जिमखाना पर इतना क्या शोक मनाना!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

जिमखाना क्लब की 27.3 एकड़ जमीन की लीज केंद्र सरकार ने समाप्त कर दी है और क्लब को नोटिस भेज दिया गया है कि पांच जून तक इसे खाली कर दिया जाए। आधिकारिक रूप से कहा गया है कि सुरक्षा की दृष्टि से कुछ बुनियादी ढांचे का निर्माण होना है, जिसके लिए सरकार को यह जमीन चाहिए। दूसरी ओर क्लब के सदस्य इस नोटिस के खिलाफ अदालत पहुंचे हैं। हालांकि किसी को असल कारण पता नहीं है कि जिमखाना क्लब क्यों हटाया जा रहा है। इसलिए सब अपनी तरफ से कोई न कोई कारण बता रहे हैं। पहले उनकी बात करते हैं, जो फैसले के खिलाफ हैं और इसे हटाए जाने के कारण बता रहे हैं। जैसे किसी ने कहा कि प्रधानमंत्री हमेशा अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं इसलिए वे जिमखाना क्लब को प्रधानमंत्री के आवासीय कॉम्पलेक्स के अंदर लेना चाहते हैं। किसी ने कहा कि जिमखाना क्लब में होने वाली पार्टियों से लोक कल्याण मार्ग में रहने वालों को परेशानी होती है। इसलिए खाली कराया जा रहा है। इसके आगे किसी ने कहा कि मौजूदा निजाम के कुछ बड़े लोगों को सदस्यता नहीं मिली, जबकि राहुल गांधी इसके सदस्य हैं इस खुन्नस में खाली कराया जा रहा है। किसी ने कहा कि पुरानी तमाम चीजों से मौजूदा सत्ता को परेशानी है इसलिए खाली कराया जा रहा है।

इसके बरक्स एक समूह ऐसे लोगों का है, जो इसे हटाए जाने का स्वागत कर रहे हैं। उनमें से किसी ने कहा कि यह ब्रिटिश साम्राज्य की निशानी है इसलिए इसको हटाया जाना चाहिए। किसी ने कहा कि अंग्रेजों ने भारतीयों को अपमानित करने के लिए ऐसे क्लब बनाए थे और ये क्लब गुलामी का प्रतीक हैं इसलिए इनको हटा दिया जाना चाहिए। फिर किसी ने इसमें जोड़ा कि वामपंथी लोगों के बौद्धिक विलास का अड्डा है इसलिए हटना चाहिए। कुछ लोगों ने कहा कि दारूबाजी का अड्डा है इसलिए हटना चाहिए। दिल्ली सरकार के एक मंत्री ने कहा कि किसानों से जमीन मांगी जाती है तो वे दे देते हैं इसलिए एलिट जमात को भी इसे खाली कर देना चाहिए।

इस तरह राजधानी दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से इस बात पर चकल्लस है कि जिमखाना क्लब रहना चाहिए या हटना चाहिए। सरकार के लिए यह चकल्लस बहुत सुविधाजनक है क्योंकि इससे अटेंशन डिवाइड होता है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी, महंगाई, नीट पेपरलीक, 12वीं के छात्रों की परेशानियों आदि के बीच जब जिमखाना जैसे मुद्दे आ जाते हैं तो सरकार के लिए ठीक ही रहता है। हो सकता है कि इसे हटाने का फैसला पहले से किया गया हो। लेकिन नोटिस भेजने की टाइमिंग तो निश्चित रूप से अटेंशन डिवाइड करने की योजना का हिस्सा है।

यह बहुत दिलचस्प है कि जिमखाना क्लब हटाने के पक्ष में जो तर्क दिए जा रहे हें वो बेहद लचर और बचकाने हैं। जैसे सबसे मजबूत तर्क यह है दिल्ली के एलिट लोगों का, विशेषाधिकार प्राप्त समूह का क्लब है, जहां आम आदमी की एंट्री नहीं है। और इसलिए इसका कोई वास्तविक लाभ नहीं है। इस तर्क के आधार पर तो दिल्ली के सारे क्लब बंद हो जाएंगे क्योंकि सब अभिजात्य और विशेषाधिकार प्राप्त समूहों के लिए ही हैं। कस्तूरबा गांधी मार्ग पर एक और विनय मार्ग पर दो बड़े क्लब हैं। सीएसओई क्लब, जो दिल्ली और भारत सरकार के अधिकारियों के लिए हैं। वहां भी आम आदमी की एंट्री नहीं होती है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और इंडिया हैबिटेट सेंटर में भी आम आदमी की एंट्री नहीं होती है। रायसीना रोड पर चेम्सफोर्ड क्लब और जनपथ पर मैसोनिक क्लब में भी आम आदमी नहीं जा सकता है। दिल्ली गोल्फ क्लब भी एक्सक्लूसिव है, एयरपोर्ट ऑथोरिटी का क्लब और रफी मार्ग पर स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब भी विशिष्ठ लोगों के लिए ही है। तो क्या इस आधार पर कि इन क्लबों में कुछ सार्थक नहीं होता है, ये मनोरंजन की जगह हैं और आम आदमी की एंट्री नहीं होती है इसलिए इन सबको हटा दिया जाए? पूर्व सांसदों के लिए संसद से लेकर कांस्टीट्यूशन क्लब तक बैठने की जगह है, पूर्व सैन्य अधिकारियों के लिए सशस्त्र बलों के मेस हैं और अर्धसैनिक बलों के लिए भी है लेकिन पूर्व अधिकारियों के लिए कोई एलीट क्लब नही हो सकता है!

इसी तरह का एक तर्क ब्रिटिश काल में बने होने का है। इसका क्या अर्थ है? ब्रिटिश काल में बना था तो क्या अंग्रेज इसके लिए अपनी जमीन, अपना ईट, बालू, सीमेंट लेकर आए थे? क्या उनके मजदूर इसे बनाने आए थे? भारत की जमीन पर, भारत के पैसे से, भारत के मजदूरों के खून, पसीने से ही इसका निर्माण हुआ। अगर इस तर्क को मानें कि अंग्रेजी राज की सारी निशानी मिटा देनी है तो फिर लुटियन की दिल्ली के सारे बंगलों को भी तोड़ना पड़ेगा। इंडिया गेट से लेकर गेटवे ऑफ इंडिया तक को ध्वस्त करना होगा। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से लेकर महापंजीयक तक की संस्थाओं को समाप्त करना होगा क्योंकि वह सब भी अंग्रेजों ने बनाया था।

एक बेहूदा तर्क यह है कि जिमखाना क्लब दारू का अड्डा है और प्रधानमंत्री के आवास के पास ऐसा अड्डा नहीं चलने दिया जा सकता है। यह तर्क सरकार के एक सलाहकार महोदय की ओर से सबसे जोर शोर से दिया जा रहा है। अगर दारू का अड्डा के नाम पर इसे हटाने का फैसला होगा तो प्रेस क्लब और चेम्सफोर्ड क्लब का क्या होगा, जो संसद भवन के ठीक सामने हैं? प्रधानमंत्री आवास से ज्यादा शुचिता तो संसद भवन की होनी चाहिए! इस तर्क से तो सशस्त्र बलों से लेकर अर्धसैनिक बलों के लिए बने मेस तक को दारू का अड्डा घोषित किया जा सकता है। क्या सलाहकार महोदय को पता है कि और लुटियन की दिल्ली के अनेक बंगले होंगे, जहां दारू पी जाती होगी या दारू पार्टी होती होगी। कई बंगले प्रधानमंत्री आवास के आसपास ही होंगे। तो क्या इस आधार पर सबको तोड़ दिया जाए? वैसे यह सवाल भी है कि अगर अधिकारियों, पूर्व अधिकारियों या एलीट के लिए 27 एकड़ का क्लब नहीं हो सकता है तो केंद्र सरकार के मंत्री तीन तीन एकड़ के बंगलों में क्यों रहेंगे? उस जगह का भी तो सार्वजनिक इस्तेमाल हो सकता है!

हां, सुरक्षा का मामला हो सकता है। प्रधानमंत्री की सुरक्षा सबसे ऊपर है। अब स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप यानी एसपीजी सिर्फ प्रधानमंत्री की ही सुरक्षा के लिए है। पहले तो पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिजनों को भी एसपीजी की सुरक्षा मिलती थी लेकिन अब यह सिर्फ प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए है। यह संयोग है कि आजादी के बाद से प्रधानमंत्री वहीं रहे, जहां जिमखाना क्लब है। तीन मूर्ति हो या एक, सफदरजंग हो या सात, लोक कल्याण मार्ग हो, सब जिमखाना के आसपास ही हैं और कभी इसकी वजह से कोई सुरक्षा चुनौती पैदा हुई हो इसकी खबर नहीं है। ऊपर से प्रधानमंत्री तो अब वहां से शिफ्ट भी होने वाले हैं। प्रधानमंत्री इन्क्लेव का निर्माण कार्य चल रहा है, जो 15 एकड़ में बन रहा है। इसलिए सुरक्षा का मामला भी ज्यादा तार्किक नहीं लग रहा है।

कुल मिला कर कर निष्कर्ष यह है कि प्रधानमंत्री को लगा कि जिमखाना बंद कर देना चाहिए तो बंद हो जाएगा। जैसे यह लगा कि नया संसद भवन बनना चाहिए तो बना। लगा कि इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर ऑफ आर्ट एंड कल्चर या निर्माण भवन आदि टूटने चाहिए तो सब टूट गए। योजना आयोग का नाम नीति आयोग होना चाहिए तो हो गया। यह तो प्रधानमंत्री की मर्जी है। कभी किसी प्रधानमंत्री को लगेगा कि ललित कला अकादमी या संगीत नाटक अकादमी या साहित्य अकादमी आदि अनुत्पादक जगहें हैं और एलिट जमात के बौद्धिक विलास का अड्डा हैं तो वह उनको तुड़वा देगा। उनकी जगह अपने हिसाब से वह कुछ ज्यादा उपयोगी निर्माण कराएगा। यह सब तो चलता रहता है। इससे समस्या नहीं है। समस्या इसको जस्टिफाई करने के लिए दिए जाने वाले तर्कों से है।

दूसरी ओर जिमखाना क्लब न हटाया जाए इसके तर्क भी बहुत बचकाना और अतार्किक हैं। उनमें कोई दम नहीं है। वहां खेल कूद का आयोजन होता है या 50 फीसदी सदस्य सेना के रिटायर लोग हैं या सरकार से रिटायर लोग वहां के सदस्य हैं, यह ऐतिहासिक है आदि आदि। इनका कोई अर्थ नहीं है। हां, यह अवश्य है कि हजारों साल से नगर सभ्यताओं में इस तरह के क्लब या मनोरंजन की जगहें बनती रही हैं। रोम का कोलोसियम तो मानव सभ्यता के सबसे अमानवीय मनोरंजन माध्यम की जगह था, जहां रोम के अमीर लोग ग्लैडियटर्स की लड़ाई देखने जाते थे। लेकिन हजारों साल से उसे भी संभाल कर रखा गया है और दुनिया भर के लोग उसे देखने जाते हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता में सामूहिक स्नानागार थे, संभ्रात लोगों के लिए थे। असल में हर सभ्यता में नगर का एक लैंडस्केप होता है, जिसमें उस सभ्यता के एलीट लोगों के लिए मनोरंजन की जगहें होती हैं तो सबसे गरीब लोगों के लिए भी जगह होती है। दिल्ली में भी जिमखाना क्लब है तो सैकड़ों अनियमित कॉलोनियां हैं और हजारों झुग्गियां भी हैं। प्रधानमंत्री आवास के आसपास भी कई झुग्गियां हैं। इतिहास बोध और सौंदर्य बोध के साथ साथ इसका भी ध्यान रखना चाहिए।


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