि बिना किसी सख्त जांच के अगर लोगों को आधार कार्ड जारी किया गया तो देश में घुसपैठ बढ़ेगी और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होगा। यहां तक कि 2014 के लोकसभा चुनाव में जब वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर लड़ रहे थे तब उन्होंने अप्रैल 2014 के एक सोशल मीडिया पोस्ट में ‘आधार’ को ‘पोलिटिकल गिमिक’ बताया था और कहा था कि सरकार ने उनकी और उनकी टीम की ओर से उठाए गए सवालों का जवाब नहीं दिया है।

लेकिन जब मोदी सरकार में आए तो न सिर्फ ‘आधार’ को उसी रूप में अपनाया, जिस रूप में यूपीए की सरकार ने अपनाया था, बल्कि उसे देश के लोगों के जीवन का बुनियादी आधार बना दिया। लाल किले से अपने पहले भाषण में मोदी ने ‘जैम’ यानी ‘जनधन खाता, मोबाइल और आधार’ के जरिए जन कल्याण की योजनाएं चलाने का ऐलान किया।

इसी तरह गुजरात का मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी लागू करने की तत्कालीन सरकार की तैयारियों की जम कर आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि यह संघवाद की धारणा के खिलाफ है और इससे राज्यों को राजस्व का नुकसान होगा। मोदी ने तब गुजरात के हितों की रक्षा करने के लिए आगे बढ़ कर कहा था कि गुजरात एक मजबूत विनिर्माण सेक्टर वाला राज्य है। ऐसे में जीएसटी से गुजरात को राजस्व का नुकसान होगा और उपभोग करने वाले राज्यों को इसका फायदा होगा।

मजेदार बात यह है कि मोदी ने इसका विरोध करने के लिए कांग्रेस विरोधी पार्टियों के शासन वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एकजुट करने का प्रयास भी किया था। लेकिन सरकार में आने के तीन साल में नरेंद्र मोदी ने आधी रात को संसद का विशेष सत्र बुला कर जीएसटी लागू किया था। अब सोचिए, विपक्ष में रह कर जिसका विरोध किया, सत्ता में आए तो उसे लागू कर दिया! ‘नाराज फूफा’ तो एक बात है लेकिन यह तो हिप्पोक्रेसी है!

मनमोहन सिंह की सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में, जिसे सही अर्थों में देश की उपलब्धि भी कह सकते हैं, वह है अमेरिका के साथ हुई असैन्य परमाणु संधि। भारत उससे पहले अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अछूत बना हुआ था। 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका सहित दुनिया के देशों ने भारत पर कई तरह की पाबंदी लगा रखी थी। अमेरिका के साथ संधि के बाद कई पाबंदियां समाप्त हो गईं। लेकिन भाजपा ने लेफ्ट के साथ मिल कर उस संधि का जी जान से विरोध किया था। उसे भारत की संप्रुभता के खिलाफ बताया था। कहा गया था कि इससे भारत की परमाणु स्वायत्तता समाप्त हो जाएगी और भारत कभी परमाणु परीक्षण नहीं कर पाएगा। लेकिन 2015 में मोदी प्रधानमंत्री थे और अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत दौरे पर आए तो विदेशी कंपनियों की जवाबदेही वाले कलॉज के गतिरोध को दूर करके समझौते को लगभग हूबहू और पूरी तरह से लागू करने का समझौता हुआ।

विपक्ष में रहते भाजपा ने मनमोहन सिंह की सरकार के किसी भी काम को उपलब्धि माना ही नहीं। 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के समय देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट नहीं होने देने का मामला हो या लगातार औसतन आठ फीसदी की आर्थिक विकास दर का मामला हो। भाजपा ने किसी को स्वीकार नहीं किया। उनके समय डॉलर 60 रुपए का था और पेट्रोल भी 60 रुपए लीटर बिक रहा था। लेकिन कोई वाहवाही नहीं थी। अब प्रधानमंत्री चाहते हैं कि 7.8 फीसदी की विकास दर, लगभग सौ रुपए के डॉलर और सौ रुपए लीटर से ऊपर पेट्रोल की कीमत का उत्सव मनाया जाए। और अगर विपक्ष इसका उत्सव नहीं मनाता है तो वह ‘नाराज फूफा’ है।


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